भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 115 'स्वेच्छया उपहति कारित करने' (Voluntarily causing hurt) के अपराध को परिभाषित करती है और इसके लिए दंड का प्रावधान करती है। यह प्रावधान पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 321 और 323 के समतुल्य है।
धारा 115 का विस्तृत कानूनी प्रावधान:
1. स्वेच्छया उपहति कारित करने की परिभाषा (धारा 115(1)): इस उपधारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उपहति (चोट, शारीरिक पीड़ा, बीमारी या दुर्बलता) पहुँचाने के स्पष्ट 'इरादे' (intention) के साथ कोई कृत्य करता है, या इस 'ज्ञान' (knowledge) के साथ कोई कृत्य करता है कि उसके इस कार्य से किसी व्यक्ति को चोट पहुँचने की संभावना है, और वास्तव में वह अपने इस कृत्य से किसी को चोट पहुँचा देता है, तो कानून की दृष्टि में यह कहा जाता है कि उसने "स्वेच्छया उपहति कारित की है" (voluntarily to cause hurt)।
2. सजा और दंड का प्रावधान (धारा 115(2)): यह उपधारा इस अपराध के लिए सजा निर्धारित करती है। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छया उपहति (Voluntarily causing hurt) कारित करता है, तो उसे निम्नलिखित सजा से दंडित किया जाएगा:
- दोनों में से किसी भी भांति (कठोर या साधारण) का कारावास, जिसकी अवधि एक (1) वर्ष तक की हो सकती है।
- या आर्थिक जुर्माना, जिसे दस हजार (10,000) रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।
- या अपराधी को कारावास और जुर्माना दोनों से एक साथ दंडित किया जा सकता है।
अपवाद: इस धारा की सजा उन मामलों पर लागू नहीं होती जो BNS की धारा 122 की उपधारा (1) के अंतर्गत आते हैं (अर्थात जब चोट किसी गंभीर और अचानक उकसावे - grave and sudden provocation - के कारण दी गई हो, जिसके लिए कानून में अलग और हल्की सजा का प्रावधान है)।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 हाल ही में लाया गया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 321 और 323 (स्वेच्छया चोट पहुँचाना) पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 115 के समतुल्य और पूर्णतः प्रासंगिक हैं। आप इस जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
'स्वेच्छया उपहति कारित करने' (Voluntarily causing hurt) के विषय पर सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख और मार्गदर्शक मामले (Leading Cases) निम्नलिखित हैं:
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State of Punjab v. Saurabh Bakshi (2015): इस महत्वपूर्ण मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि 'स्वेच्छया उपहति कारित करने' के अपराधों में सजा देते समय अदालतों को निवारक (deterrent) सिद्धांत को नहीं भूलना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि मुकदमे में लंबा समय बीत चुका है या आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, ऐसे मामलों में सजा को बहुत अधिक कम नहीं किया जाना चाहिए। शारीरिक चोट (hurt) पहुँचाने वाले अपराधियों को उचित दंड मिलना आवश्यक है ताकि समाज में कानून का डर और सम्मान बना रहे।
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Ankush Shivaji Gaikwad v. State of Maharashtra (2013): इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक न्याय प्रणाली में 'पीड़ितों के अधिकारों' (Victim Jurisprudence) पर जोर दिया। न्यायालय ने यह अनिवार्य किया कि धारा 323 (अब BNS की धारा 115) जैसे साधारण चोट पहुँचाने के मामलों में भी, अदालतों को न केवल अपराधी को दंडित करने पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि पीड़ित को हुए शारीरिक दर्द और परेशानी के लिए उसे उचित 'मुआवजा' (Compensation) दिलाने पर भी अनिवार्य रूप से विचार करना चाहिए। न्यायालय को फैसले में यह दर्ज करना होगा कि उसने मुआवजे का आदेश क्यों दिया या क्यों नहीं दिया।
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Mathura Dass v. State of Punjab (1981): इस निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'स्वेच्छया उपहति' (Voluntarily causing hurt) का अपराध तब पूर्ण माना जाता है जब हमलावर का इरादा (Intention) या ज्ञान (Knowledge) साबित हो जाए। यदि हमलावर किसी साधारण वस्तु से या केवल सामान्य शारीरिक बल (जैसे घूंसा या थप्पड़) का प्रयोग करके चोट पहुँचाता है और उसके पास गंभीर चोट (Grievous Hurt) पहुँचाने का कोई पूर्व-इरादा या खतरनाक हथियार नहीं था, तो यह कृत्य केवल साधारण उपहति (Simple Hurt) की श्रेणी में ही आएगा और उसे धारा 323 (अब 115) के तहत ही सजा दी जाएगी।
