भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 114 'उपहति' (Hurt) या 'साधारण चोट' को परिभाषित करती है।
धारा 114 का विस्तृत कानूनी प्रावधान: इस धारा के अनुसार, "जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा (bodily pain), रोग (disease) या अंगशैथिल्य/दुर्बलता (infirmity) कारित करता है, उसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने 'उपहति' (Hurt) कारित की है"।
विस्तृत व्याख्या: यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि कानून की दृष्टि में 'चोट' (Hurt) का दायरा केवल शरीर कटने, छिलने या हड्डी टूटने तक सीमित नहीं है। यदि किसी कृत्य के परिणामस्वरूप पीड़ित को निम्नलिखित तीन में से कोई भी नुकसान पहुँचता है, तो उसे 'उपहति' माना जाएगा:
- शारीरिक पीड़ा (Bodily Pain): किसी भी तरह का शारीरिक दर्द देना (जैसे थप्पड़ मारना, डंडे से पीटना या घूंसा मारना)।
- रोग (Disease): जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति में कोई संक्रमण (infection) या बीमारी फैला देना।
- अंगशैथिल्य (Infirmity): किसी व्यक्ति के शरीर या अंगों को शिथिल, दुर्बल या काम करने में अक्षम बना देना (जैसे किसी को नशीला या विषैला पदार्थ खिलाकर बेहोश कर देना या उसकी शारीरिक ऊर्जा छीन लेना)।
(महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 एक नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 319 पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 114 के पूर्णतः समतुल्य है। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
उपहति (Hurt) के विषय पर प्रमुख न्यायिक सिद्धांत और निर्णय (Leading Cases):
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State of U.P. v. Indrajeet @ Sukhatha (2000): सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि 'उपहति' का अपराध साबित करने के लिए यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि पीड़ित के शरीर पर बाहरी चोट के कोई निशान (visible external injuries) मौजूद हों। यदि साक्ष्यों से यह साबित हो जाता है कि आरोपी के कृत्य के कारण पीड़ित को शारीरिक दर्द (bodily pain) हुआ है, तो यह कृत्य इस धारा के तहत 'उपहति' (Hurt) माना जाएगा।
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Jashoda Dass v. State (1995) एवं अन्य स्थापित सिद्धांत: न्यायालयों ने इस कानूनी बिंदु को दृढ़ता से स्थापित किया है कि इस धारा के तहत केवल "मानसिक पीड़ा" (Mental agony or shock) को 'उपहति' (Hurt) नहीं माना जा सकता। अपराध सिद्ध होने के लिए 'शारीरिक पीड़ा' (Bodily pain) का होना अनिवार्य शर्त है। केवल मानसिक या भावनात्मक ठेस पहुँचाना इस विशिष्ट परिभाषा के दायरे में नहीं आता, जब तक कि उस मानसिक आघात से कोई वास्तविक शारीरिक बीमारी (disease) या दुर्बलता उत्पन्न न हो जाए।
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Ansaruddin v. State of M.P. (1997) / ऐतिहासिक सिद्धांत: अदालतों ने समय-समय पर 'अंगशैथिल्य' (Infirmity) शब्द की विस्तृत व्याख्या की है। न्यायपालिका के अनुसार 'अंगशैथिल्य' का तात्पर्य शरीर के अंगों की अस्थायी (temporary) या स्थायी (permanent) दुर्बलता से है। यदि कोई व्यक्ति किसी को धोखे से कोई नशीला या विषाक्त पदार्थ पिलाकर उसे अस्थायी रूप से चलने-फिरने या सोचने-समझने में अक्षम (helpless) बना देता है, या उसे ऐसी स्थिति में ला देता है जहाँ वह सामान्य कार्य नहीं कर सकता, तो इसे अंगशैथिल्य कारित करना माना गया है और यह स्पष्ट रूप से 'उपहति' की परिभाषा के अंतर्गत आता है।
