भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 113 "आतंकवादी कृत्य" (Terrorist act) को परिभाषित करती है और इससे जुड़े विभिन्न अपराधों के लिए कठोर दंड का विस्तृत प्रावधान करती है। यह भारतीय दंड संहिता के इतिहास में पहली बार है जब आतंकवाद जैसे गंभीर अपराध को सीधे तौर पर सामान्य दंड संहिता (BNS) में परिभाषित और शामिल किया गया है।
1. आतंकवादी कृत्य की परिभाषा (धारा 113(1)): इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा, या आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने के इरादे से, या भारत या किसी भी विदेश में लोगों (या उनके किसी वर्ग) के बीच आतंक (terror) पैदा करने के इरादे से कोई कृत्य करता है, तो वह आतंकवादी कृत्य माना जाएगा। इसमें निम्नलिखित कार्य और तरीके शामिल हैं:
- घातक हथियारों और पदार्थों का उपयोग: बम, डायनामाइट, विस्फोटक पदार्थ, आग्नेयास्त्र (firearms), घातक हथियार, जहरीली गैसों, रसायनों, या जैविक (biological), रेडियोधर्मी (radioactive), अथवा परमाणु (nuclear) प्रकृति के खतरनाक पदार्थों का उपयोग करके किसी की मृत्यु या चोट का कारण बनना।
- संपत्ति और सेवाओं का नुकसान: किसी संपत्ति को नष्ट करना या नुकसान पहुंचाना, या भारत या विदेश में समुदाय के जीवन के लिए आवश्यक आपूर्ति या सेवाओं (essential supplies or services) को बाधित करना।
- आर्थिक सुरक्षा को खतरा: नकली भारतीय कागजी मुद्रा (counterfeit Indian paper currency) या सिक्कों के उत्पादन, तस्करी या प्रसार के माध्यम से भारत की मौद्रिक स्थिरता (monetary stability) को नुकसान पहुंचाना।
- सरकारी कार्यप्रणाली और पदाधिकारियों पर हमला: आपराधिक बल द्वारा किसी 'सार्वजनिक पदाधिकारी' (public functionary) को डराना, या उसकी मृत्यु कारित करना या मृत्यु कारित करने का प्रयास करना।
- अपहरण और बंधक बनाना: भारत सरकार, किसी राज्य सरकार, विदेशी सरकार, या किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन को कोई विशिष्ट कार्य करने या न करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को बंधक बनाना, अपहरण करना और उसे मारने या घायल करने की धमकी देना।
2. सजा और दंड के प्रावधान (Punishments): आतंकवाद की गंभीरता को देखते हुए धारा 113 में इसके विभिन्न स्तरों के लिए अत्यंत कठोर सजा निर्धारित की गई है:
- मृत्यु होने की स्थिति में (धारा 113(2)(a)): यदि आतंकवादी कृत्य के परिणामस्वरूप किसी भी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो अपराधी को मृत्युदंड (Death) या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी, और उस पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाएगा।
- अन्य मामलों में (धारा 113(2)(b)): यदि आतंकवादी कृत्य में किसी की मृत्यु नहीं होती है, तो अपराधी को कम से कम पांच (5) वर्ष के कारावास की सजा मिलेगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही जुर्माना भी लगेगा।
- षड्यंत्र, दुष्प्रेरण या सुविधा प्रदान करना (धारा 113(3)): आतंकवादी कृत्य की साजिश रचने, प्रयास करने, उकसाने, सलाह देने या जानबूझकर सुविधा प्रदान करने वाले व्यक्ति को कम से कम पांच वर्ष की सजा (आजीवन कारावास तक) और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
- प्रशिक्षण शिविर और भर्ती (धारा 113(4)): आतंकवाद के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने या लोगों की भर्ती करने वाले व्यक्ति को कम से कम पांच वर्ष (आजीवन कारावास तक) की जेल और जुर्माना होगा।
- संगठन का सदस्य होना (धारा 113(5)): किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य होने पर आजीवन कारावास तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
- आतंकवादी को शरण देना (धारा 113(6)): आतंकवादी को जानबूझकर शरण देने या छिपाने वाले को कम से कम तीन वर्ष (आजीवन कारावास तक) की सजा और जुर्माना मिलेगा। (अपवाद: यदि शरण अपराधी के पति या पत्नी (spouse) द्वारा दी गई है, तो यह उपधारा लागू नहीं होगी)।
- आतंकवादी संपत्ति रखना (धारा 113(7)): आतंकवादी कृत्य से प्राप्त या अर्जित की गई संपत्ति को अपने पास रखने पर आजीवन कारावास तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
3. विशेष कानूनी स्पष्टीकरण (UAPA के साथ संबंध): धारा 113 के अंत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्पष्टीकरण दिया गया है। इसके अनुसार, 'पुलिस अधीक्षक' (Superintendent of Police - SP) या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी ही यह निर्णय लेगा कि आतंकवाद के किसी मामले की जांच BNS की इस धारा (113) के तहत दर्ज की जाए या विशेष कानून 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967' (UAPA) के तहत दर्ज की जाए।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 एक बिलकुल नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से भारत के पूर्ववर्ती आतंकवाद-विरोधी विशेष कानूनों (जैसे UAPA, TADA, POTA) की संवैधानिक वैधता और उनके सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 113 के परिप्रेक्ष्य में पूरी तरह से प्रासंगिक हैं। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
इस विषय (आतंकवादी कृत्य और राष्ट्र विरोधी अपराध) पर सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख (Leading) मामले निम्नलिखित हैं:
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Kartar Singh v. State of Punjab (1994): यह आतंकवाद विरोधी कानूनों (विशेष रूप से TADA) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है। इस मामले में संविधान पीठ ने आतंकवाद से निपटने के लिए कठोर कानूनों की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए उनकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। न्यायालय ने माना कि आतंकवाद देश की संप्रभुता के लिए खतरा है, लेकिन साथ ही यह भी अनिवार्य किया कि ऐसे कठोर कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (procedural safeguards) लागू होने चाहिए ताकि पुलिस इनका मनमाना इस्तेमाल न कर सके।
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People's Union for Civil Liberties (PUCL) v. Union of India (2004): इस प्रमुख मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोटा (POTA - Prevention of Terrorism Act) अधिनियम की वैधता पर विचार किया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि 'आतंकवाद' कोई सामान्य कानून-व्यवस्था (law and order) का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ एक अघोषित युद्ध है। इसलिए, आतंकवाद और उससे जुड़े षड्यंत्रों से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक कानूनों से परे जाकर विशेष और कठोर दंड का प्रावधान बनाना संसद के पूर्ण अधिकार क्षेत्र में है।
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National Investigation Agency (NIA) v. Zahoor Ahmad Shah Watali (2019): यह मामला आतंकवाद से जुड़े अपराधों (विशेष रूप से UAPA के तहत) में जमानत (Bail) के अत्यंत कड़े नियमों की व्याख्या करता है, जो अब BNS की धारा 113 के मामलों की गंभीरता को भी स्पष्ट करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऐसे मामलों में यदि अदालत को केस डायरी और दस्तावेजों को देखकर यह विश्वास करने का प्रथम दृष्टया (prima facie) आधार मिलता है कि आरोप सही हैं, तो आरोपी को किसी भी हाल में जमानत नहीं दी जानी चाहिए। आतंकवाद के मामलों में 'जमानत न मिलना नियम है और जमानत मिलना एक बहुत ही दुर्लभ अपवाद'।
