भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 115 और धारा 117 के बीच मुख्य अंतर चोट (injury) की प्रकृति, उसकी गंभीरता और उसके लिए निर्धारित दंड की कठोरता में है। दोनों धाराएँ "जानबूझकर चोट पहुँचाने" (Voluntarily causing hurt) से संबंधित हैं, लेकिन दोनों के कानूनी प्रभाव और परिणाम काफी अलग हैं।
विस्तृत अंतर निम्नलिखित हैं:
1. अपराध की प्रकृति और परिभाषा (Nature and Definition):
- धारा 115 (स्वेच्छया उपहति कारित करना): यह धारा 'साधारण चोट' या 'उपहति' (Hurt) पहुँचाने से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य को जानबूझकर या यह जानते हुए शारीरिक पीड़ा (bodily pain), बीमारी या दुर्बलता पहुँचाता है, तो वह धारा 115 के तहत 'स्वेच्छया उपहति कारित करने' का दोषी माना जाता है। यह अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध है।
- धारा 117 (स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना): यह धारा 'गंभीर चोट' या 'घोर उपहति' (Grievous Hurt) पहुँचाने से संबंधित है। इसमें न केवल वास्तव में गंभीर चोट (जैसे हड्डी टूटना, आँख या कान की क्षमता जाना, या 15 दिनों तक तीव्र पीड़ा में रहना) का लगना आवश्यक है, बल्कि हमलावर का स्पष्ट आशय (intention) या ज्ञान (knowledge) भी घोर उपहति पहुँचाने का होना चाहिए।
2. दंड की मात्रा (Quantum of Punishment):
- धारा 115 के तहत सजा: यह एक हल्का अपराध है। इसमें दोषी को अधिकतम एक (1) वर्ष तक का कारावास (कठोर या साधारण), या दस हजार (10,000) रुपये तक का जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
- धारा 117 के तहत सजा: चूँकि यह अत्यंत गंभीर अपराध है, इसलिए इसमें दंड बहुत कठोर हैं:
- सामान्य मामलों में अपराधी को सात (7) वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है।
- यदि अपराधी की चोट के कारण पीड़ित को स्थायी अक्षमता (permanent disability) हो जाती है या वह परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (persistent vegetative state / कोमा) में चला जाता है, तो न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन तक) की सजा का प्रावधान है।
3. विशेष परिस्थितियों के लिए प्रावधान (Specific Aggravated Circumstances):
- धारा 115: इसमें 'घृणा अपराधों' या भीड़ द्वारा हमले के लिए कोई अलग से कठोर प्रावधान सूचीबद्ध नहीं है (हालाँकि सामान्य सजा लागू होती है)।
- धारा 117: इसमें विशेष रूप से यह उल्लेख किया गया है कि यदि पाँच (5) या उससे अधिक व्यक्तियों का समूह एक साथ मिलकर (acting in concert) किसी व्यक्ति की जाति, नस्ल, समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा या व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर उसे घोर उपहति (grievous hurt) पहुँचाता है, तो उस समूह के प्रत्येक सदस्य को सात (7) वर्ष तक की सजा और जुर्माना दिया जाएगा।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 हाल ही में लागू हुआ एक नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (साधारण चोट) और धारा 325 (गंभीर चोट) पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की क्रमशः धारा 115 और 117 के पूर्णतः समतुल्य हैं। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
इन दोनों धाराओं के बीच के अंतर को स्पष्ट करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख मामले निम्नलिखित हैं:
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State of U.P. v. Indrajeet @ Sukhatha (2000): इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने 'साधारण चोट' (वर्तमान धारा 115) और 'गंभीर चोट' (वर्तमान धारा 117) के बीच के अंतर को तय करने के लिए चिकित्सा साक्ष्य (Medical Evidence) के महत्व को स्पष्ट किया। न्यायालय ने कहा कि यह केवल प्रत्यक्षदर्शियों के बयान पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मेडिकल रिपोर्ट से यह असंदिग्ध रूप से साबित होना चाहिए कि लगी हुई चोट वास्तव में 'घोर उपहति' की निर्दिष्ट 8 श्रेणियों (जैसे हड्डी टूटना) में आती है। यदि मेडिकल रिपोर्ट इसे स्पष्ट रूप से गंभीर साबित नहीं कर पाती है, तो अपराधी को केवल साधारण चोट (धारा 115) के तहत ही सजा दी जा सकती है।
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Rambaran Mahto v. State of Bihar (1966): इस मामले में न्यायालय ने धारा 117 (पूर्व IPC 325) के तहत सजा देने के लिए आवश्यक 'इरादे' (Intention) की व्याख्या की। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी को गंभीर चोट लग जाने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि हमलावर ने 'स्वेच्छया घोर उपहति' कारित की है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि हमलावर का आशय (intention) वास्तव में गंभीर चोट (grievous hurt) पहुँचाने का था। यदि हमलावर ने केवल साधारण थप्पड़ या घूंसा मारा था (जिसका आशय केवल साधारण चोट पहुँचाना था), लेकिन दुर्घटनावश पीड़ित गिर गया और उसकी हड्डी टूट गई, तो हमलावर को घोर उपहति (धारा 117) का नहीं, बल्कि साधारण उपहति (धारा 115) का ही दोषी माना जाएगा।
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Mathura Dass v. State of Punjab (1981): यह मामला 'स्वेच्छया उपहति' (Voluntarily causing hurt - वर्तमान धारा 115) की प्रकृति को स्पष्ट करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि किसी झगड़े में हमलावर ने किसी ऐसे हथियार या बल का प्रयोग नहीं किया जिससे सामान्य तौर पर गंभीर चोट लगती हो, और उसका इरादा केवल सबक सिखाने का था, तो यह कृत्य धारा 115 के तहत आएगा। अदालत ने यह स्थापित किया कि दोनों धाराओं के बीच मुख्य अंतर कृत्य के पीछे के आपराधिक ज्ञान (mens rea) और इस्तेमाल किए गए हथियार की प्रकृति पर निर्भर करता है।
