भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 118 "खतरनाक हथियारों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति (साधारण चोट) या घोर उपहति (गंभीर चोट) कारित करने" (Voluntarily causing hurt or grievous hurt by dangerous weapons or means) के गंभीर अपराध और उसके लिए दंड का विस्तृत प्रावधान करती है।
यह धारा अपराध के परिणामों (चोट की गंभीरता) के आधार पर इसे दो उपधाराओं में विभाजित करती है:
1. खतरनाक हथियारों/साधनों द्वारा साधारण चोट (Hurt) पहुँचाना - धारा 118(1): इस उपधारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छया (जानबूझकर) किसी अन्य व्यक्ति को निम्नलिखित खतरनाक हथियारों या साधनों में से किसी का भी उपयोग करके उपहति (साधारण चोट) पहुँचाता है, तो वह इस धारा के तहत दंडनीय होगा:
- गोली चलाने (shooting), छुरा घोंपने (stabbing) या काटने (cutting) वाले किसी उपकरण द्वारा।
- हमले के हथियार (weapon of offence) के रूप में उपयोग किए जाने वाले किसी ऐसे उपकरण द्वारा, जिससे मृत्यु होने की संभावना हो।
- आग (fire) या किसी भी गर्म पदार्थ (heated substance) द्वारा।
- किसी भी विष (poison) या संक्षारक/तेजाबी पदार्थ (corrosive substance) द्वारा।
- किसी भी विस्फोटक पदार्थ (explosive substance) द्वारा।
- किसी भी ऐसे पदार्थ द्वारा जिसे सूंघना (inhale), निगलना (swallow) या रक्त में लेना (receive into the blood) मानव शरीर के लिए हानिकारक (deleterious) हो।
- किसी भी जानवर (animal) के माध्यम से।
अपवाद: यदि चोट किसी 'गंभीर और अचानक उकसावे' (grave and sudden provocation) के कारण दी गई है (जो BNS की धारा 122 की उपधारा 1 के अंतर्गत आती है), तो धारा 118(1) का यह प्रावधान लागू नहीं होगा। सजा (Punishment): इस अपराध के लिए दोषी को दोनों में से किसी भी भांति (कठोर या साधारण) के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि तीन (3) वर्ष तक की हो सकती है, या उस पर बीस हजार (20,000) रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, या उसे कारावास और जुर्माना दोनों से दंडित किया जा सकता है।
2. खतरनाक हथियारों/साधनों द्वारा घोर उपहति (Grievous Hurt) पहुँचाना - धारा 118(2): यदि कोई व्यक्ति उपरोक्त वर्णित किसी भी खतरनाक साधन या हथियार (जैसे धारदार हथियार, जहर, आग, विस्फोटक आदि) का उपयोग करके स्वेच्छया "घोर उपहति" (Grievous Hurt - यानी गंभीर चोट जैसे हड्डी टूटना, अंग कटना आदि) कारित करता है, तो कृत्य की गंभीरता बढ़ जाती है और सजा अत्यंत कठोर हो जाती है। अपवाद: यदि गंभीर चोट धारा 122 की उपधारा 2 के तहत गंभीर और अचानक उकसावे में दी गई है, तो यह प्रावधान लागू नहीं होगा। सजा (Punishment): ऐसे जघन्य अपराध के लिए दोषी को आजीवन कारावास (Imprisonment for life), या दोनों में से किसी भी भांति के कारावास की सजा दी जाएगी, जो कम से कम एक (1) वर्ष की होगी और जिसे दस (10) वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अपराधी पर अनिवार्य रूप से आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाएगा।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 एक नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 324 (खतरनाक हथियारों से साधारण चोट) और धारा 326 (खतरनाक हथियारों से गंभीर चोट) पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 118 के पूर्णतः समतुल्य हैं। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
इस विषय (खतरनाक हथियारों द्वारा चोट पहुँचाने) पर सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख और मार्गदर्शक मामले निम्नलिखित हैं:
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Mathai v. State of Kerala (2005): इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने "खतरनाक हथियार या साधन" (Dangerous weapon or means) की विस्तृत कानूनी व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई वस्तु (जैसे पत्थर या लकड़ी का डंडा) कानून की नज़र में 'खतरनाक हथियार' है या नहीं, यह पूरी तरह से उसके आकार (size), तीखेपन (sharpness) और सबसे महत्वपूर्ण रूप से 'उसके प्रयोग के तरीके' पर निर्भर करता है। एक सामान्य वस्तु को भी खतरनाक हथियार माना जा सकता है यदि उसका उपयोग ऐसे तरीके से किया गया हो जिससे मृत्यु होने की प्रबल संभावना उत्पन्न हो जाए।
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Anwarul Haq v. State of U.P. (2005): इस निर्णय में न्यायालय ने निर्धारित किया कि पुरानी IPC की धारा 326 (वर्तमान BNS की धारा 118(2)) के तहत आजीवन कारावास या 10 साल तक की कठोर सजा देने के लिए अभियोजन पक्ष को यह असंदिग्ध रूप से साबित करना होगा कि गंभीर चोट जानबूझकर (voluntarily) पहुंचाई गई है और वह विशेष रूप से किसी "खतरनाक साधन" (जैसे धारदार हथियार, विष, या ज्वलनशील पदार्थ) के इस्तेमाल से ही लगी है। केवल गंभीर चोट का होना पर्याप्त नहीं है, अपराध सिद्ध करने के लिए हथियार की प्रकृति का खतरनाक होना अनिवार्य है।
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State of U.P. v. Sughar Singh (1978): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर कुल्हाड़ी (axe), भाला या चाकू जैसे स्पष्ट रूप से प्राणघातक और धारदार हथियारों से जानबूझकर हमला करता है, तो यह मान लिया जाएगा कि उसका इरादा (intention) या ज्ञान (knowledge) ऐसा ही था कि इसके परिणामस्वरूप घोर उपहति (गंभीर चोट) होगी। ऐसे मामलों में अदालतों को कड़ी सजा देनी चाहिए क्योंकि खतरनाक हथियारों का उपयोग कृत्य की गंभीरता को कई गुना बढ़ा देता है।
