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भीड़ द्वारा किए गए हमले पर धारा 117(4) कैसे लागू होती है?

 भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 117(4) विशेष रूप से "भीड़ द्वारा किए गए हमले" (Mob Violence) और "हेट क्राइम" (Hate Crime) के मामलों में घोर उपहति (गंभीर चोट/Grievous Hurt) कारित करने पर सामूहिक उत्तरदायित्व और सख्त दंड का प्रावधान करती है। यह भारतीय आपराधिक कानून में किया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नया बदलाव है।

धारा 117(4) का विस्तृत कानूनी प्रावधान और इसके लागू होने की शर्तें:

इस धारा के प्रावधानों को लागू करने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है:

  1. व्यक्तियों की संख्या (पांच या अधिक): यह उपधारा तब लागू होती है जब कोई अपराध पांच (5) या उससे अधिक व्यक्तियों के समूह (Group of five or more persons) द्वारा एक साथ मिलकर या साझा योजना (acting in concert) के तहत किया गया हो।
  2. घोर उपहति (Grievous Hurt): इस समूह द्वारा किसी व्यक्ति को 'घोर उपहति' (जैसे हड्डी तोड़ना, अंग काटना, दृष्टि छीनना या जीवन को खतरे में डालने वाली चोट) पहुंचाई गई हो।
  3. हमले का विशिष्ट आधार (Grounds of Attack): यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यह धारा केवल तभी लागू होगी जब भीड़ द्वारा किया गया वह हमला पीड़ित की पहचान या उसके विश्वास से प्रेरित हो। कानून में इसके लिए निम्नलिखित आधार स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किए गए हैं:
    • नस्ल (Race)
    • जाति या समुदाय (Caste or community)
    • लिंग (Sex)
    • जन्म स्थान (Place of birth)
    • भाषा (Language)
    • व्यक्तिगत विश्वास (Personal belief) या कोई अन्य समान आधार।
  4. सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Liability): यदि उपरोक्त परिस्थितियों में हमला होता है, तो कानून यह नहीं देखेगा कि भीड़ के किस विशिष्ट व्यक्ति के डंडे या पत्थर से पीड़ित की हड्डी टूटी है। इस प्रावधान के तहत, उस समूह का प्रत्येक सदस्य (each member of such group) घोर उपहति (गंभीर चोट) पहुँचाने के अपराध का समान रूप से दोषी माना जाएगा।
  5. सजा का प्रावधान (Punishment): इस तरह के घृणित और सामूहिक अपराध के लिए समूह के प्रत्येक दोषी सदस्य को दोनों में से किसी भी भांति (कठोर या साधारण) के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि सात (7) वर्ष तक की हो सकती है, और प्रत्येक पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाएगा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

(महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 और इसकी धारा 117(4) हाल ही में लागू हुए हैं, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय भीड़ की हिंसा (Mob Violence), हेट क्राइम और सामूहिक दायित्व से जुड़े सुस्थापित कानूनी सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिन्हें आप स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)

भीड़ द्वारा की गई हिंसा और सामूहिक दायित्व के विषय पर सर्वोच्च न्यायालय के सबसे प्रमुख मामले निम्नलिखित हैं:

  1. Tehseen S. Poonawalla v. Union of India (2018): यह भीड़ की हिंसा (Mob Lynching) और हेट क्राइम के खिलाफ भारत के सर्वोच्च न्यायालय का सबसे ऐतिहासिक और मार्गदर्शक निर्णय है। इस मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने मॉब लिंचिंग को 'भीड़तंत्र के भयानक कृत्य' (horrendous acts of mobocracy) करार दिया था। न्यायालय ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी व्यक्ति या समूह को धर्म, जाति या समुदाय के नाम पर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। इसी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद से मॉब लिंचिंग जैसे अपराधों से निपटने के लिए एक अलग और कठोर कानून बनाने की सिफारिश की थी। BNS की धारा 117(4) (घोर उपहति के लिए) और धारा 103(2) (हत्या के लिए) सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के इसी ऐतिहासिक फैसले और दिशा-निर्देशों की वैधानिक परिणति हैं।

  2. Masalti v. State of U.P. (1964): भीड़ द्वारा किए गए हमलों में 'सामूहिक दायित्व' (Collective Liability) के सिद्धांत को स्थापित करने वाला यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला है (जो अब BNS की धारा 117(4) का मूल आधार है, जहां समूह के "प्रत्येक सदस्य" को दोषी माना जाता है)। सर्वोच्च न्यायालय की चार जजों की पीठ ने यह सुस्थापित किया कि जब कोई गंभीर अपराध किसी भीड़ (गैरकानूनी जमावड़े) द्वारा साझा उद्देश्य (common object / acting in concert) के तहत किया जाता है, तो उस भीड़ का हर वह सदस्य जो वहां जानबूझकर मौजूद था, वह उस अपराध के लिए पूरी तरह से उत्तरदायी होगा। अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि भीड़ के किस विशिष्ट व्यक्ति ने कौन सा घातक प्रहार किया था।

  3. State of U.P. v. Dan Singh (1997): यह मामला एक समुदाय विशेष के खिलाफ भीड़ द्वारा की गई हिंसा से संबंधित था। इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब एक बड़ी और उग्र भीड़ किसी विशेष समुदाय या जाति के लोगों पर लक्षित (Targeted) हमला करती है, तो अदालतों को ऐसे मामलों से अत्यंत सख्ती से निपटना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि भीड़ की मानसिकता सामूहिक उन्माद से प्रेरित होती है और ऐसे मामलों में सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत मजबूती से लागू किया जाना चाहिए ताकि समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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