भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 116 में "घोर उपहति" (Grievous Hurt) या 'गंभीर चोट' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। कानून की नज़र में हर प्रकार की चोट 'घोर उपहति' नहीं होती, बल्कि इस प्रावधान के तहत केवल आठ (8) विशेष प्रकार की चोटों को ही "घोर" (Grievous) की श्रेणी में रखा गया है।
धारा 116 के अनुसार घोर उपहति की 8 श्रेणियां: इस कानून के अनुसार, केवल निम्नलिखित प्रकार की उपहति (चोट) को ही "घोर" (Grievous) माना जाएगा:
- पुंसत्वहरण (Emasculation): किसी पुरुष को नपुंसक बना देना।
- आंख की दृष्टि का स्थायी विच्छेद: किसी भी एक या दोनों आंखों की देखने की क्षमता (sight) को स्थायी रूप से नष्ट कर देना।
- कान की श्रवण शक्ति का स्थायी विच्छेद: किसी भी एक या दोनों कानों की सुनने की क्षमता (hearing) को स्थायी रूप से नष्ट कर देना।
- किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद: शरीर के किसी भी अंग (member) या जोड़ (joint) को शरीर से अलग कर देना।
- शक्तियों का नाश या स्थायी ह्रास: शरीर के किसी भी अंग या जोड़ की कार्य करने की शक्तियों को नष्ट कर देना या स्थायी रूप से कमजोर कर देना।
- चेहरे या सिर का स्थायी विद्रूपीकरण: सिर या चेहरे पर ऐसा वार करना जिससे वह स्थायी रूप से विद्रूप (disfigured) या खराब हो जाए।
- हड्डी या दांत का टूटना या खिसकना: शरीर की किसी भी हड्डी या दांत का टूट जाना (fracture) या अपनी जगह से खिसक जाना (dislocation)।
- जीवन को खतरे में डालने वाली या 15 दिनों तक तीव्र पीड़ा देने वाली चोट: कोई भी ऐसी चोट जो पीड़ित के जीवन को खतरे में डालती हो। या, कोई ऐसी चोट जिसके कारण पीड़ित व्यक्ति पंद्रह (15) दिनों तक तीव्र शारीरिक पीड़ा (severe bodily pain) में रहता है, या अपने सामान्य दिनचर्या के कार्यों (ordinary pursuits) को करने में असमर्थ हो जाता है।
(महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव: पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 320 में इस 8वीं श्रेणी के तहत "20 दिनों" की अवधि निर्धारित थी, जिसे वर्तमान BNS, 2023 की धारा 116 में घटाकर "15 दिन" कर दिया गया है।)
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मुझे दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 हाल ही में लागू हुआ एक नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 320 (घोर उपहति) पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 116 के पूर्णतः समतुल्य है। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
'घोर उपहति' (Grievous Hurt) की परिभाषा और उसके कानूनी सिद्धान्तों पर सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख मामले निम्नलिखित हैं:
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Niranjan Singh v. State of Madhya Pradesh (2007): हड्डी टूटने (Fracture) के संदर्भ में यह सर्वोच्च न्यायालय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'हड्डी के टूटने' का अर्थ केवल हड्डी का पूरी तरह दो टुकड़ों में बंटना ही नहीं है। यदि किसी प्रहार के कारण हड्डी में एक दरार (hairline fracture) या गहरा चीरा आ जाता है, तो उसे भी कानून की नज़र में 'हड्डी का टूटना' माना जाएगा और यह सीधे तौर पर 'घोर उपहति' (Grievous Hurt) की श्रेणी में आएगा।
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State of Karnataka v. Shivalingaiah (1988): यह ऐतिहासिक मामला इस धारा की अंतिम शर्त (तीव्र पीड़ा और सामान्य कार्य न कर पाना) को स्पष्ट करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि केवल इस आधार पर कि पीड़ित व्यक्ति कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा, उसकी चोट को स्वतः ही 'घोर उपहति' नहीं माना जा सकता। यह बिना किसी संदेह के साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है कि अस्पताल में रहने के दौरान पीड़ित वास्तव में लगातार तीव्र शारीरिक पीड़ा में था या अपने रोजमर्रा के सामान्य कार्य करने में पूरी तरह असमर्थ था।
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Hori Lal v. State of U.P. (1970): इस मामले में न्यायालय ने "जीवन को खतरे में डालने वाली चोट" (Hurt which endangers life) की कानूनी व्याख्या की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी चोट को जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाला तभी माना जा सकता है, जब वह चोट वास्तव में इतनी गंभीर हो कि उससे मृत्यु होने की प्रबल और तात्कालिक संभावना उत्पन्न हो जाए। साधारण चोटों को, भले ही वे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर लगी हों, तब तक 'घोर उपहति' नहीं माना जा सकता जब तक कि वे स्पष्ट रूप से जीवन के लिए संकट पैदा न करें।
