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POCSO अधिनियम 2012 के मुख्य उद्देश्य और प्रावधान क्या हैं?

 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के मुख्य उद्देश्य और प्रावधान इस प्रकार हैं:

मुख्य उद्देश्य (Objectives):

  • बालकों का संरक्षण: इस अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य बालकों को लैंगिक हमले (sexual assault), लैंगिक उत्पीड़न (sexual harassment) और अश्लील साहित्य (pornography) जैसे जघन्य अपराधों से बचाना है।
  • विशेष न्यायालयों की स्थापना: ऐसे अपराधों का त्वरित निस्तारण (speedy trial) करने के लिए विशेष न्यायालयों (Special Courts) की स्थापना करना इसका एक प्रमुख लक्ष्य है।
  • निजता और गोपनीयता: न्यायिक प्रक्रिया के हर चरण में बालक की निजता (privacy) और गोपनीयता (confidentiality) के अधिकार का संरक्षण और सम्मान करना।
  • बालक का सर्वोत्तम हित: संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन को ध्यान में रखते हुए, यह सुनिश्चित करना कि हर स्तर पर बालक के सर्वोत्तम हित, कल्याण और उसके शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

मुख्य प्रावधान (Key Provisions):

  • बालक की परिभाषा: इस अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को "बालक" (Child) माना गया है।
  • अपराधों का वर्गीकरण और कठोर दंड:
    • अधिनियम में प्रवेशन लैंगिक हमला (Penetrative Sexual Assault), गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला (Aggravated Penetrative Sexual Assault), लैंगिक हमला और लैंगिक उत्पीड़न को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
    • इन अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है, जिसमें आजीवन कारावास (जिसका अर्थ व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास है) और कुछ गंभीर मामलों में मृत्युदंड तक शामिल है।
  • अश्लील सामग्री (Pornography) पर रोक: बालकों का अश्लील प्रयोजनों के लिए उपयोग करना, और बालक संबंधी अश्लील सामग्री का भंडारण (storage), प्रसारण या वितरण करना दंडनीय अपराध है
  • अनिवार्य रिपोर्टिंग (Mandatory Reporting):
    • यदि किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के तहत अपराध होने की आशंका है या जानकारी है, तो उसे स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस यूनिट को रिपोर्ट करना अनिवार्य है।
    • रिपोर्ट न करने पर कारावास और जुर्माने का दंड मिल सकता है। हालाँकि, बालकों पर रिपोर्ट न करने या मिथ्या परिवाद (false complaint) करने पर कोई दंड लागू नहीं होता है।
  • बालक का बयान दर्ज करने की प्रक्रिया:
    • बालक का बयान उसके निवास स्थान या उसकी पसंद के स्थान पर, यथासंभव महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए।
    • बयान दर्ज करते समय पुलिस अधिकारी वर्दी में नहीं होगा
    • पुलिस यह सुनिश्चित करेगी कि बालक किसी भी समय आरोपी के संपर्क में न आए और उसे रात में पुलिस स्टेशन में न रोका जाए।
  • न्यायालयीन प्रक्रिया और विशेष न्यायालय:
    • विशेष न्यायालयों द्वारा मामले की सुनवाई बंद कमरे में (in camera) की जाएगी।
    • साक्ष्य (evidence) दर्ज करते समय यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बालक को आरोपी दिखाई न दे (इसके लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या पर्दे का इस्तेमाल किया जा सकता है)।
    • न्यायालय में बालक से आक्रामक या चरित्र हनन संबंधी सवाल पूछने की अनुमति नहीं होगी और बालक के अनुकूल (child-friendly) वातावरण बनाया जाएगा।
    • साक्ष्य अपराध का संज्ञान लेने के 30 दिन के भीतर दर्ज किया जाना चाहिए और सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
  • मीडिया पर प्रतिबंध: मीडिया द्वारा बालक की पहचान (नाम, पता, फोटो, स्कूल आदि) उजागर करना सख्त वर्जित है और ऐसा करने पर दंड का प्रावधान है।
  • मुआवजा और विधिक सहायता: विशेष न्यायालय बालक को हुए शारीरिक या मानसिक आघात के लिए और उसके पुनर्वास के लिए मुआवजा (compensation) देने का आदेश दे सकता है। बालक को अपनी पसंद के विधिक काउंसेल (Legal Counsel) की सहायता लेने का भी अधिकार है।

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