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Section 1 of the POCSO Act 2012

 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अध्याय 1 की धारा 1 अधिनियम के संक्षिप्त नाम, इसके विस्तार (लागू होने के क्षेत्र) और इसके प्रारंभ (लागू होने की तिथि) को परिभाषित करती है।

धारा 1 के विस्तृत प्रावधान (संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ):

इस धारा को तीन मुख्य उप-धाराओं (Sub-sections) में विभाजित किया गया है:

  1. धारा 1(1) - संक्षिप्त नाम: इस उप-धारा के अनुसार, इस अधिनियम का आधिकारिक और संक्षिप्त नाम "लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012" है। यह नाम इस बात को स्पष्ट करता है कि यह विशेष कानून मुख्य रूप से बालकों (18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों) को लैंगिक (यौन) अपराधों से बचाने के उद्देश्य से वर्ष 2012 में अधिनियमित किया गया था।

  2. धारा 1(2) - अधिनियम का विस्तार: इस अधिनियम का विस्तार संपूर्ण भारत पर है।

  • महत्वपूर्ण संशोधन (Detail): प्रारंभ में इस अधिनियम के पाठ में "जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय" (Except the State of Jammu and Kashmir) शब्द शामिल थे। हालाँकि, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन के बाद, 2019 के अधिनियम संख्या 34 की धारा 95 और पांचवीं अनुसूची के माध्यम से (31 अक्टूबर 2019 से प्रभाव में) इन शब्दों का लोप (हटा दिया) कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, अब यह कानून बिना किसी अपवाद के पूरे भारतवर्ष, जिसमें जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, में समान रूप से लागू होता है।
  1. धारा 1(3) - अधिनियम का प्रारंभ: यह उप-धारा अधिनियम के लागू होने की तिथि तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को देती है। इसके अनुसार, यह अधिनियम उस तारीख को प्रवृत्त (लागू) होगा, जो केंद्रीय सरकार, भारत के राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना (Notification) द्वारा नियत करेगी।


पोक्सो अधिनियम पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

पोक्सो अधिनियम, 2012 की प्रयोज्यता, इसकी सर्वोच्चता और बालकों के संरक्षण के उद्देश्यों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक (Leading) फैसले दिए हैं:

  1. Independent Thought Vs. Union of India (2017): यह पोक्सो अधिनियम के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण (Leading Case) फैसला है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत हर वह व्यक्ति "बालक" है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित। न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद 2 को आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित किया और माना कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना भी बलात्कार (Rape) की श्रेणी में आएगा और यह पोक्सो अधिनियम के प्रावधानों के तहत दंडनीय है।

  2. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018): देश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने पोक्सो मामलों की त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) सुनिश्चित करने, विशेष अदालतों (Special Courts) के बुनियादी ढांचे में सुधार करने और बालकों के अनुकूल (Child-friendly) वातावरण बनाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए।

  3. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018): इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 33(7) (जो बालक की पहचान गुप्त रखने की बात करती है) को दृढ़ता से लागू किया। न्यायालय ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए कि किसी भी सूरत में पोक्सो मामलों की पीड़ित की पहचान (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) उजागर नहीं की जानी चाहिए।

  4. Jarnail Singh Vs. State of Haryana (2013): यद्यपि यह मामला पोक्सो अधिनियम के ठीक बाद का है, इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पीड़ित और आरोपी की उम्र निर्धारण (Age Determination) के सिद्धांतों को स्पष्ट किया। यह फैसला पोक्सो अदालतों के लिए बहुत प्रासंगिक है क्योंकि पोक्सो मामलों में यह तय करना प्राथमिक आवश्यकता होती है कि घटना के समय पीड़ित की आयु 18 वर्ष से कम थी या नहीं।

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