भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 108 सामान्य रूप से 'आत्महत्या के दुष्प्रेरण' (Abetment of suicide) के अपराध और उसके लिए दिए जाने वाले दंड का प्रावधान करती है।
धारा 108 का विस्तृत कानूनी प्रावधान: इस धारा के अनुसार, यदि कोई भी व्यक्ति आत्महत्या (suicide) करता है, और कोई अन्य व्यक्ति उस आत्महत्या को अंजाम देने के लिए उसे उकसाता है, सहायता करता है या दुष्प्रेरित (abet) करता है, तो उकसाने वाले व्यक्ति को इस धारा के तहत दंडित किया जाएगा।
सजा (Punishment): धारा 108 के तहत आत्महत्या के दुष्प्रेरण के अपराध में दोषी पाए जाने पर अपराधी को निम्नलिखित सजा दी जाएगी:
- दोनों में से किसी भी भांति (कठोर या साधारण) का कारावास, जिसकी अवधि दस वर्ष (10 years) तक की हो सकती है।
- इसके साथ ही, अपराधी पर अनिवार्य रूप से आर्थिक जुर्माना (fine) भी लगाया जाएगा।
(ध्यान दें: जहाँ BNS की धारा 107 विशेष रूप से किसी बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है, वहीं धारा 108 किसी भी सामान्य व्यक्ति (वयस्क और स्वस्थ) को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों पर लागू होती है।)
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments): (महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक मुकदमों और निर्णयों की यह जानकारी मेरे द्वारा दिए गए स्रोत दस्तावेजों का हिस्सा नहीं है। चूँकि BNS, 2023 हाल ही में लागू हुआ एक नया कानून है, इसलिए नीचे दिए गए ऐतिहासिक निर्णय मुख्य रूप से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 पर आधारित हैं, जो वर्तमान BNS की धारा 108 के पूर्णतः समतुल्य है। आप इस अतिरिक्त जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।)
आत्महत्या के दुष्प्रेरण के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ सबसे प्रमुख और मार्गदर्शक (Leading) मामले निम्नलिखित हैं:
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Gian Kaur v. State of Punjab (1996): यह आत्महत्या और उसके दुष्प्रेरण से जुड़ा सबसे बड़ा संवैधानिक फैसला है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत "जीने के अधिकार" (Right to Life) में "मरने का अधिकार" (Right to Die) शामिल नहीं है। न्यायालय ने आत्महत्या के दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) को समाज के खिलाफ एक गंभीर अपराध माना और इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
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Amalendu Pal @ Jhantu v. State of West Bengal (2010): इस प्रमुख मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि केवल उत्पीड़न (harassment) को सीधे तौर पर आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध नहीं माना जा सकता। अपराध साबित करने के लिए यह स्थापित होना चाहिए कि आरोपी द्वारा कोई ऐसा स्पष्ट और सकारात्मक कृत्य (positive act) किया गया था, जिसने मृतक को आत्महत्या करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं छोड़ा। न्यायालय ने कहा कि अपराधी का स्पष्ट इरादा (mens rea) यह होना चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति अपनी जान दे दे।
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S.S. Chheena v. Vijay Kumar Mahajan (2010): इस फैसले में अदालत ने "दुष्प्रेरण" (Abetment) की विस्तृत कानूनी व्याख्या की। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के दुष्प्रेरण का आरोप साबित करने के लिए आरोपी की ओर से उकसाने या जानबूझकर सहायता करने की एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया (active mental process) होनी चाहिए। सामान्य झगड़े या गुस्से में अचानक कहे गए शब्द (जैसे "जाओ और मर जाओ") अपने आप में आत्महत्या के दुष्प्रेरण की श्रेणी में नहीं आते हैं, जब तक कि आरोपी द्वारा वास्तव में उस व्यक्ति को मरने के लिए उकसाने का कोई ठोस कृत्य न किया गया हो।
