प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिमांड की कार्यवाही में लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि मजिस्ट्रेट पुलिस की रिमांड अर्जी को बिना उचित जांच के मंजूर नहीं कर सकते। न्यायिक कार्यभार अधिक होना भी इस जिम्मेदारी की उपेक्षा का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने मजिस्ट्रेटों के लिए रिमांड प्रक्रिया से संबंधित प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला साइबर धोखाधड़ी से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपनी हिरासत को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने गिरफ्तारी मेमो में कई कमियां पाईं और रिमांड मंजूर करने वाले मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा।
संबंधित मजिस्ट्रेट ने अपने स्पष्टीकरण में स्वीकार किया कि अत्यधिक कार्यभार और जमानत आवेदनों की अधिक संख्या के कारण रिमांड अर्जी की पर्याप्त जांच नहीं हो सकी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि रिमांड की कार्यवाही का सीधा संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी संबंधी अधिकारों से है। इसलिए मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों और पुलिस की अर्जी की स्वतंत्र रूप से जांच करे तथा न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करे।
हाईकोर्ट ने लखनऊ स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (JTRI) के निदेशक को मजिस्ट्रेटों के लिए रिमांड प्रक्रिया पर प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार कर शीघ्र प्रसारित करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि न्यायिक कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा को भविष्य में गंभीरता से लिया जाएगा।
मामले में हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो।
मामले का नाम: Arvind Pandey and Another v. State of U.P. and 4 Others

