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Section 8 of the POCSO Act 2012 लैंगिक हमले के लिए दंड Punishment for Sexual Assault

 धारा 8: लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Sexual Assault)

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अध्याय 2 की धारा 8 में 'लैंगिक हमले' (Sexual Assault) के लिए दंड का विस्तृत प्रावधान किया गया है। इस धारा के तहत दी जाने वाली सजा निम्नलिखित है:

  • कारावास की अवधि: जो कोई भी व्यक्ति बालक पर लैंगिक हमला (जो कि धारा 7 के तहत परिभाषित है) करेगा, उसे न्यूनतम तीन (3) वर्ष के कारावास की सजा दी जाएगी। इस सजा को अधिकतम पांच (5) वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • कारावास की प्रकृति: यह कारावास दोनों में से किसी भी भांति का (कठोर या साधारण) हो सकता है।
  • आर्थिक दंड: दोषी पाए जाने पर अपराधी कारावास के साथ-साथ जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

धारा 7 के साथ संबंध (Context of the Offense): चूंकि धारा 8 मुख्य रूप से धारा 7 में परिभाषित अपराध के लिए दंड तय करती है, इसलिए यह जानना आवश्यक है कि धारा 7 के तहत लैंगिक हमला तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति "लैंगिक आशय" (Sexual Intent) से बालक के निजी अंगों (योनि, लिंग, गुदा या स्तनों) को स्पर्श करता है या बालक से अपने या किसी अन्य व्यक्ति के अंगों का स्पर्श कराता है। इसमें बिना प्रवेशन (penetration) के किया गया शारीरिक संपर्क शामिल है।


भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. Attorney General for India Vs. Satish & Anr. (2021) - "The Skin-to-Skin Contact Case": यह पोक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत अब तक का सबसे महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक (Leading) फैसला माना जाता है।
  • विवाद: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में आरोपी को धारा 8 के तहत दी गई सजा से यह कहते हुए बरी कर दिया था कि आरोपी ने बच्ची के अंगों को कपड़ों के ऊपर से छुआ था, इसलिए कोई सीधा "त्वचा से त्वचा" (skin-to-skin) का संपर्क नहीं हुआ था।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस फैसले को पलट दिया और स्पष्ट रूप से कानून स्थापित किया कि धारा 8 के तहत सजा देने के लिए प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क या 'स्किन-टू-स्किन' संपर्क अनिवार्य नहीं है। यदि कृत्य के पीछे "लैंगिक आशय" मौजूद था, तो कपड़ों के ऊपर से भी किया गया स्पर्श धारा 7 के तहत 'लैंगिक हमला' माना जाएगा और आरोपी धारा 8 के तहत पूरी सजा का भागीदार होगा। न्यायालय ने कहा कि ऐसी संकीर्ण व्याख्या बच्चों के कानूनी संरक्षण को कमजोर करेगी।
  1. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022) / General Principles of Intent: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि धारा 8 के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन (Prosecution) को केवल यह साबित करना होता है कि आरोपी द्वारा किया गया स्पर्श 'लैंगिक आशय' से प्रेरित था। एक बार जब अभियोजन यह प्राथमिक तथ्य साबित कर देता है, तो पोक्सो अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत न्यायालय आरोपी की 'आपराधिक मानसिक दशा' की उपधारणा (Presumption) करता है, और आरोपी को स्वयं को निर्दोष साबित करना होता है

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