अध्याय 6: बालक के कथनों को अभिलिखित (रिकॉर्ड) करने के लिए प्रक्रिया के अंतर्गत आने वाली धारा 24 पुलिस जांच के दौरान पीड़ित बालक के लिए एक अत्यंत सुरक्षित, संवेदनशील और भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित करने के लिए विशेष पुलिस प्रक्रियाओं को अनिवार्य बनाती है।
इस धारा के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण उपधारा-वार विश्लेषण नीचे दिया गया है:
धारा 24: बालक के कथन को अभिलिखित किया जाना (Recording of statement of a child)
1. कथन दर्ज करने का स्थान और अधिकारी - धारा 24(1):
- स्थान: बालक का बयान (कथन) या तो बालक के निवास स्थान पर दर्ज किया जाएगा, या फिर ऐसे स्थान पर जहां वह साधारणतया निवास करता है, अथवा बालक की पसंद के किसी भी स्थान पर दर्ज किया जाएगा। इसका उद्देश्य बालक को पुलिस थाने की डरावनी विधिक प्रक्रियाओं से बचाना है।
- अधिकारी: बालक का कथन यथासाध्य (as far as possible) उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) की रैंक से ऊपर की किसी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही रिकॉर्ड किया जाएगा।
2. पुलिस की वर्दी पर प्रतिबंध - धारा 24(2):
- बालक के कथन को अभिलिखित करते समय बयान दर्ज करने वाला पुलिस अधिकारी वर्दी (Uniform) में नहीं होगा। पुलिस की वर्दी देखकर बच्चों में उत्पन्न होने वाले डर या संकोच को दूर करने के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण निवारक कदम है।
3. अभियुक्त से सामना न कराना - धारा 24(3):
- जांच (अन्वेषण) करने वाला पुलिस अधिकारी बालक की परीक्षा (बयान दर्ज) करते समय यह अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करेगा कि बालक किसी भी समय और किसी भी प्रकार से अभियुक्त (Accused) के संपर्क में न आए।
4. रात्रि में पुलिस स्टेशन में रोकने पर रोक - धारा 24(4):
- किसी भी बालक को, किसी भी कारण से, रात के समय किसी पुलिस स्टेशन (Police Station) में निरुद्ध (Detained/रोककर) नहीं रखा जाएगा।
5. मीडिया से पहचान की सुरक्षा - धारा 24(5):
- पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं कि बालक की पहचान पब्लिक मीडिया (Public Media) से तब तक पूरी तरह सुरक्षित रहे, जब तक कि स्वयं बालक के सर्वोत्तम हित में विशेष न्यायालय द्वारा इसके विपरीत कोई लिखित निर्देश न दे दिया गया हो।
धारा 24 (बालक अनुकूल पुलिस प्रक्रियाओं) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [धारा 24(5) के तहत बालक की पहचान की गोपनीयता पर मील का पत्थर]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो की धारा 24(5) और धारा 23(2) के संयुक्त प्रभाव की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि जांच के पहले ही दिन से (अर्थात पुलिस द्वारा धारा 24 के तहत बयान दर्ज करने के समय से ही) बालक की पहचान की गोपनीयता को बनाए रखना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है। न्यायालय ने आदेश दिया कि पुलिस प्राथमिकी (FIR) में बालक का वास्तविक नाम, स्कूल या माता-पिता का नाम सार्वजनिक नहीं करेगी और न ही जांच संबंधी किसी दस्तावेज को मीडिया के समक्ष साझा किया जाएगा।
2. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [पीड़ितों के बयान दर्ज करने की संवेदनशील प्रक्रिया पर दिशा-निर्देश]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में यौन उत्पीड़न के पीड़ितों (विशेषकर नाबालिगों) के बयान दर्ज करने के संबंध में कई ऐतिहासिक निर्देश जारी किए। न्यायालय ने माना कि जांच अधिकारियों को बाल मनोविज्ञान के अनुकूल आचरण करना चाहिए। पुलिस को बिना किसी दबाव या डराने-धमकाने वाले माहौल के, अत्यधिक संवेदनशील तरीके से और धारा 24 के कड़े अनुपालन के साथ बालक के बयानों को दर्ज करना चाहिए ताकि बालक पुनः मानसिक आघात (Secondary Victimization) से बच सके।
