जैसा कि हमने अभी पुलिस द्वारा बालक के बयानों को दर्ज करने की संवेदनशील प्रक्रिया (धारा 24) की चर्चा की है, अगला महत्वपूर्ण कानूनी चरण मजिस्ट्रेट के समक्ष बालक के बयान दर्ज करना है, जिसे अधिनियम की धारा 25 के तहत विनियमित किया जाता है।
धारा 25: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन का अभिलेखन (Record of statement of a child by Magistrate)
यह धारा मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने की विशेष और सुरक्षात्मक प्रक्रिया को स्पष्ट करती है। इसे दो मुख्य उपधाराओं में विभाजित किया गया है:
1. मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के शब्दों का हुबहू अभिलेखन - धारा 25(1):
- मूल प्रावधान: यदि किसी पीड़ित बालक का कथन दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 164 के अधीन मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया जाता है, तो उस संहिता में किसी भी सामान्य बात के होते हुए भी, बयान दर्ज करने वाला मजिस्ट्रेट बालक द्वारा बोले गए शब्दों के अनुसार ही (हूबहू) कथन को अभिलिखित करेगा। इसमें मजिस्ट्रेट अपनी ओर से शब्दों को तोड़-मरोड़ नहीं सकता।
- अभियुक्त के वकील की अनुपस्थिति (धारा 25(1) का परंतुक): दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 164 की उपधारा (1) के पहले परंतुक (proviso) में जो सामान्य कानूनी व्यवस्था दी गई है, जिसके अनुसार अभियुक्त के अधिवक्ता (वकील) की उपस्थिति की अनुमति होती है, वह पोक्सो मामलों में बालक का बयान दर्ज करते समय लागू नहीं होगी।
- विधिक महत्व: इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान देते समय पीड़ित बालक अभियुक्त के वकील की डरावनी या जिरह जैसी स्थिति से मुक्त रहकर, पूरी तरह सुरक्षित वातावरण में बिना किसी भय के अपनी बात कह सके।
2. दस्तावेजों की प्रति प्रदान करना - धारा 25(2):
- जब पुलिस द्वारा मामले की पूरी जांच करके दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत अंतिम रिपोर्ट (Charge Sheet/आरोप पत्र) न्यायालय में दाखिल कर दी जाती है, तब मजिस्ट्रेट का यह कानूनी कर्तव्य होगा कि वह बालक और उसके माता-पिता या उसके प्रतिनिधि को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के तहत निर्दिष्ट सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों की एक प्रति निःशुल्क प्रदान करेगा। इन दस्तावेजों में एफआईआर की प्रति, पुलिस के समक्ष दर्ज बयान और मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयानों की प्रतियां शामिल होती हैं ताकि वे अपना विधिक पक्ष मजबूती से रख सकें।
धारा 25 (मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [धारा 164 CrPC के तहत बयानों के त्वरित और सुरक्षित अभिलेखन पर दिशा-निर्देश]:
- निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के पीड़ितों (विशेषकर नाबालिगों) के बयानों को मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज करने के संबंध में कड़े दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायालय ने आदेश दिया कि:
- जांच अधिकारी को एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद बिना किसी देरी के पीड़ित को मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 के बयानों के लिए पेश करना चाहिए।
- बयान दर्ज करते समय मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कमरे का वातावरण बालक के अनुकूल (Child-friendly) हो और बच्चा किसी भी बाहरी दबाव, डराने-धमकाने या मानसिक तनाव में न हो।
2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [धारा 164 के बयानों की पूर्ण गोपनीयता पर मील का पत्थर]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 25 के तहत दर्ज किए गए बालक के बयान (धारा 164 CrPC के कथन) एक अत्यंत संवेदनशील और गोपनीय दस्तावेज हैं। इन कथनों को किसी भी स्थिति में मीडिया, इंटरनेट या किसी अन्य सार्वजनिक मंच पर लीक नहीं किया जा सकता। चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी, धारा 25(2) के तहत प्रतियां सौंपते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बालक की निजता को कोई ठेस न पहुंचे।
3. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022) - [मजिस्ट्रेट के समक्ष बयानों की विधिक विश्वसनीयता]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि चूंकि मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किए गए बयान कानूनी शपथ के तहत होते हैं और वहां अभियुक्त के वकील की उपस्थिति वर्जित होती है (जैसा कि पोक्सो की धारा 25(1) के परंतुक में विनिर्दिष्ट है), इसलिए विशेष न्यायालय को इन बयानों को अत्यधिक विश्वसनीय और मजबूत साक्ष्य मानना चाहिए। इन बयानों के आधार पर ही मुकदमे की दिशा तय होती है।
