धारा 23: मीडिया के लिए प्रक्रिया (Procedure for Media)
पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 5 ("मामलों की रिपोर्ट करने के लिए प्रक्रिया") न केवल अनिवार्य रिपोर्टिंग पर बल देता है, बल्कि पीड़ित बालक की निजता और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए मीडिया के ऊपर कड़े प्रतिबंध और प्रक्रियाएं भी लागू करता है. इस अध्याय की धारा 23 सीधे तौर पर मीडिया, प्रकाशकों और स्टूडियो स्वामियों की कानूनी सीमाओं को निर्धारित करती है.
इस धारा के विधिक उपबंधों का संपूर्ण खंड-वार विवरण नीचे प्रस्तुत है:
धारा 23 के कानूनी प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण:
1. बिना प्रामाणिक जानकारी के रिपोर्टिंग पर रोक - धारा 23(1):
- प्रावधान: कोई भी व्यक्ति, किसी भी प्रकार के मीडिया, स्टूडियो या फोटो चित्रण संबंधी सुविधाओं के माध्यम से, बिना किसी पूर्ण या अधिप्रमाणित (authenticated) जानकारी के, किसी बालक के संबंध में ऐसी कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं करेगा और न ही कोई ऐसी टीका-टिप्पणी (comment) करेगा जिससे उस बालक की ख्याति (reputation) का हनन होता हो या उसकी निजता (privacy) का उल्लंघन होना परिलक्षित होता हो.
2. बालक की पहचान उजागर करने पर पूर्ण प्रतिबंध - धारा 23(2):
- पहचान की गोपनीयता: किसी भी मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया) में आने वाली किसी भी रिपोर्ट में बालक की पहचान को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उजागर नहीं किया जाएगा.
- वर्जित विवरण: इस गोपनीयता के दायरे में निम्नलिखित विवरणों का प्रकटीकरण पूर्णतः प्रतिबंधित है:
- बालक का नाम और पता.
- उसका फोटोग्राफ (चित्र).
- उसके परिवार के ब्यौरे.
- उसका विद्यालय (स्कूल) या कॉलेज.
- उसका पड़ोस (निवास स्थान).
- कोई भी ऐसी अन्य विशिष्ट जानकारी (particulars) जिससे बालक की पहचान का सीधे या परोक्ष रूप से पता चल सकता हो.
- विशेष न्यायालय को छूट का अधिकार (परंतुक): यदि मामले की सुनवाई करने वाले सक्षम विशेष न्यायालय की यह राय है कि बालक की पहचान का प्रकटीकरण स्वयं बालक के सर्वोत्तम हित (best interest of the child) में है, तो न्यायालय ऐसे कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित (record) करके पहचान उजागर करने की अनुमति दे सकता है.
3. प्रकाशक या स्वामी का सामूहिक उत्तरदायित्व - धारा 23(3):
- संयुक्त दायित्व (Joint and Several Liability): मीडिया, स्टूडियो या फोटो चित्रण सुविधाओं का कोई भी प्रकाशक (Publisher) या स्वामी (Owner), अपने अधीन कार्यरत कर्मचारियों के सभी कृत्यों (actions) और लोपों (omissions/गलतियों) के लिए संयुक्त रूप से और पृथक रूप से जिम्मेदार माना जाएगा. इसका अर्थ है कि यदि किसी पत्रकार या संपादक ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उस मीडिया संस्थान का मालिक भी कानूनी रूप से समान सजा और जुर्माने का हकदार होगा.
4. उल्लंघन की दशा में दंड का प्रावधान - धारा 23(4):
- कठोर दंड: जो कोई भी व्यक्ति धारा 23 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के प्रावधानों का उल्लंघन (यानी बिना जानकारी के टिप्पणी करना या बालक की पहचान उजागर करना) करेगा, उसे किसी भी भांति के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि न्यूनतम छह (6) मास की होगी, जिसे एक (1) वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा, या वह जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडनीय होगा.
धारा 23 (पीड़ित की गोपनीयता) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgment):
1. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [पीड़ित की गोपनीयता और मीडिया रिपोर्टिंग पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- तथ्य और विवाद: इस जनहित याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह गंभीर प्रश्न था कि क्या पुलिस प्राथमिकताओं (FIRs), अदालती फैसलों और मीडिया रिपोर्टों में यौन शोषण के शिकार नाबालिगों की पहचान अप्रत्यक्ष रूप से उजागर होना उनके सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है.
- सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 23(2) की विस्तृत व्याख्या करते हुए अत्यंत कड़े और ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए:
- अप्रत्यक्ष प्रकटीकरण पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'पहचान का प्रकटीकरण' केवल नाम उजागर करने तक सीमित नहीं है. यदि मीडिया या पुलिस कोई ऐसा विवरण (जैसे पिता का नाम, विशिष्ट पता, स्कूल का नाम, या घटना स्थल की ऐसी विशिष्टता जिससे बच्चे की पहचान मुमकिन हो) प्रकाशित करती है, तो वह भी धारा 23 का उल्लंघन माना जाएगा.
- पुलिस और एफआईआर (FIR) पर निर्देश: पुलिस विभाग पोक्सो मामलों की प्राथमिकी (FIR) को किसी भी ऑनलाइन पोर्टल या सार्वजनिक डोमेन में अपलोड नहीं करेगा. जांच डायरी और चार्जशीट में पीड़ित बालक के स्थान पर कृत्रिम या छद्म नाम (जैसे 'Victim X') का उपयोग किया जाएगा.
- मृतक बालकों की गोपनीयता: यदि पीड़ित बालक की मृत्यु हो चुकी है, तो भी उसकी निजता और गरिमा की रक्षा के लिए उसकी पहचान को उजागर नहीं किया जा सकता, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी या विशेष न्यायालय इसके लिए लिखित आदेश जारी न करे.
