अध्याय 2 की धारा 6: गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Aggravated Penetrative Sexual Assault)
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 6 में 'गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले' (जिसे अधिनियम की धारा 5 में विस्तार से परिभाषित किया गया है) के लिए अत्यंत कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। 2019 में हुए संशोधनों के बाद इस धारा को और अधिक सख्त बना दिया गया है, जिसमें मृत्युदंड तक का प्रावधान शामिल कर लिया गया है।
इस धारा को दो मुख्य उप-धाराओं में विभाजित किया गया है:
1. धारा 6(1) - कारावास और मृत्युदंड का प्रावधान: इस उप-धारा के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति किसी बालक पर 'गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला' करेगा, उसे कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा दी जाएगी। इस कारावास की न्यूनतम अवधि बीस (20) वर्ष निर्धारित की गई है। अपराध की गंभीरता को देखते हुए इस सजा को 'आजीवन कारावास' तक बढ़ाया जा सकता है। इस अधिनियम में आजीवन कारावास का स्पष्ट रूप से अर्थ बताया गया है कि अपराधी को उसके "शेष प्राकृत जीवनकाल" (remainder of natural life) के लिए जेल में रखा जाएगा। इसके साथ ही, अपराधी जुर्माने का भी दायी होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धारा के तहत अत्यंत जघन्य अपराधों के लिए अपराधी को मृत्युदंड (Death Penalty) से भी दंडित किया जा सकता है।
2. धारा 6(2) - जुर्माने का भुगतान और पीड़ित का पुनर्वास: यह उप-धारा विशेष रूप से पीड़ित के अधिकारों और उसके पुनर्वास पर केंद्रित है। इसके अनुसार, धारा 6(1) के अधीन अदालत द्वारा जो भी जुर्माना लगाया जाएगा, वह पूरी तरह से न्यायोचित (just) और युक्तियुक्त (reasonable) होना चाहिए। इस जुर्माने से प्राप्त होने वाली राशि का भुगतान सीधे पीड़ित को किया जाएगा। इस राशि का मुख्य उद्देश्य पीड़ित के चिकित्सा व्ययों (medical expenses) की पूर्ति करना और समाज में उसके उचित पुनर्वास (rehabilitation) को सुनिश्चित करना है।
धारा 6 (गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड और मृत्युदंड) के संदर्भ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
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Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018): यह एक ऐतिहासिक जनहित याचिका (PIL) थी, जिसने पोक्सो अधिनियम की धारा 6 में 2019 के संशोधनों की नींव रखी। देश में बच्चों (विशेषकर बहुत छोटी बच्चियों) के साथ होने वाले जघन्य गुरुतर बलात्कार के मामलों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को ऐसे मामलों में मृत्युदंड (Capital Punishment) का प्रावधान करने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसी दबाव और दिशा-निर्देशों के परिणामस्वरूप संसद ने 2019 में संशोधन पारित किया और धारा 6 में "मृत्यु से दंडित किया जाएगा" के प्रावधान को शामिल कर इसे देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक बना दिया।
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Shatrughna Baban Meshram Vs. State of Maharashtra (2020): यह मामला पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत मृत्युदंड दिए जाने के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण (Leading) नजीर है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि विधायिका ने धारा 6 के तहत 2019 के संशोधन से बाल यौन शोषण के गुरुतर मामलों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया है, लेकिन अदालतों को मृत्युदंड देते समय 'दुर्लभ से दुर्लभ' (Rarest of Rare) मामले के सिद्धांत का सख्ती से पालन करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि उम्रकैद (शेष प्राकृतिक जीवन तक) नियम है और मृत्युदंड केवल तभी दिया जाना चाहिए जब अपराधी के सुधार की कोई गुंजाइश न बचे और अपराध का तरीका रूह कंपा देने वाला हो।
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State of Madhya Pradesh Vs. Vikram Das (2019): इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि जब कोई अपराध पोक्सो की धारा 5 के तहत साबित हो जाता है, तो धारा 6 के तहत निर्धारित "न्यूनतम अनिवार्य सजा" (Minimum Mandatory Sentence - जो अब कम से कम 20 वर्ष है) से कम सजा देने का अदालतों को कोई विवेकाधिकार (Discretion) नहीं है। किसी भी प्रकार की सहानुभूति या अपराधी की युवावस्था को आधार बनाकर सजा को वैधानिक न्यूनतम सीमा से कम नहीं किया जा सकता।
