भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 101 "हत्या" (Murder) की स्पष्ट कानूनी परिभाषा प्रदान करती है। यह धारा इस बात को निर्धारित करती है कि किन विशेष परिस्थितियों में 'आपराधिक मानव वध' (Culpable Homicide - जिसे धारा 100 में परिभाषित किया गया है) 'हत्या' की गंभीर श्रेणी में आता है।
हत्या की परिस्थितियां (धारा 101 के मुख्य प्रावधान): इस धारा के अनुसार, कानून में दिए गए कुछ अपवादों को छोड़कर, आपराधिक मानव वध 'हत्या' है यदि यह निम्नलिखित में से किसी एक परिस्थिति में किया गया हो:
- मृत्यु कारित करने का स्पष्ट इरादा (Intention): यदि वह कृत्य सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने (जान लेने) के स्पष्ट इरादे से किया गया हो।
- घातक चोट का ज्ञान और इरादा: यदि कृत्य इस इरादे से किया गया हो कि पीड़ित को ऐसी शारीरिक चोट पहुंचे, जिसके बारे में अपराधी भली-भांति जानता हो कि उससे उस व्यक्ति की मृत्यु होने की पूरी संभावना है।
- प्रकृति के सामान्य क्रम में मृत्यु के लिए पर्याप्त चोट: यदि कृत्य किसी व्यक्ति को ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने के इरादे से किया गया हो, जो 'प्रकृति के सामान्य क्रम' (ordinary course of nature) में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त हो।
- आसन्न रूप से खतरनाक कृत्य (Imminently dangerous): यदि कृत्य करने वाला व्यक्ति यह जानता है कि उसका कार्य इतना खतरनाक है कि पूरी संभावना है कि यह मृत्यु का कारण बनेगा, और वह व्यक्ति किसी वैध कारण या बचाव के बिना ऐसा जोखिम उठाकर कृत्य को अंजाम देता है।
अपवाद (Exceptions - कब आपराधिक मानव वध 'हत्या' नहीं माना जाएगा): कानून की इस धारा में 5 विशेष अपवाद (Exceptions) दिए गए हैं, जहाँ किसी की मृत्यु कारित करने के बावजूद उस कृत्य को 'हत्या' (Murder) नहीं बल्कि केवल 'आपराधिक मानव वध' (Culpable homicide not amounting to murder) माना जाएगा:
- अपवाद 1 - गंभीर और अचानक प्रकोपन (Grave and sudden provocation): यदि अपराधी को किसी ने इतना गंभीर और अचानक उकसावा दिया हो कि उसका आत्म-नियंत्रण (self-control) पूरी तरह से छिन गया हो, और इस स्थिति में उसने उकसाने वाले व्यक्ति की (या गलती/दुर्घटना से किसी अन्य की) जान ले ली हो। (हालांकि, अपराधी ने स्वयं उकसावे की स्थिति न पैदा की हो)।
- अपवाद 2 - निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का सद्भावनापूर्ण उल्लंघन (Right of private defence): यदि अपराधी सद्भावना (good faith) में अपने शरीर या संपत्ति की रक्षा कर रहा था, लेकिन उसने बिना किसी दुर्भावना के कानून द्वारा दी गई बचाव की सीमा को पार कर लिया और हमलावर की मृत्यु कारित कर दी।
- अपवाद 3 - लोक सेवक द्वारा कानूनी शक्तियों का उल्लंघन: यदि कोई लोक सेवक (या उसकी मदद करने वाला व्यक्ति) सार्वजनिक न्याय के हित में सद्भावना से काम कर रहा था, लेकिन उसने गलती से अपनी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन करते हुए किसी की मृत्यु कारित कर दी।
- अपवाद 4 - अचानक हुई लड़ाई (Sudden fight): यदि बिना किसी पूर्व योजना (without premeditation) के, अचानक हुए झगड़े और भावावेश (heat of passion) में मृत्यु कारित हो जाती है। शर्त यह है कि अपराधी ने अनुचित लाभ न उठाया हो या क्रूरता से व्यवहार न किया हो।
- अपवाद 5 - पीड़ित की मृत्यु के लिए सहमति (Consent): यदि जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई है, उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो और उसने मृत्यु का जोखिम उठाने के लिए अपनी स्वतंत्र सहमति (consent) दी हो।
सरल शब्दों में, धारा 101 यह तय करती है कि किसी व्यक्ति की जान लेना कब धारा 103 के तहत 'हत्या' का जघन्य अपराध बनेगा, और कब इसे कुछ रियायतों (अपवादों) के कारण 'आपराधिक मानव वध' के रूप में देखा जाएगा।
