घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 28 — प्रक्रिया
धारा 28 यह निर्धारित करती है कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अंतर्गत होने वाली कार्यवाही किस प्रक्रिया के अनुसार चलेगी। इस धारा का मूल उद्देश्य यह है कि अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही के लिए सामान्यतः दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की प्रक्रिया लागू रहे, लेकिन धारा 12 और धारा 23(2) की कार्यवाही के संबंध में Magistrate को अपनी प्रक्रिया निर्धारित करने की विशेष स्वतंत्रता भी दी गई है।
धारा 28 का वैधानिक प्रावधान
धारा 28(1) के अनुसार, जब तक इस अधिनियम में अन्यथा प्रावधान न किया गया हो, धारा 12, 18, 19, 20, 21, 22 और 23 के अंतर्गत सभी कार्यवाहियां तथा धारा 31 के अंतर्गत अपराधों की कार्यवाही CrPC, 1973 के प्रावधानों द्वारा शासित होगी।
धारा 28(2) एक महत्वपूर्ण अपवाद प्रदान करती है। इसके अनुसार, धारा 28(1) की कोई बात न्यायालय को धारा 12 के आवेदन या धारा 23(2) के अंतर्गत आवेदन के निपटारे के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करने से नहीं रोकती।
इस प्रकार धारा 28 को समझने के लिए दो अलग-अलग पहलुओं को समझना आवश्यक है।
धारा 28(1) — CrPC की प्रक्रिया का सामान्य अनुप्रयोग
धारा 28(1) का सामान्य नियम यह है कि अधिनियम में जिन कार्यवाहियों का उल्लेख किया गया है, उनमें CrPC की प्रक्रिया लागू होगी।
इसमें धारा 12 के अंतर्गत मुख्य आवेदन, धारा 18 के संरक्षण आदेश, धारा 19 के निवास आदेश, धारा 20 के मौद्रिक राहत, धारा 21 के अभिरक्षा आदेश, धारा 22 के क्षतिपूर्ति आदेश तथा धारा 23 के अंतरिम एवं एकपक्षीय आदेशों से संबंधित कार्यवाही शामिल है। इसी प्रकार धारा 31 के अंतर्गत संरक्षण आदेश के उल्लंघन से संबंधित अपराध की कार्यवाही भी धारा 28(1) में आती है।
अर्थात DV Act की कार्यवाही पूरी तरह किसी स्वतंत्र procedural code के अधीन नहीं है। Legislature ने सामान्य procedural framework के रूप में CrPC को अपनाया है।
हालाँकि, यह नियम स्वयं धारा 28(1) के प्रारंभिक शब्दों “Save as otherwise provided in this Act” के अधीन है। इसका अर्थ है कि यदि DV Act में किसी विषय पर कोई विशेष प्रक्रिया दी गई है, तो उस विशेष प्रावधान को प्राथमिकता मिलेगी।
उदाहरण के लिए, धारा 13 में notice की service के संबंध में विशेष व्यवस्था है। Magistrate द्वारा hearing की तारीख की सूचना Protection Officer को दी जाती है और Protection Officer उसे respondent तथा अन्य निर्देशित व्यक्ति पर prescribed manner से serve कराता है। सामान्यतः यह सेवा अधिकतम दो दिनों में या Magistrate द्वारा दिए गए reasonable further time में की जानी है।
इसी प्रकार धारा 24 में DV Act के अंतर्गत पारित आदेश की प्रतियां संबंधित पक्षों, पुलिस अधिकारी और संबंधित service provider को निःशुल्क दिए जाने की विशेष व्यवस्था है। इसलिए procedural matters में DV Act के विशेष प्रावधानों को नजरअंदाज करके केवल सामान्य CrPC procedure लागू नहीं किया जा सकता।
धारा 28(2) — न्यायालय अपनी प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है
धारा 28(2) इस धारा का सबसे महत्वपूर्ण भाग है।
इसमें कहा गया है कि धारा 28(1) के बावजूद न्यायालय धारा 12 के आवेदन अथवा धारा 23(2) के अंतर्गत आवेदन के निपटारे के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि Magistrate मनमानी प्रक्रिया अपना सकता है। इसका उद्देश्य DV Act की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए ऐसी procedure अपनाने की अनुमति देना है जिससे relief proceedings प्रभावी और शीघ्रता से आगे बढ़ सकें।
धारा 12 के आवेदन में aggrieved person, Protection Officer या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति Magistrate के सामने relief के लिए आवेदन कर सकता है। Magistrate को Domestic Incident Report, यदि प्राप्त हुई हो, पर विचार करना होता है और अधिनियम में first hearing तथा disposal के संबंध में भी समयसीमा संबंधी निर्देश दिए गए हैं।
इसी प्रकार धारा 23(2) Magistrate को prima facie domestic violence के disclosure या उसके होने की संभावना के आधार पर ex parte order पारित करने की शक्ति देती है। ऐसा आदेश protection, residence, monetary relief, custody या compensation से संबंधित हो सकता है।
इसलिए धारा 28(2) का practical महत्व विशेष रूप से उन proceedings में है जहाँ तत्काल protection अथवा interim relief की आवश्यकता होती है।
धारा 12 और धारा 23(2) में विशेष प्रक्रिया का महत्व
धारा 12 DV Act की मुख्य remedial proceeding है। इसमें महिला protection order, residence order, monetary relief, custody order, compensation आदि राहत मांग सकती है। Rules में ऐसी application के लिए Form II निर्धारित किया गया है।
दूसरी ओर धारा 23(2) तत्काल एवं एकपक्षीय राहत का प्रावधान करती है। यदि application prima facie यह disclose करती है कि respondent domestic violence कर रहा है, कर चुका है अथवा ऐसी violence की संभावना है, तो Magistrate prescribed affidavit के आधार पर respondent की अनुपस्थिति में भी order पारित कर सकता है।
इसलिए इन दोनों प्रकार की कार्यवाहियों में rigid procedural technicalities को लागू करना DV Act के remedial उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है। धारा 28(2) इसी आवश्यकता को accommodate करती है।
क्या DV Act की कार्यवाही civil है या criminal?
धारा 28 के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि DV Act की proceedings को केवल criminal proceeding माना जाए या civil proceeding।
धारा 28(1) में कुछ proceedings के लिए CrPC को लागू किया गया है, लेकिन DV Act के अंतर्गत उपलब्ध reliefs—जैसे residence, protection, monetary relief, custody और compensation—का स्वरूप मुख्यतः remedial/protective है।
इसलिए केवल इसलिए कि CrPC की procedural provisions लागू होती हैं, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रत्येक relief proceeding अपने substantive character में criminal prosecution बन जाती है।
यह distinction विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि धारा 31 के अंतर्गत protection order या interim protection order के breach को स्वतंत्र offence बनाया गया है। इसलिए धारा 12 के मूल relief proceeding और धारा 31 के breach prosecution को एक ही प्रकृति की proceeding समझना उचित नहीं है। धारा 31 में breach के लिए imprisonment और fine का प्रावधान है तथा धारा 32 के अनुसार यह offence cognizable और non-bailable है।
धारा 28 और धारा 31 का संबंध
धारा 28(1) स्पष्ट रूप से कहती है कि धारा 31 के अंतर्गत offences CrPC की प्रक्रिया द्वारा governed होंगे।
धारा 31(1) के अनुसार protection order या interim protection order का breach स्वयं DV Act के अंतर्गत offence है और इसके लिए अधिकतम एक वर्ष का imprisonment, अथवा अधिकतम ₹20,000 fine, अथवा दोनों हो सकते हैं।
धारा 31(2) यह भी कहती है कि जहाँ तक practicable हो, breach का trial उसी Magistrate द्वारा किया जाएगा जिसने वह protection order पारित किया था।
इस प्रकार धारा 28 और 31 को साथ पढ़ने पर स्थिति यह बनती है कि relief proceeding और breach prosecution अलग-अलग procedural dimensions रखते हैं।
धारा 28 और DV Act Rules, 2006
DV Act की धारा 28 को Protection of Women from Domestic Violence Rules, 2006 के साथ पढ़ना आवश्यक है। Rules 2006, 26 अक्टूबर 2006 से लागू हुए थे।
Rules में notice की service के लिए Rule 12 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि Act की proceedings से संबंधित notices Protection Officer या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा respondent के ordinarily residing या gainfully employed address पर serve किए जा सकते हैं। Notice की service के लिए, as far as practicable, Order V CPC या Chapter VI CrPC की provisions अपनाई जा सकती हैं। साथ ही proceedings को Act द्वारा निर्धारित समयसीमा के भीतर शीघ्र पूरा करने के लिए court अतिरिक्त steps भी निर्देशित कर सकता है।
यह Rule धारा 28 की practical working को स्पष्ट करता है कि procedural law को DV Act की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनाया जाना है।
इसी प्रकार counselling proceedings के लिए Rules में counsellor की appointment तथा उसके काम करने की अलग व्यवस्था है। Counsellor court या Protection Officer की general supervision में कार्य करता है और उसे fairness तथा justice के principles से guided होकर domestic violence को समाप्त करने की दिशा में कार्य करना होता है।
वर्तमान कानून के संदर्भ में CrPC का उल्लेख
आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई DV Act की statutory copy में धारा 28 में Code of Criminal Procedure, 1973 का स्पष्ट उल्लेख है।
इसलिए इस provision का मूल statutory text समझाते समय धारा 28(1) का यही शब्दांकन आधार है। साथ ही DV Act के विभिन्न provisions में CrPC का संदर्भ भी दिखाई देता है, जैसे धारा 20 में maintenance के लिए तत्कालीन धारा 125 CrPC का उल्लेख है।
धारा 28 का व्यावहारिक अर्थ
व्यावहारिक रूप से धारा 28 का अर्थ यह है कि DV Act proceedings में procedure पूरी तरह technical और rigid नहीं है, क्योंकि सामान्यतः CrPC लागू होने के बावजूद धारा 12 और धारा 23(2) के disposal के लिए Magistrate अपनी procedure निर्धारित कर सकता है।
लेकिन जहाँ Act ने स्वयं कोई विशेष procedure निर्धारित कर दी है, वहाँ उस special provision का पालन किया जाएगा। इसी कारण धारा 13 की notice service, धारा 23 की ex parte relief और Rules में prescribed forms एवं service mechanism को धारा 28 के साथ पढ़ना आवश्यक है।
परीक्षा एवं न्यायिक दृष्टि से सार
धारा 28 का मूल सिद्धांत है कि DV Act की निर्दिष्ट proceedings और धारा 31 के offences सामान्यतः CrPC के अधीन चलेंगे, लेकिन धारा 12 तथा धारा 23(2) के applications के disposal के लिए Magistrate अपनी procedure निर्धारित कर सकता है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण distinction यह है कि धारा 28(1) सामान्य procedural rule है, जबकि धारा 28(2) धारा 12 और धारा 23(2) के लिए procedural flexibility प्रदान करता है। यह flexibility DV Act में उपलब्ध तत्काल protective और remedial relief को प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
