धारा 46: कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति (Power to remove difficulties)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अंतिम अध्याय 9 (प्रकीर्ण) की धारा 46 एक संक्रमणकालीन उपबंध (Transitional Provision) है। यह धारा अधिनियम को लागू करने के शुरुआती चरणों में आने वाली किसी भी व्यावहारिक या प्रक्रियात्मक बाधा को दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार को विशेष शक्तियां प्रदान करती है।
धारा 46 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. केंद्र सरकार द्वारा कठिनाइयों का निवारण - धारा 46(1):
- असाधारण शक्ति: यदि इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी (लागू) करने में कोई भी व्यावहारिक कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे प्रावधान या निर्देश जारी कर सकती है जो उसे उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन (उचित) प्रतीत होते हों।
- अनिवार्य सीमाएं (Mandatory Safeguards): इस विशेष शक्ति के प्रयोग पर संसद ने दो अत्यंत कड़े प्रतिबंध लगाए हैं:
- असंगति का निषेध (No Inconsistency): केंद्र सरकार द्वारा जारी किया गया ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम (पोक्सो एक्ट) के मूल उपबंधों के असंगत (Inconsistent) नहीं होना चाहिए।
- समय-सीमा (Sunset Clause): ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख (14 नवंबर 2012) से दो (2) वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि यह शक्ति केवल कानून के लागू होने के शुरुआती दो वर्षों (2012 से 2014) के लिए ही वैध थी।
2. संसदीय नियंत्रण (Parliamentary Control) - धारा 46(2):
- सदन के समक्ष रखना: कार्यपालिका (Executive) द्वारा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग रोकने के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि इस धारा के अधीन जारी किया गया प्रत्येक आदेश, जारी होने के पश्चात यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन (लोकसभा और राज्यसभा) के समक्ष विचारार्थ रखा जाएगा।
"कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति" (Henry VIII Clause) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Jalan Trading Co. (P) Ltd. Vs. Mill Mazdoor Sabha (1966) - [कठिनाई निवारण शक्ति की संवैधानिक सीमाओं पर]:
- विधिक सिद्धांत: इस ऐतिहासिक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने "कठिनाइयों को दूर करने वाले खंडों" (Removal of Difficulties Clause) के विधिक स्वरूप की विस्तृत व्याख्या की।
- न्यायालय की व्यवस्था: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति" के तहत कार्यपालिका केवल कानून को सुचारू रूप से लागू करने के लिए मामूली और प्रक्रियात्मक बदलाव कर सकती है। इस शक्ति का उपयोग करके कार्यपालिकाparent अधिनियम (मूल कानून) के बुनियादी ढांचे, उसकी नीति या उसकी आवश्यक विशेषताओं में कोई भी बदलाव या संशोधन नहीं कर सकती है। यदि कोई आदेश मूल अधिनियम की भावना के विरुद्ध जाता है, तो उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया जाएगा।
2. Madeva Upendra Sinai Vs. Union of India (1975) - [हेनरी अष्टम खंड के अनुप्रयोग का न्यायिक पैमाना]:
- विधिक सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि कार्यपालिका कब और किस सीमा तक इस शक्ति का प्रयोग कर सकती है।
- न्यायालय का निर्णय: न्यायालय ने माना कि "कठिनाई" का अर्थ ऐसी वास्तविक व्यावहारिक अड़चन से है जो विधायिका के ध्यान में कानून बनाते समय नहीं आई थी। इस शक्ति का उपयोग केवल उस व्यावहारिक बाधा को साफ करने के लिए किया जा सकता है, न कि अपने मनमुताबिक नए दंडात्मक या नागरिक अधिकार सृजित करने के लिए। पोक्सो की धारा 46(1) में दी गई "असंगति के निषेध" की शर्त इसी न्यायिक सिद्धांत पर आधारित है।
इस धारा 46 के साथ ही लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के सभी 9 अध्यायों की कुल 46 धाराएं पूर्ण होती हैं।
