धारा 45: नियम बनाने की शक्ति (Power to make rules)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 (प्रकीर्ण) के अंतर्गत आने वाली धारा 45 इस कानून के प्रभावी और व्यावहारिक संचालन के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक आधार प्रदान करती है। यह धारा केन्द्रीय सरकार को पोक्सो कानून के विभिन्न प्रावधानों को जमीनी स्तर पर सुचारू रूप से लागू करने के लिए आवश्यक नियम (Rules) बनाने की अनन्य और व्यापक विधायी शक्ति सौंपती है।
इसी धारा के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार ने पोक्सो नियम, 2012 और बाद में उन्हें प्रतिस्थापित करते हुए और अधिक विस्तृत व कड़े पोक्सो नियम, 2020 (POCSO Rules, 2020) का निर्माण किया है।
धारा 45 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. नियम बनाने की सामान्य शक्ति - धारा 45(1):
- प्रावधान: केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों (Purposes) को व्यावहारिक रूप से कार्यान्वित (Implement) करने के लिए, राजपत्र (Gazette) में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी।
- विधिक निहितार्थ: यह उपधारा कार्यपालिका (Executive) को यह अधिकार देती है कि वे कानून की मूल भावना को सुदृढ़ करने के लिए विस्तृत प्रशासनिक प्रक्रियाएं और तंत्र विकसित करें।
2. नियम बनाने के विशिष्ट विषय - धारा 45(2):
यह उपधारा उन विशिष्ट क्षेत्रों और विषयों की सूची निर्धारित करती है जिनके संबंध में सरकार नियम बना सकती है। इन विषयों के तहत बनाए जाने वाले नियमों का दायरा निम्नलिखित है:
- अश्लील सामग्री (CSAM) के निस्तारण और रिपोर्टिंग की रीति - धारा 45(2)(क) और (कक):
- प्रावधान: धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन किसी बालक को संलिप्त करने वाली किसी भी रूप में की अश्लील सामग्री (Child Sexual Abuse Material) को मिटाने, नष्ट करने या कानून द्वारा मनोनीत (अभिहित) प्राधिकारी को इसकी सूचना/रिपोर्ट देने का तरीका तय करना।
- प्रावधान: धारा 15 की उपधारा (2) के तहत ऐसी अश्लील सामग्री के प्रसारण या प्रसार के बारे में रिपोर्ट करने की विशिष्ट रीति निर्धारित करना।
- (नोट: इन दोनों खंडों को वर्ष 2019 के कड़े संशोधनों के बाद अधिनियम में शामिल किया गया था।)
- अनुवादक, दुभाषिए और विशेष शिक्षकों की योग्यता व फीस - धारा 45(2)(कख):
- प्रावधान: धारा 19(4), धारा 26(2), धारा 26(3) और धारा 38 के तहत गवाही या बयान दर्ज करते समय सहायता के लिए नियुक्त किए जाने वाले:
- अनुवादकों (Translators) या दुभाषियों (Interpreters),
- विशेष शिक्षकों (Special Educators),
- बालक से संपर्क करने की विशेष शैली से परिचित व्यक्तियों, या
- उस क्षेत्र के किसी विशिष्ट विशेषज्ञ (Expert) की अनिवार्य शैक्षणिक अर्हताएं (Qualifications), उनका अनुभव, और उन्हें दी जाने वाली फीस व मानदेय निर्धारित करना।
- प्रावधान: धारा 19(4), धारा 26(2), धारा 26(3) और धारा 38 के तहत गवाही या बयान दर्ज करते समय सहायता के लिए नियुक्त किए जाने वाले:
- बालक की देखरेख, संरक्षण और आपात चिकित्सा - धारा 45(2)(ख):
- प्रावधान: धारा 19 की उपधारा (5) के अधीन पीड़ित बालक की आपातकालीन शारीरिक व मानसिक देखरेख, सुरक्षा और उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराने सहित आपात चिकित्सीय उपचार (Emergency Medical Treatment) की प्रक्रिया निर्धारित करना।
- बालक को मिलने वाला मुआवजा (प्रतिकर) - धारा 45(2)(ग):
- प्रावधान: धारा 33 की उपधारा (8) के अधीन विशेष न्यायालय द्वारा पीड़ित बालक को शारीरिक या मानसिक आघात के लिए अथवा उसके पुनर्वास के लिए संदेय प्रतिकर (Compensation) के निर्धारण और भुगतान की रीति विहित करना।
- अधिनियम के क्रियान्वयन की मानीटरी - धारा 45(2)(घ):
- प्रावधान: धारा 44 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य आयोगों (SCPCR) द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों की आवधिक निगरानी (Periodic Monitoring) करने का तरीका तय करना।
3. संसदीय नियंत्रण और विधायी सुरक्षा - धारा 45(3):
यह उपधारा कार्यपालिका द्वारा बनाई गई नियम-निर्माण की शक्तियों पर संसद के नियंत्रण (Parliamentary Oversight) को सुनिश्चित करती है।
- संसद के पटल पर रखना: इस धारा के तहत बनाया गया प्रत्येक नियम बनने के तुरंत बाद संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जब वे सत्र में हों।
- 30 दिन की अवधि की अनिवार्यता: नियम को कुल तीस (30) दिनों की अवधि के लिए सदन के समक्ष रखा जाना अनिवार्य है। यह अवधि एक ही सत्र में या दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों (Consecutive Sessions) में पूरी हो सकती है।
- नियमों में संशोधन या निरस्तीकरण: यदि इस अवधि की समाप्ति से पहले संसद के दोनों सदन नियम में कोई परिवर्तन (Modification) करने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो वह नियम केवल उसी परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा। यदि दोनों सदन सहमत हो जाएं कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो वह नियम पूरी तरह निष्प्रभावी (Void) हो जाएगा। हालांकि, इस निरस्तीकरण से पहले उस नियम के तहत किए गए किसी भी कार्य की वैधता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
धारा 45 के नियमों (पोक्सो नियम, 2020) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Smruti Tukaram Badade Vs. State of Maharashtra (2022) - [सपोर्ट पर्सन (Support Person) के नियमों पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- तथ्य और निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 45(2)(कख) के तहत बनाए गए पोक्सो नियम, 2020 के नियम 4 और 5 के व्यावहारिक क्रियान्वयन की विस्तृत समीक्षा की। ये नियम पीड़ित बच्चे की सहायता के लिए एक 'सपोर्ट पर्सन' (सहायक व्यक्ति) की नियुक्ति और उसकी भूमिका से संबंधित हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था: न्यायालय ने देश की सभी अदालतों को कड़ा निर्देश दिया कि गवाही के दौरान बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को सहज बनाए रखने के लिए सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। न्यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) को आदेश दिया कि वे इन नियमों के तहत अर्हताप्राप्त बाल मनोवैज्ञानिकों और समाजसेवकों की एक सूची तैयार रखें और उन्हें उचित व समय पर मानदेय का भुगतान सुनिश्चित करें।
2. Just Rights for Children Alliance Vs. S. Harish (2024) - [अश्लील सामग्री (CSAM) के नियमों और सुरक्षा ऑडिट पर]:
- तथ्य और निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 45(2)(क) और (कक) के तहत अश्लील सामग्री की रिपोर्टिंग और उसके विनाश से जुड़े नियमों की व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया कंपनियों का यह विधिक दायित्व है कि वे पोक्सो नियमों के तहत बनाए गए कड़े तकनीकी दिशानिर्देशों का पालन करें ताकि बच्चों से जुड़ी किसी भी अश्लील सामग्री को तुरंत ब्लॉक या नष्ट किया जा सके। न्यायालय ने नियमों की कठोरता को बालकों के सर्वोत्तम हितों के अनुकूल माना।
