धारा 44: अधिनियम के क्रियान्वयन की मानीटरी (Monitoring of implementation of Act)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 (प्रकीर्ण) के अंतर्गत आने वाली धारा 44 इस कानून के जमीनी स्तर पर प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र निगरानी प्रणाली (Supervisory Framework) स्थापित करती है। यह धारा देश की दो शीर्ष बाल अधिकार संस्थाओं—राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR)—को इस अधिनियम के प्रावधानों की निगरानी करने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत और शक्तिशाली बनाती है।
इस धारा के विधिक प्रावधानों का विस्तृत उपधारा-वार विश्लेषण निम्नलिखित है:
धारा 44 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. राष्ट्रीय और राज्य बाल आयोगों द्वारा निगरानी का दायित्व - धारा 44(1):
- निगरानी संस्थाएं:
- बालक अधिकार संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCPCR): जो बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 की धारा 3 के तहत गठित है।
- बालक अधिकार संरक्षण के लिए राज्य आयोग (SCPCR): जो उक्त अधिनियम, 2005 की धारा 17 के तहत संबंधित राज्यों में गठित है।
- अतिरिक्त कर्तव्य: ये दोनों आयोग अपने मूल अधिनियम (2005 के कानून) के तहत सौंपे गए कार्यों के अलावा, इस अधिनियम (पोक्सो) के उपबंधों के क्रियान्वयन की निगरानी (मानीटरी) करेंगे।
- विहित रीति: यह मानीटरी ऐसी रीति (तरीके) से की जाएगी जो इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों द्वारा निर्धारित (विहित) की जाए।
2. जांच करने की शक्तियां (Powers of Inquiry) - धारा 44(2):
- समान विधिक शक्तियां: जब राष्ट्रीय आयोग या कोई राज्य आयोग इस अधिनियम (पोक्सो) के अधीन किसी अपराध से संबंधित किसी मामले या शिकायत की जांच (Inquiry) कर रहा होगा, तो उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो उसे बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत जांच करते समय प्राप्त होती हैं।
- विधिक निहितार्थ: इसका अर्थ यह है कि जांच के दौरान इन आयोगों को दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियां प्राप्त होती हैं, जिसके तहत वे किसी भी अधिकारी या गवाह को समन जारी कर सकते हैं, दस्तावेजों को मंगा सकते हैं और हलफनामे पर सबूत ले सकते हैं।
3. वार्षिक रिपोर्ट में गतिविधियों का समावेश - धारा 44(3):
- अनिवार्य प्रकटीकरण: राष्ट्रीय आयोग और राज्य आयोग इस धारा के अधीन पोक्सो अधिनियम की निगरानी और जांच से जुड़ी अपनी सभी वार्षिक गतिविधियों, टिप्पणियों और सिफारिशों को बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 की धारा 16 में निर्दिष्ट अपनी वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report) में भी अनिवार्य रूप से सम्मिलित करेंगे।
- विधिक उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना है कि देश में बाल सुरक्षा और पोक्सो अधिनियम के क्रियान्वयन की वास्तविक प्रगति रिपोर्ट संसद और संबंधित राज्य विधानसभाओं के पटल पर रखी जा सके।
धारा 44 (मानीटरी और बाल आयोगों की भूमिका) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [पोक्सो मामलों की निगरानी पर ऐतिहासिक स्वतः संज्ञान]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान धारा 44 के क्रियान्वयन को अत्यधिक सुदृढ़ करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने माना कि केवल मामलों की जांच करना ही काफी नहीं है, बल्कि देश भर में पोक्सो मुकदमों की प्रगति पर कड़ी नजर रखना आवश्यक है।
- अदालत का निर्देश: न्यायालय ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य आयोगों को निर्देश दिया कि वे देश के सभी जिलों से पोक्सो मामलों के लंबित रहने के आंकड़ों को संकलित करें, विशेष पोक्सो अदालतों के बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन करें, और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) के साथ मिलकर 'सपोर्ट पर्सन' (सहायक व्यक्तियों) की उपलब्धता की नियमित निगरानी करें।
2. Exploitation of Children in Orphanages in the State of Tamil Nadu Vs. Union of India (2017) - [आयोगों के सक्रिय और अनिवार्य कर्तव्यों पर]:
- निर्णय: इस महत्वपूर्ण मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो की धारा 44 के तहत राष्ट्रीय और राज्य आयोगों को दी गई मानीटरी की शक्तियां केवल औपचारिक या कागजी नहीं हैं।
- अदालत का निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि बाल अधिकार आयोगों का यह वैधानिक और संवैधानिक कर्तव्य है कि वे देश के सभी बाल गृहों (Orphanages/Child Care Institutions) का औचक निरीक्षण (Surprise Inspections) और सुरक्षा ऑडिट (Safety Audit) करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन संस्थानों में रह रहे बच्चे किसी भी प्रकार के लैंगिक उत्पीड़न या पोक्सो अपराधों के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित हैं। यदि आयोगों को कोई विसंगति मिलती है, तो वे सीधे कानून लागू करने वाली एजेंसियों को कार्रवाई करने का निर्देश दे सकते हैं।
