धारा 43: अधिनियम के बारे में लोक जागरूकता (Public awareness about the Act)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 (प्रकीर्ण) के अंतर्गत आने वाली धारा 43 केवल अपराधियों को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस कानून के व्यावहारिक क्रियान्वयन और सामाजिक रोकथाम के लिए एक मजबूत सुरक्षात्मक ढांचा तैयार करती है. यह धारा केन्द्रीय सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार पर यह वैधानिक जिम्मेदारी डालती है कि वे समाज में जागरूकता फैलाएं और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को बाल अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाएं.
धारा 43 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Detailed Analysis):
इस धारा के अनुसार, केन्द्रीय और राज्य सरकारें कानून के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप देने के लिए निम्नलिखित दो मुख्य मोर्चों पर कड़े कदम उठाने के लिए विधिक रूप से बाध्य हैं:
1. जनसामान्य, बच्चों और अभिभावकों में जागरूकता - धारा 43(क):
- नियमित अंतराल पर प्रचार-प्रसार: सरकारें यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करेंगी कि नियमित समय-अंतरालों पर पोक्सो कानून के सुरक्षात्मक प्रावधानों का समाज में व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए.
- प्रसार के माध्यम: इस प्रचार के लिए मीडिया के सभी प्रमुख रूपों का उपयोग किया जाएगा, जिसमें टेलीविज़न (Television), रेडियो (Radio) और प्रिंट मीडिया (Print/Newspaper Media) शामिल हैं.
- जागरूकता के लक्षित वर्ग: इसका मूल उद्देश्य केवल कानून की धाराओं का प्रदर्शन करना नहीं है, बल्कि:
- साधारण जनता (General Public) को कानून के कड़े नियमों के प्रति सचेत करना.
- स्वयं बालकों (Children) को उनके विधिक अधिकारों से परिचित कराना.
- उनके माता-पिता (Parents) और संरक्षकों (Guardians) को अनिवार्य रिपोर्टिंग (धारा 19) और पीड़ित बच्चों को मिलने वाली कानूनी व चिकित्सकीय सुरक्षा के प्रति जागरूक करना.
2. अधिकारियों और पुलिस का आवधिक प्रशिक्षण (Periodic Training) - धारा 43(ख):
- प्रशिक्षण की अनिवार्यता: सरकारें अधिनियम के प्रावधानों के सही कार्यान्वयन से संबंधित विषयों पर निरंतर और आवधिक प्रशिक्षण (Periodic Training) आयोजित करेंगी.
- लक्षित अधिकारी: इस संवेदनशील प्रशिक्षण के दायरे में निम्नलिखित को शामिल करना अनिवार्य है:
- केन्द्रीय और राज्य सरकारों के प्रशासनिक अधिकारी.
- इस कानून को लागू करने से जुड़े अन्य सभी संबद्ध व्यक्ति (Associated Persons).
- विशेष रूप से पुलिस अधिकारी (Police Officers), जिन्हें बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) और बाल-अनुकूल जांच प्रणालियों के प्रति संवेदनशील बनाना बेहद आवश्यक है.
धारा 43 (लोक जागरूकता और प्रशिक्षण) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [पुलिस और विशेष अभियोजकों के संवेदीकरण और प्रशिक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्वतः संज्ञान मामले की निगरानी करते हुए धारा 43(ख) के सुस्त क्रियान्वयन पर चिंता व्यक्त की थी। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि कानून का सही क्रियान्वयन तभी संभव है जब पुलिस और न्यायिक अधिकारी संवेदनशील हों।
- अदालत का निर्देश: न्यायालय ने आदेश दिया कि केंद्र और राज्यों के गृह विभागों को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के साथ मिलकर देश के प्रत्येक जिले में विशेष संवेदीकरण कार्यक्रम (Sensitisation Programmes) आयोजित करने चाहिए। इसमें पुलिस थानों के बाल कल्याण अधिकारियों और विशेष लोक अभियोजकों को बालकों के साथ व्यवहार करने, भयमुक्त वातावरण प्रदान करने और उनके मानसिक आघात को कम करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाए।
2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [धारा 43(क) के तहत जागरूकता और कलंक (Stigma) को समाप्त करने पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक मामले में माना कि यौन शोषण की रिपोर्टिंग न होने का मुख्य कारण सामाजिक लज्जा और कलंक है। न्यायालय ने सरकारों को निर्देशित किया कि धारा 43 की मूल भावना के अनुरूप, मुख्यधारा के मीडिया और विशेष रूप से डिजिटल माध्यमों पर ऐसे व्यापक और संवेदी विज्ञापन चलाए जाएं जो पीड़ित के अधिकारों और पहचान की गोपनीयता को रेखांकित करते हों, ताकि लोग बिना किसी लोक-संकोच के मामलों की त्वरित रिपोर्ट कर सकें।
3. Bachpan Bachao Andolan Vs. Union of India (2011) - [स्कूलों में बाल सुरक्षा जागरूकता की अनिवार्यता]:
- निर्णय: यद्यपि यह निर्णय पोक्सो अधिनियम के लागू होने से कुछ समय पहले का है, परंतु यह बच्चों के अधिकारों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का सबसे अग्रणी मामला है। न्यायालय ने देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया था कि वे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'गुड टच और बैड टच' (Good Touch and Bad Touch) और बाल यौन उत्पीड़न के खतरों के प्रति जागरूकता सत्र नियमित रूप से आयोजित करें। इस सिद्धांत को बाद में पोक्सो की धारा 43(क) के प्रचार कार्यक्रमों में एक मुख्य तत्व के रूप में शामिल किया गया।
