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Section 42-A of POCSO Act 2012 धारा 42क: अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना (Act not in derogation of any other law)

 धारा 42क: अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना (Act not in derogation of any other law)

पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 (प्रकीर्ण) के अंतर्गत आने वाली धारा 42क इस विशेष कानून को भारत के अन्य सभी कानूनों पर एक सर्वोच्च विधिक दर्जा प्रदान करती है। यह धारा स्पष्ट करती है कि यदि बालकों के लैंगिक अपराधों से संरक्षण के संबंध में पोक्सो और किसी अन्य कानून के बीच कोई विरोधाभास या मतभेद होता है, तो पोक्सो कानून के प्रावधान ही सर्वोपरि होंगे।

इस धारा के विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है:

धारा 42क के कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण (Detailed Legal Analysis):

1. अतिरिक्त सुरक्षा का सिद्धांत (In Addition to, Not in Derogation):

  • इस धारा का पहला हिस्सा यह स्पष्ट करता है कि पोक्सो अधिनियम के उपबंध (Provisions) तत्समय प्रवृत्त (उस समय देश में लागू) किसी भी अन्य कानून के प्रावधानों के अतिरिक्त (in addition to) होंगे, न कि उनके अल्पीकरण (derogation / कम करने) में
  • विधिक निहितार्थ: इसका अर्थ यह है कि पोक्सो कानून का उद्देश्य बालकों के अधिकारों को मजबूत करना है, न कि पहले से मौजूद किसी अन्य कल्याणकारी कानून (जैसे बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 या किशोर न्याय अधिनियम, 2015) के तहत बच्चों को मिलने वाले विधिक लाभों को कम या समाप्त करना। यह कानून अन्य कानूनों के पूरक के रूप में कार्य करता है।

2. अध्यारोही प्रभाव (Overriding Effect / Non-Obstante clause):

  • इस धारा का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह विनिर्दिष्ट करता है कि यदि पोक्सो अधिनियम और किसी अन्य कानून के बीच कोई असंगति (conflict/contradiction/टकराव) पैदा होती है, तो इस अधिनियम (पोक्सो) के प्रावधानों का उस असंगति की सीमा तक ऐसी किसी अन्य विधि के उपबंधों पर अध्यारोही प्रभाव (Overriding Effect) होगा
  • विधिक निहितार्थ: इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि जब भी किसी बाल यौन उत्पीड़न के मामले में पोक्सो अधिनियम का कोई प्रावधान देश के किसी अन्य सामान्य कानून (जैसे सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता) या किसी व्यक्तिगत कानून (Personal Law) से टकराएगा, तो अन्य सभी कानूनों को दरकिनार कर पोक्सो कानून के कड़े सुरक्षात्मक और दंडात्मक प्रावधानों को ही कानूनी रूप से लागू किया जाएगा।



धारा 42क (अध्यारोही प्रभाव) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Independent Thought Vs. Union of India (2017) - [व्यक्तिगत कानूनों और सामान्य दंड संहिता (IPC) पर पोक्सो का सर्वोपरि प्रभाव]:

  • तथ्य और निर्णय: इस मील का पत्थर साबित होने वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 का तत्कालीन अपवाद 2 (जिसके तहत पति द्वारा अपनी 15 से 18 वर्ष के बीच की नाबालिग पत्नी के साथ संभोग करना बलात्कार नहीं माना जाता था) पोक्सो के तहत अपराध माना जाएगा?
  • सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 42क के अध्यारोही प्रभाव को लागू करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने माना कि चूंकि पोक्सो के तहत "बालक" की परिभाषा में 18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति शामिल है, इसलिए पोक्सो के प्रावधान आईपीसी के उस अपवाद और बाल विवाह की अनुमति देने वाले विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) पर पूरी तरह हावी होंगे। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ भी यौन संबंध बनाना पोक्सो के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा।

2. Ganesan Vs. State (Represented by Inspector of Police) (2020) - [दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की सामान्य प्रक्रियाओं पर पोक्सो का अध्यारोही प्रभाव]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत मुकदमों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए इसकी प्रक्रियाएं सामान्य आपराधिक कानून (CrPC) पर हावी होती हैं। न्यायालय ने धारा 42क का हवाला देते हुए माना कि विशेष पोक्सो अदालतों को बिना किसी सुपुर्दगी (Committal) प्रक्रिया के सीधे अपराधों का संज्ञान लेने का जो अधिकार धारा 33(1) के तहत प्राप्त है, वह CrPC की धारा 193 के सामान्य प्रतिबंधों पर अध्यारोही प्रभाव रखता है।

3. Just Rights for Children Alliance Vs. S. Harish (2024) - [विशेष अधिनियमों के टकराव में पोक्सो की सर्वोच्चता]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 42क के वैधानिक मंतव्य को स्पष्ट करते हुए दोहराया कि जब भी बालकों से संबंधित किसी संवेदनशील विषय (जैसे बाल अश्लील सामग्री या ऑनलाइन दुरुपयोग) पर पोक्सो अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम के बीच विधिक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होगी, तो पोक्सो के बाल-अनुकूल प्रावधानों को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।


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