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Section 40 of POCSO Act 2012 धारा 40: विधिक काउंसेल की सहायता लेने का बालक का अधिकार (Right of child to take assistance of legal counsel)

 धारा 40: विधिक काउंसेल की सहायता लेने का बालक का अधिकार (Right of child to take assistance of legal counsel)

पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 ("प्रकीर्ण") के अंतर्गत आने वाली धारा 40 पीड़ित बालक और उसके परिवार को कानूनी सहायता और प्रतिनिधित्व प्रदान करने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार सुनिश्चित करती है. यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि शोषित बालक का पक्ष अदालत में मजबूती और संवेदनशीलता के साथ रखा जा सके, भले ही उसका परिवार आर्थिक रूप से सक्षम हो या न हो.

इस धारा के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण और व्यावहारिक निहितार्थ नीचे दिए गए हैं:


धारा 40 के मुख्य विधिक प्रावधानों का विश्लेषण (Statutory Analysis):

धारा 40 के विधिक पाठ को दो मुख्य अधिकारों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. अपनी पसंद के वकील (Legal Counsel) को नियुक्त करने का अधिकार:

  • मूल प्रावधान: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 301 के परंतुक (proviso) के अधीन रहते हुए, बालक का कुटुंब (परिवार) या उसका संरक्षक (guardian), इस अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध के लिए अपनी पसंद के विधिक काउंसेल (निजी वकील/Advocate of their choice) की सहायता लेने के लिए हकदार होगा.
  • CrPC की धारा 301 के परंतुक से संबंध: सामान्यतः आपराधिक मामलों में अभियोजन का संचालन सरकारी वकील (लोक अभियोजक) करता है और पीड़ित का निजी वकील केवल सहायक की भूमिका में लिखित दलीलें दे सकता है. लेकिन पोक्सो की धारा 40 के तहत, बालक के परिवार के निजी वकील को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जांच और सुनवाई के दौरान बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा के लिए विशेष लोक अभियोजक (SPP) के साथ सक्रिय रूप से समन्वय और सहायता कर सके.

2. निःशुल्क सरकारी वकील पाने का अधिकार (Right to Free Legal Aid):

  • अनिवार्य प्रावधान: यदि बालक का कुटुंब या संरक्षक निजी विधिक काउंसेल का व्यय (फीस और खर्च) वहन करने में असमर्थ है, तो विधिक सेवा प्राधिकरण (Legal Services Authority - LSA) उसे राज्य के खर्चे पर निःशुल्क वकील (Advocate) उपलब्ध कराएगा.
  • विधिक दायित्व: यह जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) का एक वैधानिक दायित्व है कि जैसे ही उनके संज्ञान में ऐसा मामला आए, वे पीड़ित बालक के परिवार को तुरंत एक कानूनी प्रतिनिधि प्रदान करें.



धारा 40 (विधिक सहायता का अधिकार) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Smruti Tukaram Badade Vs. State of Maharashtra (2022) - [निःशुल्क कानूनी सहायता और 'सपोर्ट पर्सन' पर अग्रणी निर्णय]:

  • निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 39 और 40 की संयुक्त व्याख्या करते हुए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो पीड़ित बालक के परिवार को कानूनी सहायता (Legal Aid) प्राप्त करने का अधिकार मुकदमे के सबसे शुरुआती चरण (यानी एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद) से ही मिल जाता है.
  • अदालत का निर्देश: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को एफआईआर की सूचना मिलते ही पीड़ित बच्चे के परिवार से संपर्क करना चाहिए और यदि वे वकील का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, तो बिना किसी औपचारिकता की देरी के तुरंत एक सक्षम वकील और 'सपोर्ट पर्सन' नियुक्त करना चाहिए.

2. Delhi Domestic Working Women's Forum Vs. Union of India (1995) - [पीड़ितों के कानूनी प्रतिनिधित्व पर ऐतिहासिक नींव]:

  • निर्णय: यद्यपि यह निर्णय पोक्सो अधिनियम के अस्तित्व में आने से पहले का है, लेकिन यह यौन उत्पीड़न के शिकार नाबालिगों/महिलाओं को कानूनी सहायता देने के संबंध में भारत का सबसे पहला और ऐतिहासिक मार्गदर्शक केस है.
  • स्थापित सिद्धांत: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दिशा-निर्देश जारी किए थे कि यौन शोषण के पीड़ितों को पुलिस पूछताछ/अन्वेषण के चरण से लेकर अदालत में विचारण पूरा होने तक हर स्तर पर कानूनी सहायता और प्रतिनिधित्व (Legal Representation) मिलना अनिवार्य है. न्यायालय ने माना कि बिना किसी वकील के एक पीड़ित बच्चा जटिल कानूनी सवालों के जाल में फंस जाता है, जिससे न्याय प्रभावित होता है. इसी सिद्धांत को बाद में पोक्सो की धारा 40 के रूप में कानूनी अमलीजामा पहनाया गया.


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