पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 9 (प्रकीर्ण) के अंतर्गत आने वाली धारा 39 पीड़ित बालक को कानूनी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता प्रदान करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करती है। यह धारा राज्य सरकार पर यह जिम्मेदारी डालती है कि वह जांच और अदालती प्रक्रिया के दौरान बच्चों की सहायता के लिए विशेषज्ञों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की मदद लेने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश बनाए।
धारा 39: विशेषज्ञों आदि की सहायता लेने के लिए बालक के लिए मार्गनिर्देश (Guidelines for child to take assistance of experts, etc.)
1. मूल कानूनी प्रावधान (Statutory Provision):
अधिनियम की धारा 39 के अनुसार, राज्य सरकार, इस निमित्त (इस उद्देश्य के लिए) बनाए जाने वाले नियमों के अधीन रहते हुए, निम्नलिखित की सहायता लेने के संबंध में मार्गनिर्देश (Guidelines) तैयार करेगी:
- गैर-सरकारी संगठनों (NGOs),
- वृत्तिकों (Professionals/पेशेवरों), और
- विशेषज्ञों (Experts) या ऐसे व्यक्तियों जिनके पास निम्नलिखित क्षेत्रों में विशेष ज्ञान हो:
- मनोविज्ञान (Psychology)
- सामाजिक कार्य (Social Work)
- चिकित्सीय स्वास्थ्य (Medical Health)
- मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)
- बाल विकास (Child Development)
2. सहायता के चरण (Stages of Assistance):
यह मार्गनिर्देश बालक को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दोहरा आघात न पहुंचे, यह सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित दोनों चरणों पर सहयोग प्रदान करने के लिए बनाए जाएंगे:
- पूर्व विचारण प्रक्रम (Pre-trial stage): यानी एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच, अन्वेषण और साक्ष्य संकलन के दौरान।
- विचारण प्रक्रम (Trial stage): यानी विशेष न्यायालय के समक्ष मुकदमे की सुनवाई, गवाही दर्ज होने और जिरह के दौरान।
3. विधिक उद्देश्य (Legal Objective):
इस धारा का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यौन अपराधों का सामना करने वाला बच्चा अवांछित अदालती माहौल और जटिल कानूनी भाषा के कारण भयभीत न हो। बाल मनोवैज्ञानिकों और प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति से बच्चे को संबल मिलता है, जिससे वह अपने साथ हुई घटना को बिना किसी अतिरिक्त मानसिक आघात (Secondary Victimization) के सुसंगत रूप से व्यक्त कर पाता है।
धारा 39 और सपोर्ट पर्सन (Support Person) के सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Smruti Tukaram Badade Vs. State of Maharashtra (2022) - [सपोर्ट पर्सन और विशेषज्ञों की नियुक्ति पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 39 और पोक्सो नियम, 2020 के तहत 'सपोर्ट पर्सन' (सहायक व्यक्ति) की भूमिका पर विस्तृत और ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायालय ने माना कि धारा 39 के तहत मार्गनिर्देशों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे के साथ हर समय एक योग्य विशेषज्ञ या सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे जो उसकी मानसिक स्थिति को संभाल सके।
- अदालत के मुख्य निर्देश:
- अदालतों और जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे के साथ मौजूद 'सपोर्ट पर्सन' बाल मनोविज्ञान और बाल अधिकारों का विशेषज्ञ हो।
- यदि बच्चे का परिवार निजी वकील या विशेषज्ञ का खर्च उठाने में असमर्थ है, तो बाल कल्याण समिति (CWC) या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) का यह कानूनी कर्तव्य है कि वे तुरंत बच्चे के लिए एक विशेषज्ञ 'सपोर्ट पर्सन' नियुक्त करें।
- इन विशेषज्ञों को उनके कार्य के लिए नियमित और सम्मानजनक मानदेय (Remuneration) दिया जाना चाहिए ताकि वे पूरी निष्ठा से बच्चे की मदद कर सकें।
2. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [जांच के दौरान मनोवैज्ञानिक सहायता की अनिवार्यता]:
- निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यौन आघात (Trauma) से गुजर रहे बच्चे को कानूनी सहायता के साथ-साथ तुरंत मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग (Psychological Counseling) की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने धारा 39 की भावना के अनुरूप निर्देश दिया कि पुलिस को बयान दर्ज करते समय बाल मनोवैज्ञानिकों और समाज सेवकों की मदद लेनी चाहिए ताकि बच्चा अपनी आपबीती सहजता से साझा कर सके और उसे पुलिस स्टेशन के माहौल से डर न लगे।
