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Section 38 of POCSO Act 2012 धारा 38: बालक का साक्ष्य अभिलिखित करते समय किसी दुभाषिए या विशेषज्ञ की सहायता लेना (Assistance of an interpreter or a special educator/expert while recording the evidence of child)

 धारा 38: बालक का साक्ष्य अभिलिखित करते समय किसी दुभाषिए या विशेषज्ञ की सहायता लेना (Assistance of an interpreter or a special educator/expert while recording the evidence of child)

पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") की धारा 38 यह सुनिश्चित करती है कि भाषा, शारीरिक या मानसिक बाधाओं के कारण कोई भी पीड़ित बालक अदालत में अपनी बात रखने और न्याय पाने से वंचित न रह जाए। यह धारा विशेष न्यायालय (जज) को गवाही दर्ज करते समय दुभाषिए, अनुवादक या विशेष शिक्षकों की सहायता लेने का अधिकार देती है।


धारा 38 के विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण:

इस धारा को दो महत्वपूर्ण उपधाराओं में विभाजित किया गया है:

1. अनुवादक या दुभाषिए की सहायता - धारा 38(1):

  • प्रावधान: जब कभी भी विशेष न्यायालय को यह आवश्यक प्रतीत होता है, तब वह बालक का साक्ष्य (गवाही) दर्ज करते समय किसी ऐसे अनुवादक (Translator) या दुभाषिए (Interpreter) की सहायता ले सकेगा, जिसके पास इस कार्य के लिए निर्धारित अर्हताएं (qualifications) और अनुभव हो।
  • भुगतान: ऐसे दुभाषिए या अनुवादक को विहित नियमों के अधीन तय की गई फीस का संदाय (भुगतान) किया जाएगा।
  • विधिक उद्देश्य: यदि बच्चा किसी ऐसी क्षेत्रीय भाषा, बोली या संकेत भाषा (sign language) का उपयोग करता है जिससे न्यायालय सीधे परिचित नहीं है, तो संचार बाधाओं को दूर करने के लिए यह व्यवस्था की गई है।

2. विशेष शिक्षक या विशेषज्ञ की सहायता (दिव्यांग बालकों के लिए) - धारा 38(2):

यह उपधारा शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम (दिव्यांग) बच्चों को विशेष संरक्षण प्रदान करती है:

  • प्रावधान: यदि पीड़ित बालक मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त (physically or mentally disabled) है, तो विशेष न्यायालय बालक का साक्ष्य दर्ज करने के लिए निम्नलिखित की सहायता ले सकेगा:
    • किसी विशेष शिक्षक (Special Educator) की,
    • बालक से संपर्क करने की विशेष रीति से सुपरिचित (familiar) किसी व्यक्ति की, या
    • उस क्षेत्र से जुड़े किसी विशेषज्ञ (Expert) की।
  • अहर्ता और फीस: ऐसे विशेषज्ञ, विशेष शिक्षक या परिचित व्यक्ति के पास विहित अर्हताएं और अनुभव होना चाहिए, और उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित फीस का भुगतान किया जाएगा।
  • विधिक उद्देश्य: मूक-बधिर, दृष्टिबाधित या गंभीर मानसिक आघात/मस्तिष्क पक्षाघात (Cerebral Palsy) से पीड़ित बच्चे अपनी गवाही विशेष सांकेतिक भाषा या व्यवहार के माध्यम से देते हैं। यह उपधारा यह सुनिश्चित करती है कि उनके बयानों को पूरी विधिक शुद्धता के साथ रिकॉर्ड किया जाए।



धारा 38 (विशेष सहायता) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Smruti Tukaram Badade Vs. State of Maharashtra (2022) - [संवेदनशील गवाह और 'सपोर्ट पर्सन' / विशेष शिक्षक की भूमिका पर विस्तृत दिशा-निर्देश]:

  • निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 38 और 'संवेदनशील गवाह निवारण केंद्र' (Vulnerable Witness Deposition Centres - VWDC) की कार्यप्रणाली की विस्तृत समीक्षा की। न्यायालय ने देश की सभी अदालतों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए:
    • अदालत में बच्चे की गवाही के दौरान एक 'सपोर्ट पर्सन' (सहायक व्यक्ति) या विशेष शिक्षक का उपस्थित होना केवल एक औपचारिकता नहीं है; उनकी भूमिका बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से सहज रखना और कोर्ट की तकनीकी बातों को सरल भाषा में बच्चे को समझाना है।
    • विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों के मामलों में, विशेष न्यायालयों को धारा 38(2) का कड़ाई से पालन करना चाहिए और केवल प्रमाणित विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए।

2. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [विशेष श्रेणी के बालकों के बयानों की संवेदनशीलता पर]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जिन मामलों में पीड़ित बालक मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर है, वहां जांच एजेंसी और अदालत दोनों को अत्यधिक संवेदनशीलता से कार्य करना चाहिए। यदि गवाही दर्ज करते समय धारा 38 के तहत विशेष शिक्षक या दुभाषिए की मदद नहीं ली जाती है, तो बच्चे के बयान की विधिक प्रामाणिकता पर असर पड़ सकता है। अतः न्यायालयों को स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे विशेषज्ञों की नियुक्ति करनी चाहिए।


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