धारा 37: विचारण का बंद कमरे में संचालन (Trial to be conducted in camera)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") के अंतर्गत आने वाली धारा 37 पीड़ित बालक की गोपनीयता, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान करती है। यह धारा सामान्य खुली अदालतों (Open Courts) के विपरीत बंद कमरे में सुनवाई (In-camera Trial) की व्यवस्था को अनिवार्य बनाती है, ताकि बच्चा बिना किसी लोक संकोच, भय या दबाव के अपनी बात न्यायालय के समक्ष रख सके।
इस धारा के विधिक उपबंधों का विस्तृत और गहन विश्लेषण नीचे दिया गया है:
धारा 37 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Statutory Analysis):
धारा 37 को दो मुख्य भागों (मूल नियम और उसके अपवाद/परंतुक) के रूप में समझा जा सकता है:
1. बंद कमरे में विचारण का मूल नियम:
- अनिवार्य बंद कमरा सुनवाई: विशेष न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन आने वाले मामलों का विचारण (Trial) अनिवार्य रूप से बंद कमरे (In-camera) में संचालित करेगा।
- बंद कमरे का अर्थ: इसका अर्थ यह है कि सुनवाई के दौरान न्यायालय कक्ष में आम जनता, अनावश्यक तीसरे पक्ष, या मीडिया को उपस्थित रहने की अनुमति नहीं होती है। केवल मामले से सीधे जुड़े पक्षकार (अभियुक्त, उसका वकील, पीड़ित, लोक अभियोजक और न्यायालय के कर्मचारी) ही कक्ष में उपस्थित रह सकते हैं।
- विश्वसनीय व्यक्तियों की उपस्थिति का अधिकार: यह विचारण बालक के माता-पिता या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाएगा, जिसमें बालक का पूर्ण विश्वास या भरोसा हो।
- विधिक उद्देश्य: अपरिचित अदालती माहौल में बालक को अकेलापन महसूस न हो और वह अपने माता-पिता या किसी विश्वसनीय रिश्तेदार/मित्र की उपस्थिति में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके।
2. अपवाद/परंतुक (Proviso) - न्यायालय परिसर से बाहर गवाही दर्ज करना:
- विशेष परिस्थिति में वैकल्पिक स्थान: यदि विशेष न्यायालय की यह राय है कि बालक की मानसिक या शारीरिक स्थिति अथवा सुरक्षा कारणों से बालक की परीक्षा (गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया) न्यायालय कक्ष से भिन्न (outside the court premises) किसी अन्य स्थान पर किए जाने की आवश्यकता है, तो न्यायालय एक विशेष विधिक प्रक्रिया अपनाएगा।
- कमिशन जारी करने की शक्ति: ऐसी परिस्थिति में, न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 284 के उपबंधों के अनुसरण में 'कमीशन' (Commission) निकालने के लिए आवश्यक विधिक कार्यवाही करेगा।
- विधिक निहितार्थ: इसके तहत न्यायालय एक कमिश्नर (आमतौर पर एक न्यायिक अधिकारी या वकील) की नियुक्ति करता है, जो बालक के निवास स्थान, अस्पताल या किसी अन्य अनुकूल और सुरक्षित स्थान पर जाकर बालक का बयान/साक्ष्य दर्ज करता है, जिससे बालक को न्यायालय आने के तनाव से पूरी तरह बचाया जा सके।
धारा 37 (बंद कमरे में सुनवाई) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Punjab Vs. Gurmit Singh & Others (1996) - [बंद कमरे में सुनवाई को अनिवार्य बनाने पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- निर्णय: यद्यपि यह निर्णय पोक्सो अधिनियम के पारित होने से पहले का है, लेकिन यह भारत का सबसे अग्रणी और मार्गदर्शक केस है जिसने यौन अपराधों में इन-कैमरा (In-camera) सुनवाई के सिद्धांत को सुदृढ़ किया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यौन उत्पीड़न के मामलों का विचारण बंद कमरे में करना केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह पीड़ित की निजता और समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है। न्यायालय ने कहा कि बंद कमरे में सुनवाई करने से पीड़ित को जनता की उत्सुक और आक्रामक निगाहों से बचाया जा सकता है, जिससे वह बिना किसी मानसिक प्रताड़ना के अपनी गवाही दे सके।
2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [पीड़ित की पूर्ण गोपनीयता और बंद कमरे की सुनवाई पर मील का पत्थर]:
- निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 23(2), 24(5), 33(7) और धारा 37 के एकीकृत प्रभाव की व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि:
- धारा 37 के तहत बंद कमरे में चलने वाली सुनवाई की कोई भी कार्यवाही या बयानों के अंश किसी भी स्थिति में बाहर लीक नहीं होने चाहिए।
- सक्षम विशेष न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बंद कमरे की सुनवाई के दौरान कोई भी ऐसा व्यक्ति कोर्ट रूम में मौजूद न हो जो प्रत्यक्ष रूप से मामले से संबद्ध नहीं है।
- यहाँ तक कि अदालती फैसलों और आदेशों में भी पीड़ित बालक की पहचान छुपाना अनिवार्य है, ताकि बंद कमरे की सुनवाई के मूल उद्देश्य (गोपनीयता) को ठेस न पहुंचे।
