धारा 36: साक्ष्य देते समय बालक का अभियुक्त को न दिखना (Child not to see accused while testifying)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") के अंतर्गत आने वाली धारा 36 पीड़ित बालक को न्यायालय में गवाही देते समय होने वाले गंभीर मानसिक आघात से बचाने के लिए एक अत्यंत संवेदी सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
अक्सर बच्चे अपने शोषक (अभियुक्त) को देखकर इतने भयभीत हो जाते हैं कि वे अदालत में सच नहीं बोल पाते या अवसाद में चले जाते हैं। यह धारा इस मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान करते हुए अभियुक्त की शारीरिक उपस्थिति से बालक को दूर रखती है, और साथ ही आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार को भी संतुलित रखती है।
धारा 36 के मुख्य कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण (Detailed Analysis of Section 36):
इस धारा को दो महत्वपूर्ण उपधाराओं में विभाजित किया गया है:
1. दोहरे हितों की सुरक्षा (बचाव बनाम निजता) - धारा 36(1):
- बालक के लिए सुरक्षा: विशेष न्यायालय यह अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करेगा कि जब बालक का साक्ष्य (गवाही) दर्ज किया जा रहा हो, तब बालक किसी भी प्रकार से अभियुक्त के सामने प्रत्यक्ष रूप से न आए (अर्थात बालक को अभियुक्त न दिखाई दे)।
- अभियुक्त के अधिकारों की सुरक्षा: इस सुरक्षा को सुनिश्चित करते समय न्यायालय समानांतर रूप से यह भी सुनिश्चित करेगा कि अभियुक्त उस बालक के बयानों को पूरी तरह सुन सके और विचारण के दौरान अपने अधिवक्ता (वकील) के निरंतर संपर्क में रह सके।
- विधिक महत्व: यह उपधारा बहुत खूबसूरती से एक संतुलन बनाती है। आरोपी बालक को नहीं देख सकता और न ही बालक आरोपी को देख सकता है, लेकिन आरोपी बालक की हर बात सुन सकता है ताकि वह अपने वकील के माध्यम से अपना बचाव (Defence) तैयार कर सके।
2. तकनीकी सुरक्षात्मक उपाय - धारा 36(2):
उपधारा (1) के सुरक्षात्मक उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए विशेष न्यायालय निम्नलिखित वैज्ञानिक और भौतिक माध्यमों का उपयोग कर सकता है:
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video-Conferencing): बालक को न्यायालय के मुख्य कक्ष से अलग किसी सुरक्षित कमरे में बिठाकर वीडियो लिंक के माध्यम से उसकी गवाही दर्ज की जा सकती है।
- एकल दृश्य दर्पण (One-Way Mirror): एक ऐसा विशेष शीशा जिसके पार से न्यायाधीश और वकील बालक को देख सकते हैं, लेकिन बालक दूसरी ओर बैठे अभियुक्त को नहीं देख सकता।
- पर्दा या विभाजन (Screen/Partition): गवाही कक्ष और अभियुक्त के बैठने के स्थान के बीच पर्दा या लकड़ी का विभाजन खड़ा करना।
- अन्य समरूप युक्तियाँ (Other similar devices): तकनीक के विकास के साथ न्यायालय ऐसी ही अन्य बाल-अनुकूल तकनीकी प्रणालियों का भी प्रयोग कर सकता है।
धारा 36 (सुरक्षित गवाही) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Sakshi Vs. Union of India (2004) - [स्क्रीन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के उपयोग पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- तथ्य और विधिक सिद्धांत: यह पोक्सो अधिनियम के लागू होने से पहले का भारत का सबसे ऐतिहासिक मामला है, जिसने वास्तव में धारा 36 का मार्ग प्रशस्त किया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह याचिका यौन उत्पीड़न की शिकार बालिकाओं को अदालती जिरह के दौरान अभियुक्त के सीधे सामना करने के मानसिक आघात से बचाने के लिए दायर की गई थी।
- सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्देश देते हुए माना कि पीड़ितों को अभियुक्त के सामने साक्ष्य देने के लिए मजबूर करना क्रूरता है। न्यायालय ने आदेश दिया कि बाल पीड़ितों के साक्ष्य दर्ज करते समय पर्दे (Screens) या वन-वे मिरर का उपयोग किया जाना चाहिए और जहाँ संभव हो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का सहारा लिया जाए। कोर्ट के इसी सिद्धांत को बाद में पोक्सो अधिनियम की धारा 36 के रूप में वैधानिक दर्जा दिया गया।
2. State of Maharashtra Vs. Bandu @ Shripad Budhe (2018) - [धारा 36 के सुरक्षा उपायों को अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश]:
- निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष पोक्सो न्यायालयों को कड़ा निर्देश दिया कि धारा 36 के सुरक्षा उपायों का पालन करना स्वैच्छिक नहीं बल्कि अनिवार्य है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विचारण न्यायाधीश का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह गवाही शुरू होने से पहले भौतिक या तकनीकी बाधाओं (जैसे वन-वे मिरर या स्क्रीन) की व्यवस्था सुनिश्चित करे। यदि गवाही के दौरान किसी भी समय बच्चा अभियुक्त के सीधे संपर्क में आता है या उसे देख लेता है, तो यह कानून की गरिमा और बच्चे के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।
