धारा 35: बालक के साक्ष्य को अभिलिखित और मामले का निपटारा करने के लिए अवधि (Period for recording of evidence of child and disposal of case)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") के अंतर्गत आने वाली धारा 35 पीड़ित बालक को त्वरित न्याय दिलाने और मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए बेहद सख्त समय-सीमा (Time-limit) निर्धारित करती है। यह धारा सुनिश्चित करती है कि कानूनी प्रक्रियाओं के अत्यधिक विलंब के कारण बालक को किसी भी प्रकार की अतिरिक्त मानसिक प्रताड़ना (Secondary Victimization) का सामना न करना पड़े।
धारा 35 के विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण:
इस धारा को दो स्पष्ट और अनिवार्य उपधाराओं में विभाजित किया गया है:
1. बालक की गवाही (साक्ष्य) दर्ज करने की अवधि - धारा 35(1):
- अनिवार्य समय-सीमा: विशेष न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान (Cognizance) लिए जाने के तीस (30) दिन के भीतर पीड़ित बालक के साक्ष्य (गवाही) को अभिलिखित (Record) किया जाएगा।
- विलंब की स्थिति में विधिक दायित्व: यदि किसी अपरिहार्य कारणवश तीस दिनों के भीतर बालक का साक्ष्य दर्ज नहीं किया जा पाता है, तो विशेष न्यायालय को इस विलंब के विशिष्ट कारणों को अपने लिखित आदेश में अभिलिखित करना होगा।
2. विचारण (मुकदमा) पूरा करने की अवधि - धारा 35(2):
- अनिवार्य समय-सीमा: विशेष न्यायालय, यथासंभव (as far as possible), विशेष न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लिए जाने की तारीख से एक (1) वर्ष की अवधि के भीतर विचारण (Trial) को पूरा करेगा।
- उद्देश्य: इस कड़े प्रावधान का उद्देश्य पोक्सो मामलों को वर्षों तक अदालत में खिंचने से रोकना है ताकि अपराधी को जल्द से जल्द सजा मिल सके और बच्चा अपनी सामान्य जिंदगी में वापस लौट सके।
धारा 35 (त्वरित विचारण और समय-सीमा) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018) - [एक वर्ष की समय-सीमा के अनुपालन पर ऐतिहासिक निर्देश]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 35(2) के तहत निर्धारित "एक वर्ष की समय-सीमा" के कड़ाई से अनुपालन पर बल दिया। न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि बुनियादी ढांचे की कमी के कारण देश भर में मुकदमों में अत्यधिक देरी हो रही है। इस देरी को समाप्त करने के लिए न्यायालय ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वे देश के प्रत्येक जिले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट्स (Fast Track Special Courts) का गठन करें ताकि धारा 35 के अनुरूप मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर सुनिश्चित किया जा सके।
2. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [30 दिन के भीतर गवाही दर्ज करने की अनिवार्यता]:
- निर्णय: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए विशेष निर्देश दिए कि अदालतों को धारा 35(1) के तहत 30 दिनों के भीतर बच्चे के साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चे को बार-बार अदालत बुलाना या उसकी गवाही में लंबा अंतराल करना उसके बाल-मन पर गहरा आघात करता है। अतः अदालतों को बिना किसी ठोस और लिखित विधिक कारण के गवाही दर्ज करने में कोई ढिलाई या स्थगन (Adjournment) नहीं देना चाहिए।
