धारा 34: बालक द्वारा अपराध किए जाने और विशेष न्यायालय द्वारा आयु का निर्धारण करने के मामले में प्रक्रिया (Procedure in case of commission of offence by child and determination of age by Special Court)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") के अंतर्गत आने वाली धारा 34 दो अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक परिस्थितियों से निपटती है: पहली परिस्थिति जब स्वयं कोई बालक (18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति) अपराध करता है, और दूसरी परिस्थिति जब अदालत के समक्ष किसी व्यक्ति की वास्तविक आयु के निर्धारण का प्रश्न उठता है।
इस धारा के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण उपधारा-वार विश्लेषण नीचे दिया गया है:
धारा 34 के विधिक प्रावधानों का विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. बालक द्वारा अपराध किए जाने पर प्रक्रिया - धारा 34(1):
- प्रावधान: जहां इस अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के अधीन कोई अपराध किसी बालक (18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति) द्वारा किया जाता है, वहां ऐसे बालक पर किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act, 2015) के उपबंधों के अधीन ही कार्रवाई की जाएगी।
- विधिक निहितार्थ: इसका अर्थ यह है कि यदि कोई नाबालिग (child in conflict with law) पॉक्सो के तहत यौन उत्पीड़न या किसी अन्य अपराध का आरोपी है, तो उसका विचारण (Trial) सामान्य पॉक्सो कोर्ट में नहीं होगा। उस पर किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board - JJB) के समक्ष जेजे एक्ट, 2015 की सुधारक और बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं के अनुसार मुकदमा चलाया जाएगा।
2. विशेष न्यायालय द्वारा आयु का निर्धारण - धारा 34(2):
- प्रावधान: यदि विशेष न्यायालय के समक्ष किसी भी कार्यवाही के दौरान यह सवाल उठता है कि कोई व्यक्ति बालक (पीड़ित या आरोपी) है या नहीं, तो ऐसे प्रश्न का निर्धारण विशेष न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति की आयु के बारे में स्वयं का समाधान (संतुष्ट) करने के पश्चात किया जाएगा।
- कारण दर्ज करना अनिवार्य: आयु का निर्धारण करते समय विशेष न्यायाधीश को अपने आदेश में उन कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य होगा जिनके आधार पर उसने आयु का निर्धारण किया है।
3. बाद के प्रमाणों के कारण आदेश की वैधता पर प्रभाव न पड़ना - धारा 34(3):
- प्रावधान: विशेष न्यायालय द्वारा (उपधारा 2 के तहत) निर्धारित की गई आयु के संबंध में यदि बाद में कोई विपरीत सबूत (proof) मिलता है कि न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई आयु उस व्यक्ति की सही आयु नहीं थी, तो केवल इसी आधार पर न्यायालय द्वारा पूर्व में दिया गया कोई भी आदेश अवैध (invalid) नहीं समझा जाएगा।
- विधिक सुरक्षा: यह प्रावधान अदालती कार्यवाही और फैसलों को इस तकनीकी आधार पर रद्द होने से बचाता है कि बाद में किसी दस्तावेजी साक्ष्य से पीड़ित या आरोपी की आयु में कुछ महीनों या दिनों का अंतर पाया गया।
धारा 34 (आयु निर्धारण और किशोर अपराधी) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Jarnail Singh Vs. State of Haryana (2013) - [पॉक्सो मामलों में आयु निर्धारण का मार्गदर्शक सिद्धांत]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक मामले में स्पष्ट किया कि पॉक्सो अधिनियम के तहत पीड़ित और आरोपी दोनों की आयु का निर्धारण करते समय किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के नियमों (विशेषकर वर्तमान जेजे एक्ट, 2015 की धारा 94) के तहत स्थापित प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। न्यायालय ने दस्तावेजों की प्राथमिकता तय की जिसके अनुसार सबसे पहले स्कूल के मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट या जन्म प्रमाण पत्र को प्राथमिकता दी जाएगी, और इनके अभाव में ही मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) कराया जाएगा।
2. P. Yuvaprakash Vs. State represented by Inspector of Police (2023) - [आधार कार्ड (Aadhaar Card) और आयु निर्धारण का मानक]:
- निर्णय: इस हालिया अग्रणी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि पॉक्सो मामलों में आधार कार्ड को किसी पीड़ित या आरोपी की आयु का अकाट्य प्रमाण नहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने दोहराया कि धारा 34(2) के तहत आयु का निर्धारण करते समय अदालत को जेजे अधिनियम की धारा 94 के तहत अनिवार्य वैधानिक पदानुक्रम (School Certificate/Birth Certificate) का ही कड़ाई से पालन करना होगा।
