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Section 33 of POCSO Act 2012 धारा 33: विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां (Procedure and powers of Special Courts)

 धारा 33: विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां (Procedure and powers of Special Courts)

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 8 ("विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेख") मुख्य रूप से पीड़ित बालक के लिए एक संवेदनशील, सुरक्षित और बाल-अनुकूल (Child-friendly) न्यायिक प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है. इस अध्याय की धारा 33 विशेष न्यायालयों को असाधारण शक्तियां प्रदान करती है और मुकदमों के संचालन के लिए ऐसी विशेष प्रक्रियाओं का निर्धारण करती है जो सामान्य आपराधिक अदालतों से बिल्कुल भिन्न हैं.

इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालती कार्यवाही के दौरान बालक को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त मानसिक आघात (Secondary Victimization) से बचाया जा सके.


धारा 33 के विधिक प्रावधानों का विस्तृत उपधारा-वार विश्लेषण:

1. सीधे संज्ञान लेने की विशेष शक्ति - धारा 33(1):

  • प्रावधान: सामान्य आपराधिक कानून (CrPC) के विपरीत, पोक्सो के तहत गठित विशेष न्यायालय को यह विशेष शक्ति दी गई है कि वह अभियुक्त को विचारण (Trial) के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा सुपुर्द (Commit) किए बिना ही सीधे अपराध का संज्ञान (Cognizance) ले सकता है.
  • संज्ञान के आधार: यह संज्ञान दो आधारों पर लिया जा सकता है:
    • अपराध का गठन करने वाले तथ्यों का परिवाद (Complaint) प्राप्त होने पर, या
    • ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट (Charge Sheet) प्राप्त होने पर.

2. बालक से अप्रत्यक्ष पूछताछ (Indirect Questioning) का नियम - धारा 33(2):

  • सुरक्षात्मक प्रक्रिया: मुकदमे के दौरान बालक की मुख्य परीक्षा (Examination-in-chief), प्रतिपरीक्षा (Cross-examination) या पुनः परीक्षा (Re-examination) अभिलिखित करते समय, विशेष लोक अभियोजक या अभियुक्त का वकील बालक से सीधे सवाल नहीं पूछेगा.
  • न्यायालय की भूमिका: वकीलों को अपने प्रश्न लिखित या मौखिक रूप से विशेष न्यायालय (जज) को संसूचित करने होंगे. इसके बाद, विशेष न्यायाधीश स्वयं उन प्रश्नों को अत्यंत सरल और गैर-आक्रामक भाषा में बालक के समक्ष रखेगा. इससे बालक वकीलों के तीखे और डरावने सवालों से सुरक्षित रहता है.

3. बार-बार विराम (Breaks) देने की शक्ति - धारा 33(3):

  • प्रावधान: यदि विशेष न्यायालय को विचारण के दौरान ऐसा लगता है कि बालक थक गया है, डरा हुआ है या असहज है, तो न्यायालय बालक को बार-बार विराम (frequent breaks) लेने की अनुमति दे सकता है.

4. मित्रतापूर्ण वातावरण का सृजन - धारा 33(4):

  • प्रावधान: बालक के मन से अदालत का डर निकालने के लिए, विशेष न्यायालय बालक के परिवार के किसी सदस्य, संरक्षक, मित्र या ऐसे नातेदार को न्यायालय में उपस्थित रहने की अनुमति देगा, जिस पर बालक का गहरा भरोसा और विश्वास हो.

5. बार-बार गवाही के लिए बुलाने पर रोक - धारा 33(5):

  • प्रावधान: विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है कि बालक को साक्ष्य (गवाही) देने के लिए बार-बार अदालत में न बुलाया जाए. गवाही की प्रक्रिया को यथासंभव एक या न्यूनतम बार में ही पूरा किया जाना चाहिए.

6. आक्रामक और चरित्र हनन संबंधी प्रश्नों पर पूर्ण प्रतिबंध - धारा 33(6):

  • प्रावधान: विचारण के दौरान अभियुक्त का वकील बालक से कोई भी ऐसा प्रश्न नहीं पूछ सकता जो आक्रामक (aggressive) हो या बालक के चरित्र हनन (character assassination) से संबंधित हो. न्यायालय ऐसे प्रश्नों की अनुमति बिल्कुल नहीं देगा और यह सुनिश्चित करेगा कि हर परिस्थिति में बालक की गरिमा (dignity) बनी रहे.

7. अन्वेषण और विचारण के दौरान बालक की गोपनीयता - धारा 33(7):

  • पहचान की सुरक्षा: जांच (अन्वेषण) या अदालती कार्यवाही के दौरान किसी भी स्तर पर बालक की पहचान को सार्वजनिक (प्रकट) नहीं किया जाएगा.
  • न्यायालय का विशेषाधिकार (परंतुक): यदि विशेष न्यायालय को यह विश्वास हो कि पहचान उजागर करना स्वयं बालक के सर्वोत्तम हित (best interest of the child) में है, तो वह लिखित कारणों के आधार पर इसकी अनुमति दे सकता है.
  • पहचान का दायरा (स्पष्टीकरण): "बालक की पहचान" के अंतर्गत बालक का नाम, उसका कुटुंब (परिवार), उसका विद्यालय, नातेदार, पड़ोसी या कोई भी ऐसी सूचना जिससे बालक की पहचान स्थापित की जा सके, शामिल हैं.

8. बालक के पुनर्वास और राहत के लिए प्रतिकर (Compensation) - धारा 33(8):

  • प्रावधान: विशेष न्यायालय को यह अधिकार है कि वह अभियुक्त को मिलने वाले दंड के अतिरिक्त, बालक को हुए किसी शारीरिक या मानसिक आघात (physical or mental trauma) के लिए अथवा उसके तत्काल पुनर्वास (immediate rehabilitation) के लिए प्रतिकर (मुआवजा) देने का निर्देश दे सकता है.

9. सेशन्स न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग - धारा 33(9):

  • विधिक दर्जा: पोक्सो के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, विशेष न्यायालय को विचारण के प्रयोजनों के लिए सेशन न्यायालय (Court of Session) की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी. वह इस अधिनियम के तहत मुकदमों का संचालन उसी प्रक्रिया के अनुसार करेगा मानो वह एक सेशन्स न्यायालय हो.



धारा 33 के सुरक्षात्मक सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Ganesan Vs. State (Represented by Inspector of Police) (2020) - [बिना सुपुर्दगी के सीधे संज्ञान लेने की शक्ति पर ऐतिहासिक निर्णय]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो की धारा 33(1) और धारा 31 के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया। न्यायालय ने ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि विशेष न्यायालय के पास बिना किसी मजिस्ट्रेट द्वारा सुपुर्दगी (Committal) के सीधे एफआईआर या शिकायत पर संज्ञान लेने का अनन्य अधिकार है। यह पोक्सो अधिनियम को त्वरित विचारण सुनिश्चित करने के लिए दी गई एक विशिष्ट शक्ति है, जो सामान्य CrPC की धारा 193 के प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्त है।

2. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [बाल-अनुकूल अदालती प्रक्रियाओं (Child-friendly Trial) पर मार्गदर्शक निर्देश]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से धारा 33(2), 33(4) और 33(6) के सिद्धांतों को रेखांकित किया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि पोक्सो अदालतों का ढांचा और माहौल ऐसा होना चाहिए कि बच्चा अदालत को देखकर डरे नहीं। वकीलों द्वारा बच्चे पर सीधे चिल्लाने, आक्रामक जिरह करने या अपमानजनक सवाल पूछने पर न्यायालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। गवाही के दौरान बच्चे की गरिमा की रक्षा करना अदालत का प्राथमिक कर्तव्य है।

3. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [पीड़ित की गोपनीयता और पहचान की सुरक्षा पर मील का पत्थर]:

  • निर्णय: इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 33(7) के तहत गोपनीयता के अधिकार को अत्यंत कड़ाई से लागू करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने माना कि जांच के स्तर से लेकर अदालत के अंतिम फैसले तक, किसी भी दस्तावेज (जिसमें मीडिया रिपोर्ट, पुलिस डायरी और अदालती निर्णय शामिल हैं) में बच्चे की पहचान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं होनी चाहिए। बच्चे के पड़ोस, स्कूल या माता-पिता का ऐसा कोई विवरण नहीं दिया जाना चाहिए जिससे उसकी पहचान मुमकिन हो।

4. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [त्वरित प्रतिकर (Interim Compensation) पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 33(8) के क्रियान्वयन की निगरानी करते हुए निर्देश दिया कि गंभीर आघात से गुजर रहे पीड़ित बालकों को तुरंत राहत देने के लिए विशेष अदालतों को अंतरिम प्रतिकर (Interim Compensation) देने में संकोच नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) की योजनाओं के तहत तय मानदंडों के अनुसार मुआवजे की त्वरित अदायगी सुनिश्चित करने के आदेश दिए ताकि बच्चे के उपचार और पुनर्वास में कोई बाधा न आए।


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