धारा 32: विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 7 ("विशेष न्यायालय") के अंतर्गत आने वाली धारा 32 विशेष पोक्सो अदालतों में सरकार (अभियोजन पक्ष) की ओर से मुकदमों का प्रभावी संचालन करने के लिए "विशेष लोक अभियोजकों" की नियुक्ति, उनकी अनिवार्य विधिक योग्यताओं और उनके कानूनी दर्जे को विनियमित करती है.
इस अधिनियम की धारा 2(1)(ड) भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है कि "विशेष लोक अभियोजक" से धारा 32 के अधीन नियुक्त कोई अभियोजक अभिप्रेत है.
धारा 32 के विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण:
1. विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति - धारा 32(1):
- प्रावधान: राज्य सरकार, राजपत्र (Gazette) में अधिसूचना द्वारा, विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor - SPP) की नियुक्ति करेगी.
- विशिष्ट उद्देश्य: यह नियुक्ति केवल और केवल इस अधिनियम (पॉक्सो कानून) के उपबंधों के अधीन मामलों का संचालन करने के लिए प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए की जाएगी.
- विधिक महत्व: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामान्य आपराधिक मामलों की पैरवी करने वाले वकीलों के बजाय, बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों के लिए विशेष रूप से समर्पित और केंद्रित विधिक अभियोजक उपलब्ध हों.
2. नियुक्ति के लिए अनिवार्य योग्यता/पात्रता - धारा 32(2):
यह उपधारा विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त होने वाले व्यक्ति के विधिक अनुभव का कड़ा मापदंड तय करती है:
- अनिवार्य विधिक व्यवसाय का अनुभव: कोई भी व्यक्ति धारा 32(1) के अधीन विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए केवल तभी पात्र होगा, जब उसने न्यूनतम सात (7) वर्ष की अवधि के लिए एक अधिवक्ता (Advocate) के रूप में विधि व्यवसाय किया हो.
3. विधिक दर्जा (Deemed Status) - धारा 32(3):
- लोक अभियोजक के रूप में मान्यता: इस धारा के अधीन नियुक्त प्रत्येक विशेष लोक अभियोजक को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 2 के खंड (प) [Section 2(u) of CrPC] के अर्थ के अंतर्गत एक "लोक अभियोजक" माना जाएगा.
- CrPC के प्रावधानों का लागू होना: इसके परिणामस्वरूप, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के लोक अभियोजक से संबंधित सभी कानूनी उपबंध और शक्तियां इन विशेष लोक अभियोजकों पर स्वतः ही और प्रभावी रूप से लागू होंगी.
धारा 32 (विशेष लोक अभियोजकों की भूमिका) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण पर ऐतिहासिक निर्देश]:
- निर्णय: भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 32 के क्रियान्वयन को लेकर बेहद कड़े निर्देश दिए। न्यायालय ने माना कि केवल विशेष न्यायालयों का गठन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण न्याय के लिए सक्षम विशेष लोक अभियोजक (SPPs) का होना अनिवार्य है।
- अदालत के निर्देश:
- न्यायालय ने राज्य सरकारों को आदेश दिया कि विशेष लोक अभियोजकों के पदों को कभी खाली न रखा जाए.
- इन अभियोजकों को पोक्सो कानून की संवेदनशीलता, बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) और बच्चों से अनुकूल व्यवहार करने के लिए नियमित रूप से विशेष प्रशिक्षण (Specialized Training) दिया जाए.
- उन्हें उपयुक्त पारिश्रमिक/फीस दी जाए ताकि वे पूरी निष्ठा और योग्यता के साथ बच्चों को त्वरित न्याय दिला सकें.
2. Ganesan Vs. State (Represented by Inspector of Police) (2020) - [सुनवाई के दौरान विशेष लोक अभियोजक का दायित्व]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में माना कि पोक्सो मामलों में विशेष लोक अभियोजक (SPP) की भूमिका एक सामान्य आपराधिक मुकदमे के सरकारी वकील से भिन्न और अधिक जिम्मेदारी वाली होती है। धारा 33(2) के साथ मिलाकर व्याख्या करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब अदालत में पीड़ित बालक के बयान या जिरह (Cross-examination) चल रही हो, तो यह विशेष लोक अभियोजक का कर्तव्य है कि वह अभियुक्त के वकील द्वारा पूछे जाने वाले किसी भी अनुचित, आक्रामक या बच्चे के चरित्र हनन संबंधी प्रश्न को तुरंत रोकवाए और बच्चे के सम्मान को सुरक्षित रखने में न्यायालय की सहायता करे।
