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Section 31 of POCSO Act 2012 विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना (Application of Code of Criminal Procedure, 1973 to proceedings before a Special Court)

 धारा 31: विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना (Application of Code of Criminal Procedure, 1973 to proceedings before a Special Court)

पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 7 ("विशेष न्यायालय") के अंतर्गत आने वाली धारा 31 इस विशेष कानून और भारत के सामान्य आपराधिक प्रक्रिया कानून, यानी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 - BNSS] के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है। यह धारा यह स्पष्ट करती है कि विशेष पोक्सो अदालतों के समक्ष मुकदमों के संचालन में किस प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।


धारा 31 का विधिक पाठ (Statutory Text):

"इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध (जमानत और बंधपत्र विषयक उपबंधों सहित) किसी विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को, लोक अभियोजक समझा जाएगा।"


धारा 31 का विस्तृत विधिक विश्लेषण (Detailed Legal Analysis):

यह धारा मुख्य रूप से चार अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्थापित करती है:

1. 'अन्यथा उपबंधित के सिवाय' का सिद्धांत (Principle of 'Save as otherwise provided'):

  • यह वाक्यांश यह स्थापित करता है कि पोक्सो अधिनियम एक विशेष अधिनियम (Special Act) है। यदि किसी प्रक्रिया के संबंध में पोक्सो अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के बीच कोई टकराव या भिन्नता होती है, तो पोक्सो अधिनियम के प्रावधान ही सर्वोपरि (Overriding effect) होंगे
  • उदाहरण के लिए: CrPC के सामान्य नियम के अनुसार, सेशन न्यायालय किसी मामले का सीधे संज्ञान (Cognizance) नहीं ले सकता जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा मामला उसे सुपुर्द (Commit) न किया जाए। परंतु पोक्सो अधिनियम की धारा 33(1) विशेष अदालत को सीधे संज्ञान लेने की शक्ति देती है। यहाँ पोक्सो का प्रावधान CrPC पर हावी होगा। लेकिन जहाँ पोक्सो मौन है, वहाँ CrPC की सामान्य प्रक्रिया लागू होगी।

2. विशेष न्यायालय का दर्जा: सेशन न्यायालय के समतुल्य (Deemed Court of Session):

  • धारा 31 स्पष्ट रूप से घोषित करती है कि CrPC के सभी विधिक प्रयोजनों के लिए पोक्सो विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय (सत्र न्यायालय) समझा जाएगा।
  • इसका अर्थ यह है कि विशेष पोक्सो न्यायाधीश के पास वे सभी शक्तियाँ, अधिकार और गरिमा होगी जो एक नियमित सेशन न्यायाधीश के पास होती है।

3. जमानत और बंधपत्र का लागू होना (Bail and Bonds):

  • विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों में CrPC के अध्याय 33 (जमानत और बंधपत्र विषयक उपबंध) पूरी तरह से लागू होंगे।
  • नियमित जमानत (Regular Bail - धारा 439 CrPC) और अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail - धारा 438 CrPC) के आवेदनों पर विचार करते समय पोक्सो अदालतें सेशन न्यायालय की शक्तियों का उपयोग करेंगी। हालांकि, जमानत पर विचार करते समय उन्हें पोक्सो की धारा 29 और 30 (दोष की उपधारणा) के कड़े प्रावधानों को भी ध्यान में रखना होगा।

4. अभियोजक को 'लोक अभियोजक' का दर्जा (Deemed Public Prosecutor):

  • विशेष पोक्सो न्यायालय के समक्ष राज्य (अभियोजन) की ओर से पैरवी करने वाले व्यक्ति (जिसे धारा 32 के तहत विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किया जाता है) को CrPC के प्रयोजनों के लिए लोक अभियोजक (Public Prosecutor) माना जाएगा।
  • इससे उन्हें CrPC के तहत लोक अभियोजकों को प्राप्त सभी अधिकार और कर्तव्य स्वतः मिल जाते हैं।



धारा 31 पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Ganesan Vs. State (Represented by Inspector of Police) (2020) - [विशेष न्यायालय और CrPC के सामंजस्य पर ऐतिहासिक निर्णय]:

  • निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 31 और CrPC के बीच संबंधों की विस्तृत व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि:
    • पोक्सो विशेष न्यायालय एक 'विशेष न्यायालय' है जो CrPC के प्रयोजनों के लिए एक सेशन न्यायालय (Court of Session) समझा जाता है।
    • न्यायालय ने माना कि पोक्सो अधिनियम के तहत गठित विशेष न्यायालय को अभियुक्त को सीधे विचारण के लिए सुपुर्द (Committal) किए बिना भी, पुलिस रिपोर्ट या शिकायत पर सीधे अपराध का संज्ञान लेने का अधिकार है। यह प्रक्रिया CrPC के सामान्य नियम (धारा 193 CrPC) का अपवाद है और धारा 31 के "अन्यथा उपबंधित के सिवाय" के सिद्धांत के तहत पूरी तरह वैध है।

2. State of West Bengal Vs. Anindita Bose (2020) - [जमानत प्रावधानों और विशेष अदालतों के क्षेत्राधिकार पर]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि धारा 31 विशेष न्यायालय को जमानत और बंधपत्र के संबंध में सेशन न्यायालय की शक्तियाँ प्रदान करती है, इसलिए पोक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत (Section 438 CrPC) और नियमित जमानत (Section 439 CrPC) के आवेदनों पर सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार सीधे तौर पर इन विशेष अदालतों के पास है। हालांकि, जमानत देते समय अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए और अपराध की गंभीरता तथा पीड़ित बालक के सर्वोत्तम हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए।


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