धारा 27: बालक की चिकित्सीय परीक्षा (Medical examination of a child)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 6 ("बालक के कथनों को अभिलेखित करने के लिए प्रक्रिया") की धारा 27 पीड़ित बालक के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा अपराध के वैज्ञानिक साक्ष्य सुरक्षित करने के लिए चिकित्सीय परीक्षण की संवेदनशील प्रक्रिया निर्धारित करती है.
चिकित्सीय परीक्षा से जुड़े सभी विधिक उपबंधों का उपधारा-वार विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
धारा 27 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. बिना एफआईआर (FIR) के भी तत्काल चिकित्सीय परीक्षा - धारा 27(1):
- अनिवार्य प्रावधान: जिस बालक के संबंध में इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया है, उसकी चिकित्सीय परीक्षा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 164क (164A) के प्रावधानों के अनुसार ही की जाएगी.
- बिना एफआईआर के परीक्षण (Overriding Effect): कानून स्पष्ट करता है कि चिकित्सीय परीक्षा इस बात के होते हुए भी की जाएगी कि मामले में कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या परिवाद (Complaint) अभी तक पंजीकृत (रजिस्टर) किया गया है या नहीं.
- विधिक महत्व: इसका अर्थ है कि यदि कोई पीड़ित बच्चा अस्पताल लाया जाता है, तो डॉक्टर या चिकित्सा संस्थान पुलिस शिकायत (FIR) दर्ज होने का इंतजार किए बिना उसका तुरंत चिकित्सीय परीक्षण और उपचार शुरू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं.
2. बालिका की परीक्षा केवल महिला डॉक्टर द्वारा - धारा 27(2):
- लिंग संवेदनशीलता: यदि पीड़ित बालक कोई बालिका (Girl) है, तो उसकी चिकित्सीय परीक्षा केवल और केवल एक महिला डॉक्टर (Female Doctor) द्वारा ही की जाएगी. यह प्रावधान बालिका की निजता और गरिमा की रक्षा के लिए अत्यंत अनिवार्य है.
3. विश्वसनीय व्यक्ति की उपस्थिति - धारा 27(3):
- सुरक्षित वातावरण: बालक की चिकित्सीय परीक्षा हमेशा बालक के माता-पिता या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में ही की जाएगी जिसमें बालक अपना भरोसा या विश्वास रखता हो. इससे परीक्षा के दौरान बालक भयमुक्त रहता है.
4. माता-पिता की अनुपस्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था - धारा 27(4):
- विशेष संरक्षण: यदि किसी अनिवार्य कारणवश बालक के माता-पिता या उसका कोई विश्वसनीय व्यक्ति चिकित्सीय परीक्षा के दौरान उपस्थित नहीं हो सकता है, तो परीक्षा रोकी नहीं जाएगी.
- मनोनीत महिला की उपस्थिति: ऐसी स्थिति में चिकित्सीय परीक्षा, उस चिकित्सा संस्था के प्रमुख (Head of the Medical Institution) द्वारा नामनिर्दिष्ट (Nominated) किसी अन्य महिला की उपस्थिति में की जाएगी.
धारा 27 (बालकों की चिकित्सीय परीक्षा) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Jharkhand Vs. Shailendra Kumar Rai @ Shailendra Kumar Rai (2022) - [टू-फिंगर टेस्ट (Two-Finger Test) पर पूर्ण प्रतिबंध]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मील का पत्थर साबित होने वाले निर्णय में यौन शोषण की पीड़िताओं पर किए जाने वाले "टू-फिंगर टेस्ट" (Two-Finger Test) को पूरी तरह से असंवैधानिक और अवैध घोषित किया है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि यह परीक्षण अवैज्ञानिक है, महिला या बालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, और उसके निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन करता है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि पोक्सो मामलों की चिकित्सा परीक्षा के दौरान यदि कोई डॉक्टर यह टेस्ट करता पाया गया, तो उसे कदाचार (Misconduct) का दोषी माना जाएगा।
2. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [चिकित्सीय परीक्षा की गति और गरिमा पर दिशा-निर्देश]:
- निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यौन अपराधों के पीड़ितों के लिए चिकित्सा प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने माना कि धारा 27(1) के तहत पीड़ित बालक का चिकित्सीय परीक्षण बिना किसी देरी के त्वरित रूप से होना चाहिए क्योंकि समय बीतने के साथ महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और जैविक साक्ष्य (biological evidence) नष्ट हो सकते हैं। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि परीक्षण के दौरान बालक की मानसिक स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाए।
3. State of Punjab Vs. Gurmit Singh (1996) - [चिकित्सीय साक्ष्यों के संकलन और संवेदनशीलता पर मार्गदर्शक सिद्धांत]:
- निर्णय: यद्यपि यह मामला पोक्सो अधिनियम के लागू होने से पहले का है, लेकिन चिकित्सा परीक्षणों के दौरान पीड़ित की गरिमा बनाए रखने के संबंध में यह सर्वोच्च न्यायालय का सबसे अग्रणी मामला है। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि चिकित्सा परीक्षण करते समय डॉक्टर को यह याद रखना चाहिए कि वे केवल एक शारीरिक जांच नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक गंभीर आघात से गुजर चुके व्यक्ति की संवेदनशील जांच कर रहे हैं। डॉक्टरों को अपनी रिपोर्ट अत्यंत सावधानी, संवेदनशीलता और वैज्ञानिक शुद्धता के साथ तैयार करनी चाहिए क्योंकि यह रिपोर्ट न्यायालय में सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बनती है।
