धारा 26: अभिलेखित किए जाने वाले कथन के संबंध में अतिरिक्त उपबंध (Additional provisions regarding statement to be recorded)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 6 ("बालक के कथनों को अभिलेखित करने के लिए प्रक्रिया") के अंतर्गत आने वाली धारा 26 पुलिस और मजिस्ट्रेट दोनों के लिए बालक के बयान दर्ज करते समय अपनाई जाने वाली अतिरिक्त सुरक्षात्मक और सहायक प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है। यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि यदि बालक किसी शारीरिक या मानसिक कठिनाई का सामना कर रहा है, तो उसे अपनी बात स्पष्टता और सुरक्षा के साथ रखने के लिए आवश्यक सहायता (जैसे दुभाषिया, विशेष शिक्षक या तकनीकी साधन) उपलब्ध कराई जाए।
इस धारा के विधिक प्रावधानों का उपधारा-वार विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:
धारा 26 के विधिक प्रावधानों का संपूर्ण विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):
1. माता-पिता या विश्वसनीय व्यक्ति की उपस्थिति - धारा 26(1):
- प्रावधान: यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी, बालक का कथन दर्ज करते समय बालक के माता-पिता या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करेगा, जिस पर बालक का गहरा भरोसा या विश्वास हो।
- उद्देश्य: अजनबियों (पुलिस या मजिस्ट्रेट) के सामने अपनी बात कहने में बालक को संकोच या भय न हो, और वह अपने विश्वसनीय व्यक्तियों की उपस्थिति में बिना किसी मानसिक तनाव के अपनी बात कह सके।
- कथन की यथार्थता: अधिकारी या मजिस्ट्रेट बालक के कथन को उसके द्वारा बोले गए शब्दों के अनुसार ही (हूबहू) अभिलेखित करेगा।
2. अनुवादक या दुभाषिए की सहायता - धारा 26(2):
- प्रावधान: यदि बालक ऐसी भाषा का उपयोग करता है जिसे पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट नहीं समझते हैं, या बालक अपनी बात समझाने में असमर्थ रहता है, तो यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी किसी अनुवादक (Translator) या किसी दुभाषिए (Interpreter) की सहायता ले सकेगा।
- अहर्ता और शुल्क: ऐसे अनुवादक या दुभाषिए के पास सरकार द्वारा विहित की गई अर्हताएं और अनुभव होना आवश्यक है, और उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार तय की गई फीस का संदाय (भुगतान) किया जाएगा।
3. विशेष शिक्षक या विशेषज्ञ की सहायता (निःशक्त बालकों के लिए) - धारा 26(3):
- प्रावधान: यदि पीड़ित बालक मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त (physically or mentally disabled) है, तो यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी बालक का कथन अभिलेखित करने के लिए निम्नलिखित की सहायता ले सकेगा:
- किसी विशेष शिक्षक (Special Educator) की,
- बालक से संपर्क करने की विशेष रीति से सुपरिचित (familiar) किसी व्यक्ति की, अथवा
- उस क्षेत्र से जुड़े किसी विशेषज्ञ (Expert) की।
- अहर्ता और शुल्क: ऐसे विशेषज्ञ या विशेष शिक्षक के पास विहित अर्हताएं और अनुभव होना चाहिए, और उन्हें विहित नियमों के अधीन तय फीस का भुगतान किया जाएगा।
4. श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा रिकॉर्डिंग - धारा 26(4):
- प्रावधान: जहां भी व्यावहारिक रूप से संभव हो, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी यह अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करेगा कि बालक का कथन श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (Audio-Visual Electronic Means/Video Recording) से भी अभिलेखित किया जाए।
- उद्देश्य: वीडियो रिकॉर्डिंग होने से बाद में विचारण (Trial) के दौरान बालक के बयानों में किसी भी प्रकार के हेरफेर की गुंजाइश नहीं रहती और न्यायालय के समक्ष बालक की वास्तविक मानसिक और शारीरिक स्थिति का दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध रहता है।
धारा 26 के सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [विशेष शिक्षकों और संवेदनशील वातावरण पर अग्रणी निर्देश]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए माना कि धारा 26(3) का अनुपालन विशेष रूप से मूक-बधिर या मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के मामलों में अनिवार्य है। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यदि कोई विशेष बच्चा अपनी बात सामान्य रूप से नहीं कह सकता, तो पुलिस और मजिस्ट्रेट का यह कानूनी कर्तव्य है कि वे बिना किसी देरी के एक प्रमाणित विशेष शिक्षक या बाल मनोवैज्ञानिक की मदद लें। ऐसे मामलों में केवल औपचारिकता पूरी करना कानून की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
2. State of Maharashtra Vs. Bandu @ Shripad Budhe (2018) - [श्रव्य-दृश्य रिकॉर्डिंग (धारा 26(4)) की महत्ता पर निर्णय]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में माना कि धारा 26(4) के तहत वीडियो रिकॉर्डिंग करने से बालक को अदालत में बार-बार वही दर्दनाक कहानी दोहराने के मानसिक आघात से बचाया जा सकता है। न्यायालय ने सिफारिश की कि सभी जांच एजेंसियों को आधुनिक उपकरणों का उपयोग करना चाहिए और बालक के प्रथम बयान को यथासंभव ऑडियो-वीडियो प्रारूप में सुरक्षित रखना चाहिए ताकि मुकदमे की पारदर्शिता बनी रहे और बालक का पुनः उत्पीड़न (Secondary Victimization) न हो।
3. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [इलेक्ट्रॉनिक बयानों की सुरक्षा और गोपनीयता]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा निर्देश दिया कि धारा 26(4) के तहत दर्ज की गई बालक की कोई भी श्रव्य-दृश्य (AV) रिकॉर्डिंग या वीडियो क्लिप एक अत्यंत गोपनीय दस्तावेज है। इस रिकॉर्डिंग को किसी भी स्थिति में सार्वजनिक डोमेन, सोशल मीडिया या समाचार चैनलों पर प्रसारित नहीं किया जा सकता। ऐसी रिकॉर्डिंग केवल सीलबंद लिफाफे में सीधे विशेष न्यायालय के समक्ष ही प्रस्तुत की जाएगी, ताकि बालक के निजता के अधिकार का पूरी तरह सम्मान किया जा सके।
