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Section 22 of POCSO Act 2012 मिथ्या परिवाद या मिथ्या सूचना के लिए दंड (Punishment for false complaint or false information)

 धारा 22: मिथ्या परिवाद या मिथ्या सूचना के लिए दंड (Punishment for false complaint or false information)

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 5 ("मामलों की रिपोर्ट करने के लिए प्रक्रिया") जहां एक तरफ अनिवार्य रिपोर्टिंग पर बल देता है, वहीं दूसरी तरफ कानून के दुरुपयोग को रोकने और निर्दोष व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए धारा 22 के रूप में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है. यह धारा दुर्भावनापूर्ण, झूठी और मनगढ़ंत शिकायतों (False Complaints) को दंडनीय बनाती है.

इस धारा के विधिक प्रावधानों को तीन उपधाराओं के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है, जिनका विस्तृत विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है:


धारा 22 के विधिक प्रावधानों का विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):

1. वयस्कों द्वारा किसी व्यक्ति को फंसाने के लिए झूठी शिकायत - धारा 22(1):

  • अपराध का दायरा: यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध निम्नलिखित गंभीर अपराधों के संबंध में झूठी शिकायत (मिथ्या परिवाद) करता है या झूठी सूचना (मिथ्या सूचना) उपलब्ध कराता है:
    • धारा 3 (प्रवेशी लैंगिक हमला)
    • धारा 5 (गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला)
    • धारा 7 (लैंगिक हमला)
    • धारा 9 (गुरुतर लैंगिक हमला)
  • अपराध का आशय (Mens Rea): इस शिकायत का एकमात्र आशय उस व्यक्ति को अपमानित करना (humiliate), उद्दापित करना (extort/धन वसूलना), धमकाना या उसकी मानहानि (defame) करना होना चाहिए.
  • दंड का प्रावधान: यदि कोई व्यक्ति दुर्भावनापूर्वक ऐसा करता पाया जाता है, तो उसे दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह (6) मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा.

2. बालकों के लिए पूर्ण उन्मुक्ति (Immunity for Children) - धारा 22(2):

  • विशेष सुरक्षा: यदि किसी बालक (18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति) द्वारा कोई मिथ्या परिवाद (झूठी शिकायत) दर्ज की जाती है या झूठी सूचना प्रदान की जाती है, तो उस बालक पर कोई दंड अधिरोपित नहीं किया जाएगा.
  • विधिक उद्देश्य: विधायिका ने माना कि बच्चे कई बार बड़ों के दबाव में, भयवश या नासमझी में झूठा बयान दे देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें सजा के भय से बचाने और उनका मानसिक उत्पीड़न रोकने के लिए यह पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है।

3. किसी बालक के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण झूठी शिकायत - धारा 22(3):

  • अपराध का दायरा: यदि कोई व्यक्ति, जो स्वयं बालक नहीं है (अर्थात वयस्क है), किसी बालक के विरुद्ध यह जानते हुए कि सूचना झूठी है, कोई झूठी शिकायत करता है या झूठी सूचना प्रदान करता है.
  • आशय: इसका उद्देश्य उस बालक को इस अधिनियम के अधीन अपराधों के लिए उत्पीड़ित या प्रताड़ित (victimised) करना होना चाहिए.
  • दंड का प्रावधान: ऐसे वयस्क अपराधी को दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक (1) वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा.



धारा 22 के सिद्धांतों और कानून के दुरुपयोग पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Maheshwar Tigga Vs. State of Jharkhand (2020) - [झूठे आरोपों और साक्ष्यों के कठोर परीक्षण पर अग्रणी मामला]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि यद्यपि पोक्सो अधिनियम के तहत बच्चों के संरक्षण के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं और धारा 29 के तहत अभियुक्त के विरुद्ध दोष की उपधारणा की जाती है, लेकिन अदालतों को अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए। न्यायालय ने माना कि आपसी रंजिश, पारिवारिक विवाद या प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई झूठी प्राथमिकताओं (False FIRs) को पहचानना आवश्यक है। न्यायालय को साक्ष्यों का कड़ाई से परीक्षण करना चाहिए ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी का शिकार न होना पड़े, जो कि धारा 22 के पीछे की मूल भावना है।

2. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022) - [कानून के दुरुपयोग को रोकने का न्यायिक सिद्धांत]:

  • निर्णय: इस निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि पोक्सो अधिनियम का उद्देश्य केवल वास्तविक पीड़ित बालकों को त्वरित न्याय दिलाना है। कानून की कड़ाई का उपयोग किसी को ब्लैकमेल करने या अनुचित दबाव बनाने के लिए हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि धारा 22 ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच (safeguard) के रूप में कार्य करती है, जो यह संदेश देती है कि कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों को भी दंडित किया जाएगा।


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