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Section 21 of POCSO Act 2012 मामले की रिपोर्ट करने या अभिलिखित (रिकॉर्ड) करने में विफल रहने के लिए दंड (Punishment for failure to report or record a case)

 धारा 21: मामले की रिपोर्ट करने या अभिलिखित (रिकॉर्ड) करने में विफल रहने के लिए दंड (Punishment for failure to report or record a case)

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 5 ("मामलों की रिपोर्ट करने के लिए प्रक्रिया") बाल यौन शोषण के मामलों को तुरंत कानून के दायरे में लाने के लिए सख्त नियम तय करता है. इसी अध्याय की धारा 21 यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति बाल यौन शोषण की सूचना को दबा न सके. यह धारा रिपोर्ट न करने (Failure to report) या पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करने (Failure to record) को एक गंभीर दांडिक अपराध बनाती है.

इस धारा के विधिक प्रावधानों, वर्गीकरण और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णयों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:


धारा 21 के विधिक प्रावधानों का धारा-वार विश्लेषण (Clause-by-Clause Analysis):

1. सामान्य रिपोर्टिंग या रिकॉर्डिंग में विफलता पर दंड - धारा 21(1):

यह उपधारा दो प्रकार के व्यक्तियों पर लागू होती है – सूचना देने वाले सामान्य नागरिक/व्यावसायिक कर्मचारी और सूचना दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी:

  • अपराध:
    • कोई भी व्यक्ति जो धारा 19(1) (सामान्य अनिवार्य रिपोर्टिंग) या धारा 20 (मीडिया, होटल, अस्पताल, स्टूडियो आदि के कर्मचारियों की अनिवार्य रिपोर्टिंग) के अधीन किसी अपराध के किए जाने की पुलिस को रिपोर्ट करने में विफल रहता है; अथवा
    • कोई भी पुलिस अधिकारी जो धारा 19(2) के अधीन ऐसी सूचना प्राप्त होने पर उसे लिखित रूप में अभिलिखित (Record) करने में विफल रहता है.
  • दंड: ऐसे व्यक्ति या पुलिस अधिकारी को दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह (6) मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा.

2. संस्था या कंपनी के प्रभारियों (In-charge) का विशेष दायित्व - धारा 21(2):

यह उपधारा स्कूलों, शेल्टर होम्स, होटलों या अस्पतालों जैसे संस्थानों के प्रमुखों पर अतिरिक्त कानूनी जिम्मेदारी डालती है ताकि वे अपने संस्थानों में होने वाले अपराधों को छिपा न सकें:

  • अपराध: किसी कंपनी या किसी संस्था (चाहे वह सरकारी हो या निजी) का प्रभारी या भारसाधक (Person In-charge) व्यक्ति, जो अपने नियंत्रण के अधीन काम करने वाले किसी अधीनस्थ कर्मचारी (Subordinate) द्वारा किए गए पोक्सो अपराध की जानकारी होने के बावजूद, उसकी रिपोर्ट करने में जानबूझकर विफल रहता है.
  • दंड: ऐसे प्रभारी व्यक्ति को कठोर दंड दिया जाएगा, जिसके तहत उसे एक (1) वर्ष तक का कारावास और जुर्माना दोनों भुगतने होंगे. (यहाँ ध्यान दें कि सामान्य विफलता में कारावास 'या' जुर्माना है, लेकिन संस्था प्रमुख के लिए कानून में कारावास 'और' जुर्माना दोनों अनिवार्य किए गए हैं).

3. बालकों के लिए विशेष छूट - धारा 21(3):

  • अपराधमुक्ति: उपधारा (1) के तहत रिपोर्ट न करने के लिए दंड के प्रावधान इस अधिनियम के अधीन किसी "बालक" (18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति) पर लागू नहीं होंगे.
  • उद्देश्य: यदि कोई पीड़ित बच्चा या उसका नाबालिग मित्र डर या मानसिक आघात के कारण समय पर पुलिस को घटना की रिपोर्ट नहीं कर पाता है, तो कानून उसे सजा के दायरे से बाहर रखता है ताकि बच्चों को अतिरिक्त मानसिक प्रताड़ना न झेलनी पड़े.



धारा 21 और अनिवार्य रिपोर्टिंग पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. State of West Bengal Vs. Anindita Bose (2020) - [डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों के रिपोर्टिंग दायित्व पर अग्रणी निर्णय]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अस्पतालों और डॉक्टरों के ऊपर धारा 20 और 21 के संयुक्त प्रभाव को स्पष्ट किया। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यदि किसी डॉक्टर के पास कोई नाबालिग इलाज के लिए आता है और चिकित्सीय परीक्षण के दौरान डॉक्टर को यह संदेह या जानकारी होती है कि बच्चा यौन शोषण का शिकार हुआ है, तो डॉक्टर के लिए इसकी रिपोर्ट पुलिस (SJPU) को करना अनिवार्य है। डॉक्टर मरीज की 'गोपनीयता' या 'परिवार के अनुरोध' की आड़ में रिपोर्टिंग से बच नहीं सकते। ऐसा न करने पर वे धारा 21 के तहत आपराधिक मुकदमा भुगतने के पात्र होंगे।

2. Lalita Kumari Vs. Government of Uttar Pradesh (2014) - [पुलिस अधिकारियों द्वारा रिपोर्ट दर्ज न करने पर ऐतिहासिक मामला]:

  • निर्णय: यद्यपि यह मामला सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 से संबंधित है, लेकिन पोक्सो की धारा 19(2) और 21(1) के क्रियान्वयन में यह सबसे महत्वपूर्ण अग्रणी केस है। संवैधानिक पीठ ने निर्णय दिया कि पोक्सो के तहत आने वाले यौन अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गंभीर प्रकृति के हैं। इसलिए, जैसे ही पुलिस को कोई जानकारी मिलती है, उनके लिए तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना अनिवार्य है। यदि कोई पुलिस अधिकारी पोक्सो मामले की रिपोर्ट दर्ज करने में हीलाहवाली करता है या उसे अभिलिखित करने में विफल रहता है, तो उस पर धारा 21(1) के तहत विभागीय जांच के साथ-साथ छह महीने के कारावास की कानूनी कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।


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