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Section 20 of POCSO Act 2012 मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो और फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता

 धारा 20: मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो और फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) का अध्याय 5 पोक्सो मामलों की रिपोर्टिंग प्रक्रिया से संबंधित है. इस अध्याय की धारा 20 विशेष रूप से मीडिया, होटलों, अस्पतालों और फोटो स्टूडियो आदि जैसे सार्वजनिक और व्यावसायिक संस्थानों के कर्मचारियों पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्रियों की अनिवार्य रिपोर्टिंग का कानूनी दायित्व डालती है.

धारा 20 के मुख्य कानूनी प्रावधान:

  • बाध्य संस्थाएं और उनके कर्मचारी (Obligated Entities and Staff): निम्नलिखित व्यावसायिक या सार्वजनिक स्थानों पर नियोजित/कार्यरत कोई भी कर्मचारी या कर्मक (Worker/Personnel), चाहे वे किसी भी पद या नाम से जाने जाते हों, इस धारा के तहत रिपोर्ट करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं:
    • मीडिया (Media)
    • होटल या लॉज (Hotels or Lodges)
    • अस्पताल (Hospitals)
    • क्लब (Clubs)
    • स्टूडियो या फोटो चित्रण सुविधाएं (Studios or Photographic Facilities)
  • कर्मचारियों की संख्या की अप्रासंगिकता: कानून स्पष्ट करता है कि इन संस्थाओं में नियोजित व्यक्तियों की कुल संख्या (चाहे संस्थान छोटा हो या बड़ा) को विचार में लाए बिना, यह बाध्यता वहां के प्रत्येक कार्यरत व्यक्ति पर समान रूप से लागू होती है।
  • रिपोर्ट करने योग्य विषय-वस्तु (What must be reported): यदि किसी भी माध्यम से ऐसी कोई सामग्री या वस्तु (Material or Object) उनके संज्ञान में आती है जो बालक के लैंगिक शोषण (Sexual Exploitation of a Child) से संबंधित हो. इसके अंतर्गत निम्नलिखित सामग्रियां शामिल हैं:
    • अश्लील साहित्य (Pornographic Literature/CSAM)
    • लिंग संबंधी अश्लील चित्र/सामग्री
    • बालक या बालकों का किसी भी रूप में अश्लील प्रदर्शन (Obscene representation of a child)
  • सूचना किसे दी जाएगी (To whom to report): ऐसी कोई भी जानकारी प्राप्त होने पर संबंधित कर्मचारी का यह दायित्व होगा कि वह इसकी सूचना तुरंत निम्नलिखित प्राधिकारियों को उपलब्ध कराए:
    • विशेष किशोर पुलिस यूनिट (Special Juvenile Police Unit - SJPU) अथवा
    • स्थानीय पुलिस (Local Police)

अनिवार्य सह-संबंध: धारा 21 के तहत विफलता पर दंड (Punishment for Failure to Report):

  • यदि कोई व्यक्ति धारा 20 के तहत बच्चों के यौन शोषण से संबंधित किसी सामग्री या अपराध की रिपोर्ट पुलिस को देने में जानबूझकर विफल रहता है, तो उसे धारा 21(1) के तहत छह (6) महीने तक के कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जा सकता है.


धारा 20 के सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. In Re: Prajwala Letter dated 18.2.2015 (Videos of Sexual Violence and Child Pornography) - [डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफार्मों की बाध्यता पर अग्रणी निर्णय]:

  • निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के बढ़ते प्रसार पर गंभीर रुख अपनाया। न्यायालय ने माना कि धारा 20 के मूल सिद्धांतों के तहत, सभी डिजिटल मंचों, ऑनलाइन होस्टिंग साइटों और तकनीकी बिचौलियों (Intermediaries) की यह अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी है कि जैसे ही उनके संज्ञान में बाल यौन शोषण या बाल अश्लीलता से संबंधित कोई भी सामग्री आती है, वे उसे तुरंत हटा दें (block करें) और संबंधित जांच एजेंसियों (जैसे SJPU या स्थानीय पुलिस) को इसकी रिपोर्ट करें।

2. Just Rights for Children Alliance Vs. S. Harish & Anr. (2024) - [बाल अश्लील सामग्री (CSAM) के विरुद्ध शून्य-सहनशीलता (Zero-Tolerance) का सिद्धांत]:

  • निर्णय: इस हालिया मार्गदर्शक निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों का अश्लील प्रदर्शन और उनके यौन शोषण से जुड़ी सामग्रियों का अस्तित्व ही बाल अधिकारों का घोर उल्लंघन है। कोर्ट ने माना कि समाज और व्यावसायिक संस्थानों के कर्मचारियों (जैसे स्टूडियो या लॉज कर्मियों) का यह विधिक कर्तव्य है कि वे ऐसी जैसी कोई भी सामग्री को देखने या मिलने पर तुरंत पुलिस को रिपोर्ट करें। रिपोर्ट न करना या उसे छिपाना बाल यौन शोषण के इस पूरे जघन्य चक्र को बढ़ावा देता है, जो कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।

3. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [रिपोर्टिंग के दौरान पीड़ित की गोपनीयता की सुरक्षा]:

  • निर्णय: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मीडिया, अस्पतालों और अन्य संस्थानों पर धारा 20 के तहत पुलिस को रिपोर्ट करने की सख्त बाध्यता है, लेकिन इस रिपोर्टिंग के दौरान पीड़ित बच्चे की निजता और गोपनीयता (Privacy) सर्वोपरि रहनी चाहिए। मीडिया या अन्य कोई भी प्रकाशक किसी भी स्थिति में पीड़ित बच्चे की वास्तविक पहचान (जैसे नाम, फोटो, स्कूल या परिवार का विवरण) को सार्वजनिक नहीं कर सकता। ऐसा उल्लंघन करने पर धारा 23(4) के तहत न्यूनतम 6 महीने से 1 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है।


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