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Section 19 of POCSO Act 2012 अपराधों की रिपोर्ट करना (Reporting of offences)

 धारा 19: अपराधों की रिपोर्ट करना (Reporting of offences)

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) का अध्याय 5 पोक्सो मामलों की रिपोर्टिंग प्रक्रिया को विनियमित करता है। इस अध्याय की धारा 19 इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य धाराओं में से एक है, जो बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग (Mandatory Reporting) का कानूनी ढांचा तैयार करती है। इसका मुख्य उद्देश्य बाल यौन शोषण के मामलों को बिना किसी देरी के कानूनी संज्ञान में लाना और पीड़ित बालक को त्वरित सुरक्षा प्रदान करना है।


धारा 19 के विधिक प्रावधान (Detailed Analysis of Section 19):

इस धारा के अंतर्गत सात उपधाराएं (Sub-sections) हैं, जो रिपोर्ट दर्ज करने से लेकर पीड़ित बालक की देखरेख और कानूनी सुरक्षा तक के कर्तव्यों को पुलिस पर लागू करती हैं:

1. अनिवार्य रिपोर्टिंग का दायरा और प्राधिकारी - धारा 19(1):

  • किसके ऊपर दायित्व है: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति (जिसके अंतर्गत स्वयं पीड़ित या अन्य कोई बालक भी शामिल है) जिसे यह आशंका है कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किए जाने की संभावना है, या जो यह जानकारी रखता है कि ऐसा कोई अपराध किया गया है, वह इसकी रिपोर्ट दर्ज कराएगा।
  • किसे रिपोर्ट की जाएगी: यह जानकारी निम्नलिखित में से किसी एक को दी जानी अनिवार्य है:
    • (क) विशेष किशोर पुलिस यूनिट (Special Juvenile Police Unit - SJPU)
    • (ख) स्थानीय पुलिस (Local Police)

2. रिपोर्ट को लेखबद्ध करने की प्रक्रिया - धारा 19(2):

जब पुलिस को ऐसी कोई सूचना प्राप्त होती है, तो:

  • (क) रिपोर्ट को एक प्रविष्ट संख्या (Entry Number) दी जाएगी और उसे अनिवार्य रूप से लेखबद्ध (Record) किया जाएगा।
  • (ख) लिखी गई रिपोर्ट सूचना देने वाले (Informant) को पढ़कर सुनाई जाएगी
  • (ग) इस सूचना को पुलिस यूनिट द्वारा रखी जाने वाली आधिकारिक पुस्तिका (Register/Diary) में दर्ज किया जाएगा।

3. बालक द्वारा रिपोर्ट दिए जाने की स्थिति - धारा 19(3):

  • यदि रिपोर्ट देने वाला व्यक्ति स्वयं कोई बालक है, तो पुलिस अधिकारी द्वारा उसकी रिपोर्ट को अत्यंत सरल भाषा में लेखबद्ध किया जाएगा, ताकि बालक द्वारा अभिलिखित की जा रही विषय-वस्तु (Contents) को वह पूरी तरह समझ सके।

4. दुभाषिए या अनुवादक की सहायता - धारा 19(4):

  • यदि बालक ऐसी भाषा में बात करता है जिसे पुलिस अधिकारी नहीं समझता, या बालक स्वयं अभिलिखित की जा रही रिपोर्ट को समझने में असमर्थ रहता है, तो पुलिस अधिकारी द्वारा एक योग्य और अनुभवी अनुवादक (Translator) या दुभाषिए (Interpreter) की तुरंत सहायता ली जाएगी। इसके लिए विहित नियमों के अनुसार निर्धारित शुल्क का भुगतान किया जाएगा।

5. बालक के आपातकालीन देखरेख और संरक्षण की व्यवस्था - धारा 19(5):

  • यदि विशेष किशोर पुलिस यूनिट या स्थानीय पुलिस को यह विश्वास हो जाता है कि पीड़ित बालक को तत्काल देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता है, तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज होने के चौबीस (24) घंटे के भीतर कारणों को लिखित रूप में दर्ज करने के बाद:
    • बालक को सुरक्षित अभिरक्षा में रखने (जैसे किसी संरक्षण गृह में भेजने) की तुरंत व्यवस्था करेगी।
    • यदि बालक घायल या अस्वस्थ है, तो उसे तुरंत निकटतम अस्पताल में भर्ती कराने की व्यवस्था करेगी।

6. सक्षम निकायों को 24 घंटे में रिपोर्ट प्रेषित करना - धारा 19(6):

  • विशेष किशोर पुलिस यूनिट या स्थानीय पुलिस बिना किसी अनावश्यक देरी के, लेकिन सूचना प्राप्ति के 24 घंटे के भीतर, मामले की पूरी रिपोर्ट निम्नलिखित को सौंपने के लिए बाध्य है:
    • बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee - CWC)
    • विशेष न्यायालय (Special Court) (यदि विशेष न्यायालय अधिसूचित नहीं है, तो सत्र न्यायालय को)।
  • इस रिपोर्ट में बालक के संरक्षण और देखरेख के लिए किए गए तुरंत उपायों और उसकी आवश्यकताओं का विवरण भी शामिल होगा।

7. सद्भावपूर्वक दी गई सूचना को विधिक संरक्षण - धारा 19(7):

  • यदि किसी व्यक्ति ने धारा 19(1) के उद्देश्यों के लिए सद्भावपूर्वक (Good faith) कोई जानकारी दी है, तो उस व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई भी दीवानी (Civil) या दांडिक (Criminal) दायित्व उत्पन्न नहीं होगा। अर्थात, सद्भावपूर्वक जानकारी देने वाले को किसी भी कानूनी मुकदमेबाजी से पूरी सुरक्षा प्रदान की गई है।


धारा 19 (अनिवार्य रिपोर्टिंग) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Lalita Kumari Vs. Government of Uttar Pradesh (2014) - [अनिवार्य प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने पर ऐतिहासिक मामला]:

  • निर्णय: यद्यपि यह मामला सामान्य आपराधिक कानून (CrPC की धारा 154) से संबंधित है, लेकिन इसका पोक्सो की धारा 19 पर बहुत गहरा और मार्गदर्शक प्रभाव है। संवैधानिक पीठ ने व्यवस्था दी कि यदि दी गई जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के होने का पता चलता है, तो पुलिस के लिए प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना अनिवार्य है। पोक्सो अधिनियम के तहत आने वाले सभी अपराध संज्ञेय हैं, इसलिए जैसे ही धारा 19 के तहत पुलिस को कोई सूचना मिलती है, पुलिस बिना किसी प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के तुरंत एफआईआर दर्ज करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [रिपोर्टिंग चरण से ही पीड़ित की गोपनीयता बनाए रखना]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पोक्सो की धारा 19 के तहत जैसे ही अपराध की रिपोर्ट दर्ज की जाती है, उसी क्षण से पीड़ित बालक की पहचान पूरी तरह गोपनीय हो जानी चाहिए। पुलिस एफआईआर या किसी भी डायरी एंट्री में बालक का वास्तविक नाम, स्कूल या निवास स्थान की जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगी। जांच के दौरान तैयार किए जाने वाले सभी दस्तावेजों में बालक के नाम के स्थान पर छद्म नाम (जैसे 'Victim X') का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे के निजता के अधिकार का हनन न हो।

3. State of West Bengal Vs. Anindita Bose (2020) - [अनिवार्य रिपोर्टिंग की विधिक अनिवार्यता]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पोक्सो की धारा 19 और धारा 21 (रिपोर्ट न करने पर सजा) का संयुक्त प्रभाव बाल यौन शोषण के मामलों में समाज की मूक संलिप्तता को तोड़ना है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी डॉक्टर, स्कूल प्रबंधन या परिवार के सदस्य को बालक के यौन शोषण की आशंका या जानकारी मिलती है, तो वे इसे छिपा नहीं सकते। रिपोर्टिंग एक गैर-समझौतावादी (non-negotiable) दायित्व है, और इसका उल्लंघन करने पर कानून में सख्त सजा का प्रावधान है।


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