धारा 18: किसी अपराध को करने के प्रयत्न (Attempt) के लिए दंड पॉक्सो अधिनियम के अध्याय 4 ("किसी अपराध का दुष्प्रेरण और उसको करने का प्रयत्न") का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि यदि कोई अपराध पूरी तरह से संपन्न नहीं भी हो पाता है, तो भी उसका प्रयास या प्रयत्न करने वाले व्यक्ति को कानून के घेरे में लाकर दंडित किया जा सके.
धारा 18 के विधिक प्रावधान:
अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति:
- इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध को करने का प्रयत्न (Attempt) करेगा, या
- ऐसा कोई अपराध करवाएगा, और
- ऐसे प्रयत्न में अपराध को अंजाम देने के उद्देश्य से कोई कार्य (Act) करेगा,
तो उसे उस मूल अपराध के लिए उपबंधित किसी भी भांति के कारावास से निम्नलिखित तरीके से दंडित किया जाएगा:
- आजीवन कारावास वाले अपराधों की दशा में: यदि संबंधित मूल अपराध के लिए अधिकतम दंड 'आजीवन कारावास' निर्धारित है, तो प्रयत्न करने वाले को आजीवन कारावास की आधी अवधि (Half of Life Imprisonment) तक के कारावास से दंडित किया जा सकता है.
- अन्य कारावास वाले अपराधों की दशा में: यदि संबंधित मूल अपराध के लिए एक निश्चित अवधि का कारावास निर्धारित है, तो प्रयत्न करने वाले को उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि के आधे (Half of the maximum term) तक के कारावास से दंडित किया जा सकेगा.
- आर्थिक दंड व अन्य: इसके अतिरिक्त, दोषी व्यक्ति जुर्माने से, अथवा कारावास और जुर्माना दोनों से दंडनीय होगा.
अपराध के प्रयत्न (Section 18) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Maharashtra Vs. Bandu @ Shripad Budhe (2018) - [अपराध की तैयारी और प्रयत्न के बीच का अंतर]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत "प्रयत्न" (Attempt) के विधिक सिद्धांत को स्पष्ट किया। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि 'अपराध की केवल तैयारी करना' दंडनीय नहीं है, लेकिन जैसे ही आरोपी तैयारी के चरण को पार करके ऐसा कोई सक्रिय कदम उठाता है जो अपराध को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह कृत्य धारा 18 के तहत सीधे "प्रयत्न" माना जाएगा। भले ही वह अपराध किसी बाहरी बाधा या पीड़ित के विरोध के कारण पूरा न हो पाया हो, आरोपी को आधी सजा भुगतनी होगी।
2. Ganesan Vs. State (2020) - [धारा 18 के तहत कड़े विचारण का सिद्धांत]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में माना कि बाल यौन शोषण जैसे मामलों में कानून का उद्देश्य निवारक (deterrent) है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी बालक के साथ जघन्य लैंगिक हमला (जैसे प्रवेशी हमला) करने का प्रयास भी करता है, तो भले ही वह शारीरिक रूप से सफल न हुआ हो, समाज और बच्चे की सुरक्षा के लिए उसे धारा 18 के तहत संबंधित अपराध की अधिकतम सजा के आधे हिस्से तक की कड़ी सजा दी जानी चाहिए।
