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Section 12 of POCSO Act 2012 "लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड" (Punishment for Sexual Harassment)

 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अध्याय 2 की धारा 12 विशेष रूप से "लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड" (Punishment for Sexual Harassment) का प्रावधान करती है।

यह धारा अधिनियम की धारा 11 में परिभाषित किए गए "लैंगिक उत्पीड़न" के कृत्यों को दंडनीय बनाने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करती है।

धारा 12 के मुख्य प्रावधान (Detailed Provisions of Section 12):

इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी बालक पर लैंगिक उत्पीड़न (Sexual Harassment) करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे निम्नलिखित सजा दी जाएगी:

  • कारावास की प्रकृति: दोषी व्यक्ति को दोनों में से किसी भी भांति के कारावास (कठोर कारावास या साधारण कारावास) से दंडित किया जाएगा।
  • कारावास की अवधि: इस सजा की अवधि तीन (3) वर्ष तक की हो सकेगी।
  • आर्थिक दंड: कारावास की सजा के साथ-साथ दोषी व्यक्ति जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

धारा 11 के साथ संबंध (Correlation with Section 11):

धारा 12 के तहत किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि उसने धारा 11 के तहत परिभाषित कोई कृत्य किया है। धारा 11 के अनुसार, निम्नलिखित गैर-शारीरिक यौन व्यवहार "लैंगिक उत्पीड़न" माने जाते हैं जब वे "लैंगिक आशय" से किए जाएं:

  1. बालक को सुनाने या दिखाने के इरादे से कोई अश्लील शब्द कहना, ध्वनि निकालना, अंगविक्षेप (gestures) करना या शरीर का प्रदर्शन करना।
  2. बालक को उसके अपने शरीर या अंग प्रदर्शित करने के लिए विवश करना।
  3. बालक को किसी भी मीडिया प्रारूप में अश्लील सामग्री (Pornographic material) दिखाना।
  4. प्रत्यक्ष रूप से या इंटरनेट, सोशल मीडिया जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से बालक का बार-बार पीछा करना या संपर्क साधना।
  5. बालक के शरीर या यौन कृत्य से जुड़े वास्तविक या रूपांतरित (morphed) चित्रों/वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देना।
  6. अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक को प्रलोभन (लालच) या भुगतान देना।

अधिनियम के अनुसार, कृत्य के पीछे "लैंगिक आशय" (Sexual Intent) था या नहीं, यह पूरी तरह से तथ्य का प्रश्न (Question of Fact) होगा।



धारा 12 (और लैंगिक उत्पीड़न) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. Attorney General for India Vs. Satish & Anr. (2021) - "The Skin-to-Skin Contact Case": यह पोक्सो अधिनियम के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण (Leading) निर्णय है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम के तहत किसी भी यौन अपराध (चाहे वह लैंगिक हमला हो या लैंगिक उत्पीड़न) को निर्धारित करने के लिए "लैंगिक आशय" (Sexual Intent) सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, न कि शारीरिक या त्वचा से त्वचा का संपर्क। न्यायालय ने माना कि बिना किसी शारीरिक संपर्क के भी यदि बुरे इरादे (Sexual Intent) से बालक का उत्पीड़न किया जाता है, तो वह पोक्सो कानून के तहत गंभीर अपराध है। यह व्याख्या धारा 11 और 12 के तहत मौखिक, इशारों से या डिजिटल माध्यमों से किए जाने वाले गैर-शारीरिक उत्पीड़न के मामलों पर भी पूरी तरह लागू होती है।

  2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018): विशेष रूप से इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल स्पेस में बच्चों के लैंगिक उत्पीड़न (जो धारा 11(iv) और (v) के तहत दंडनीय है) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायालय ने माना कि डिजिटल उत्पीड़न बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी निजता के अधिकार पर गहरा आघात करता है। इस फैसले में निर्देश दिए गए कि इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री और बच्चों को प्रताड़ित करने वाले तत्वों के खिलाफ कानून प्रवर्तन एजेंसियों को तत्काल और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

  3. State of West Bengal Vs. Anindita Bose (2020) (समझौते की अमान्यता): सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि पोक्सो अधिनियम के तहत आने वाले अपराध, चाहे वे धारा 12 के तहत आने वाले तीन साल की सजा वाले लैंगिक उत्पीड़न के मामले ही क्यों न हों, गैर-शमनीय (Non-Compoundable) हैं। न्यायालय ने कहा कि समाज के प्रति और बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे गंभीर अपराधों में आरोपी और पीड़ित परिवार के बीच किसी भी प्रकार के "समझौते" (Compromise) के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।



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