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Section 10 of POCSO Act 2012 गुरुतर लैंगिक हमले के लिए दंड" (Punishment for Aggravated Sexual Assault)

 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 10 विशेष रूप से "गुरुतर लैंगिक हमले के लिए दंड" (Punishment for Aggravated Sexual Assault) का प्रावधान करती है।

धारा 9 में परिभाषित गंभीर परिस्थितियों (जैसे पुलिस अधिकारी, लोक सेवक, या रिश्तेदार द्वारा विश्वास के पद का दुरुपयोग करके, या घातक हथियारों का उपयोग करके किया गया लैंगिक हमला) के लिए धारा 10 के तहत कड़ी सजा निर्धारित की गई है।

धारा 10 के विस्तृत प्रावधान:

  • सजा की न्यूनतम अवधि: जो कोई भी व्यक्ति 'गुरुतर लैंगिक हमला' (Aggravated Sexual Assault) करने का दोषी पाया जाएगा, उसे न्यूनतम पाँच (5) वर्ष के कारावास की सजा दी जाएगी।
  • सजा की अधिकतम अवधि: इस कारावास की अवधि को अपराध की गंभीरता के अनुसार अधिकतम सात (7) वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • कारावास की प्रकृति: यह सजा दोनों में से किसी भी भांति के कारावास (कठोर कारावास या साधारण कारावास) की हो सकती है।
  • आर्थिक दंड (जुर्माना): दोषी व्यक्ति केवल कारावास से ही नहीं, बल्कि जुर्माने से भी दंडनीय होगा।


धारा 10 (और धारा 9) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. State of Madhya Pradesh Vs. Vikram Das (2019) (न्यूनतम अनिवार्य सजा का सिद्धांत): इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम के दंड प्रावधानों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून स्थापित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब कानून में किसी अपराध के लिए "न्यूनतम अनिवार्य सजा" (Minimum Mandatory Sentence) तय की गई है (जैसे धारा 10 के तहत न्यूनतम 5 वर्ष), तो अदालतों को अपने विवेकाधिकार का उपयोग करके आरोपी की उम्र, उसकी पारिवारिक स्थिति या सहानुभूति के आधार पर सजा को उस न्यूनतम वैधानिक सीमा से कम करने का कोई अधिकार नहीं है। अदालतों को विधायिका की मंशा का सम्मान करते हुए न्यूनतम सजा अनिवार्य रूप से देनी ही होगी।

  2. Attorney General for India Vs. Satish & Anr. (2021) - "Skin-to-Skin Contact" Case: यह सर्वोच्च न्यायालय का एक मील का पत्थर साबित होने वाला निर्णय है। यद्यपि यह मामला धारा 7 (लैंगिक हमला) से उत्पन्न हुआ था, लेकिन यह धारा 9 और 10 के तहत अभियोजन के लिए बेहद प्रासंगिक है। न्यायालय ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें कपड़ों के ऊपर से छूने को 'स्किन-टू-स्किन' संपर्क न होने के कारण बरी कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि अपराधी का "लैंगिक आशय" (Sexual Intent) सिद्ध हो जाता है, तो कपड़ों के ऊपर से किया गया स्पर्श भी लैंगिक हमला माना जाएगा। यदि यह कृत्य धारा 9 में वर्णित किसी प्राधिकारी (जैसे पुलिस, डॉक्टर, या शिक्षक) द्वारा किया जाता है, तो आरोपी सीधे धारा 10 के तहत न्यूनतम 5 वर्ष की कठोर सजा का भागीदार होगा।

  3. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022) (उपधारणा और प्रमाण का भार): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 9 और 10 के मामलों में पोक्सो अधिनियम की धारा 29 (अपराधों के बारे में उपधारणा) अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। न्यायालय ने कहा कि एक बार जब अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि आरोपी ने बच्चे के साथ कोई अनुचित शारीरिक संपर्क किया था, तो विशेष अदालत यह उपधारणा (Presume) करेगी कि आरोपी ने यह कृत्य 'आपराधिक मानसिक दशा' और लैंगिक आशय के साथ ही किया था। इसके बाद खुद को निर्दोष साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (Burden of Proof) आरोपी पर आ जाती है।



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