लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम, 2012 के अंतर्गत पीड़ित बालक के उपचार, मानसिक आघात को कम करने और उसके समाज में पुनर्वास (Rehabilitation) के लिए प्रतिकर (Compensation/मुआवजा) के अत्यंत सुदृढ़ और संवेदनशील प्रावधान किए गए हैं। पोक्सो कानून केवल अपराधी को दंडित करने पर केंद्रित नहीं है, बल्कि पीड़ित बालक को हुए शारीरिक व मानसिक नुकसान की भरपाई करने को भी अपनी प्राथमिकता मानता है।
अधिनियम के तहत प्रतिकर से संबंधित मुख्य वैधानिक प्रावधान निम्नलिखित हैं:
पोक्सो अधिनियम, 2012 के तहत प्रतिकर के मुख्य वैधानिक उपबंध:
1. जुर्माने की राशि को सीधे पीड़ित को सौंपना (धारा 4(3) और धारा 6(2)):
- धारा 4(3) (प्रवेशी लैंगिक हमले की दशा में): इसके तहत प्रावधान है कि न्यायालय द्वारा अभियुक्त पर अधिरोपित (लगाया गया) जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा। इस जुर्माने का संदाय (भुगतान) सीधे पीड़ित बालक को उसके चिकित्सा व्ययों (Medical Expenses) की पूर्ति और पुनर्वास के लिए किया जाएगा।
- धारा 6(2) (गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले की दशा में): धारा 6 के तहत भी न्यायालय द्वारा अभियुक्त पर लगाया गया जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा, और उसका संदाय अनिवार्य रूप से पीड़ित बालक के चिकित्सा उपचार और पुनर्वास के लिए ही किया जाएगा।
2. विशेष न्यायालय द्वारा स्वतंत्र प्रतिकर का निर्देश (धारा 33(8)):
- यह उपधारा विशेष न्यायालय को सीधे मुआवजा तय करने की असाधारण शक्ति प्रदान करती है। इसके अनुसार, उचित मामलों में विशेष न्यायालय, अभियुक्त को दिए जाने वाले मुख्य दंड के अतिरिक्त, बालक को काररित किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक आघात (Physical or Mental Trauma) के लिए अथवा उसके तत्काल पुनर्वास (Immediate Rehabilitation) के लिए प्रतिकर (मुआवजा) का भुगतान करने का निर्देश दे सकेगा।
3. केंद्र सरकार की नियम बनाने की शक्ति (धारा 45(2)(ग)):
- अधिनियम की धारा 45 के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई है कि वह धारा 33(8) के अधीन विशेष न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले प्रतिकर (मुआवजे) के निर्धारण, उसकी न्यूनतम व अधिकतम सीमा और भुगतान की व्यावहारिक रीति तय करने के लिए नियम बना सकती है। इसी शक्ति के अंतर्गत सरकार ने पोक्सो नियम, 2020 में प्रतिकर के विस्तृत नियम विहित किए हैं।
पोक्सो नियम, 2020 के तहत प्रतिकर की व्यावहारिक प्रक्रिया (बाहरी ज्ञान):
पोक्सो नियम, 2020 के नियम 9 और नियम 11 के अंतर्गत प्रतिकर के भुगतान की निम्नलिखित समय-सीमा और प्रक्रिया तय की गई है:
- अंतरिम प्रतिकर (Interim Compensation): विशेष न्यायालय को यदि लगता है कि पीड़ित बालक को तत्काल चिकित्सा सहायता, शल्य चिकित्सा (सर्जरी) या पुनर्वास की आवश्यकता है, तो वह अंतिम निर्णय आने से पहले भी अंतरिम प्रतिकर देने का आदेश दे सकता है।
- भुगतान की समय-सीमा: विशेष न्यायालय द्वारा प्रतिकर का आदेश दिए जाने की तारीख से तीस (30) दिन के भीतर संबंधित राज्य सरकार या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को इस राशि का भुगतान पीड़ित बालक या उसके माता-पिता/संरक्षक के बैंक खाते में करना अनिवार्य होता है।
- प्रतिकर का आधार: मुआवजा तय करते समय बच्चे की आयु, आघात की गंभीरता, चिकित्सा का अनुमानित खर्च, और क्या इसके कारण बच्चे की पढ़ाई छूटी है, जैसे कारकों पर विचार किया जाता है।
प्रतिकर (Compensation) के सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय:
1. In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Cases (2019) - [त्वरित अंतरिम सहायता और NALSA योजना को लागू करना]:
- निर्णय: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए देश भर में पोक्सो पीड़ितों को मिलने वाले प्रतिकर की धीमी प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।
- न्यायालय की व्यवस्था: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि पोक्सो मामलों में पीड़ितों को तुरंत राहत पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा तैयार की गई "महिला एवं बाल यौन उत्पीड़न पीड़ित प्रतिकर योजना, 2018" (NALSA's Compensation Scheme) के मानकों को पूरे देश में समान रूप से लागू किया जाए। न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया कि विशेष अदालतों को बिना किसी तकनीकी देरी के पीड़ित बच्चों के लिए त्वरित अंतरिम मुआवजे के आदेश जारी करने चाहिए ताकि उनका उपचार और काउंसलिंग बिना किसी बाधा के तुरंत शुरू हो सके।
2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [पुनर्वास को सम्मानजनक जीवन के अधिकार का हिस्सा मानना]:
- निर्णय: इस मील का पत्थर साबित हुए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो की धारा 33(8) और धारा 45 के तहत मिलने वाला प्रतिकर राज्य सरकार की कोई भीख या खैरात नहीं है, बल्कि यह पीड़ित बालक के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार) का हिस्सा है। न्यायालय ने माना कि यौन अपराधों के कारण जो बच्चे गहरे मानसिक आघात में चले जाते हैं, उनके पुनर्वास, शिक्षा और समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए वित्तीय और मनोवैज्ञानिक सहायता राज्य का कानूनी दायित्व है।
3. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Shivakumar (2014) - [मुआवजे की राशि के शीघ्र संवितरण पर बल]:
- निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विशेष अदालतों द्वारा मुआवजे का आदेश पारित किए जाने के बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) को बिना किसी नौकरशाही देरी के निर्धारित समय-सीमा (30 दिनों) के भीतर सहायता राशि का संवितरण (Distribution) पीड़ित के खाते में सुनिश्चित करना चाहिए।
