वर्ष 2019 में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (संशोधन) अधिनियम के माध्यम से बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के लिए दंड के प्रावधानों को अत्यधिक कठोर बनाया गया है। इन महत्वपूर्ण बदलावों का विस्तृत और धारा-वार विवरण नीचे दिया गया है:
1. प्रवेशी लैंगिक हमला के लिए दंड में बदलाव (धारा 4):
- न्यूनतम सजा में वृद्धि: पहले सामान्य प्रवेशी लैंगिक हमले (Penetrative Sexual Assault) के लिए न्यूनतम सजा सात वर्ष की निर्धारित थी। वर्ष 2019 के संशोधन (अधिनियम संख्यांक 19) द्वारा इसे बढ़ाकर न्यूनतम दस (10) वर्ष का कारावास कर दिया गया है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही दोषी जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
- 16 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए विशेष प्रावधान: संशोधन द्वारा धारा 4 में एक नई उपधारा (2) जोड़ी गई है। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 16 वर्ष से कम आयु के बालक पर प्रवेशी लैंगिक हमला करता है, तो उसके लिए न्यूनतम बीस (20) वर्ष का कारावास निर्धारित किया गया है, जिसे अपराधी के शेष प्राकृतिक जीवनकाल के आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और वह जुर्माने के लिए भी दायी होगा।
- जुर्माने का संदाय: संशोधन के माध्यम से यह भी जोड़ा गया कि न्यायालय द्वारा लगाया गया जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होना चाहिए, और इस जुर्माने का संदाय सीधे पीड़ित बच्चे के चिकित्सा खर्चों की पूर्ति और पुनर्वास के लिए किया जाएगा।
2. गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड में बदलाव (धारा 6):
- न्यूनतम सजा में वृद्धि और मृत्युदंड का समावेश: 2019 के संशोधन (अधिनियम संख्यांक 25) द्वारा धारा 6 को पूरी तरह से प्रतिस्थापित किया गया है। अब गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के लिए न्यूनतम सजा को बढ़ाकर बीस (20) वर्ष का कठोर कारावास कर दिया गया है। इस सजा को शेष प्राकृतिक जीवनकाल के आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, या अपराधी को मृत्युदंड (Death Penalty) से भी दंडित किया जा सकता है।
- मृत्यु को गुरुतर परिस्थिति मानना: धारा 5 में संशोधन करके नया खंड (iv) जोड़ा गया, जिसके तहत यदि प्रवेशी लैंगिक हमले के परिणामस्वरूप बालक की मृत्यु हो जाती है, तो वह गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला माना जाएगा।
3. अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक के उपयोग के लिए दंड में बदलाव (धारा 14):
- सजा का कड़ा होना: 2019 के संशोधन (अधिनियम संख्यांक 25) द्वारा धारा 14 को प्रतिस्थापित किया गया है।
- न्यूनतम दंड निर्धारण: अब धारा 14(1) के तहत यदि कोई व्यक्ति अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक का उपयोग करता है, तो उसे न्यूनतम पांच (5) वर्ष के कारावास (और जुर्माना) से दंडित किया जाएगा। दूसरी बार या पश्चात्त्वर्ती बार यही अपराध करने पर यह सजा न्यूनतम सात (7) वर्ष का कारावास (और जुर्माना) होगी।
- संचयी (Cumulative) दंड: धारा 14(2) के तहत यदि कोई व्यक्ति अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक का उपयोग करते समय सीधे अश्लील कृत्यों में भाग लेकर धारा 3, 5, 7 या 9 का अपराध भी करता है, तो उसे इन अपराधों के दंड के अतिरिक्त क्रमशः धारा 4, 6, 8 और 10 के तहत भी अलग से दंडित किया जाएगा।
4. बालक संबंधी अश्लील सामग्री के भंडारण के लिए दंड में बदलाव (धारा 15):
- नया कानूनी ढांचा: 2019 के संशोधन (अधिनियम संख्यांक 25) द्वारा धारा 15 को पूरी तरह प्रतिस्थापित किया गया, ताकि बाल अश्लील सामग्री (CSAM) के भंडारण और प्रसार को प्रभावी रूप से रोका जा सके।
- साषा करने के आशय से भंडारण (धारा 15(1)): यदि कोई व्यक्ति बालक संबंधी अश्लील सामग्री को साझा या प्रसारित करने के इरादे से अपने पास रखता है, और उसे मिटाने, नष्ट करने या प्राधिकारी को रिपोर्ट करने में विफल रहता है, तो उस पर पहली बार में न्यूनतम 5,000 रुपये और दूसरी या पश्चात्त्वर्ती बार में न्यूनतम 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
- प्रसार या वितरण (धारा 15(2)): यदि कोई व्यक्ति वैध रिपोर्टिंग या अदालती साक्ष्य के अलावा ऐसी सामग्री का किसी भी रीति से पारेषण (Transmission), प्रदर्शन, प्रचार या वितरण करता है, तो उसे तीनर (3) वर्ष तक के कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जाएगा।
- व्यावसायिक भंडारण (धारा 15(3)): व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऐसी सामग्री का भंडारण करने पर पहली दोषसिद्धि पर न्यूनतम तीन (3) वर्ष से अधिकतम पांच (5) वर्ष तक का कारावास (या जुर्माना या दोनों) मिलेगा। दूसरी या पश्चात्त्वर्ती दोषसिद्धि पर सजा न्यूनतम पांच (5) वर्ष से अधिकतम सात (7) वर्ष का कारावास (और जुर्माना) होगी।
5. गुरुतर लैंगिक हमले के दायरे में विस्तार (धारा 9):
- रासायनिक परिपक्वता को शामिल करना: 2019 के संशोधन द्वारा धारा 9 में एक नया खंड (फ) जोड़ा गया है। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति बालक को शीघ्र लैंगिक परिपक्वता (early sexual maturity) प्राप्त कराने के उद्देश्य से कोई औषधि, हार्मोन या रासायनिक पदार्थ देता है या प्रेरित करता है, तो इसे गुरुतर लैंगिक हमला माना जाएगा। इसके लिए दोषी को धारा 10 के तहत 5 से 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सजा होगी।
2019 के कड़े सजा प्रावधानों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Shatrughna Baban Meshram Vs. State of Maharashtra (2020) - [मृत्युदंड की वैधता और सिद्धांतों पर अग्रणी मामला]:
- विवरण: 2019 के संशोधन के बाद पोक्सो की धारा 6 के तहत गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए 'मृत्युदंड' (Death Penalty) का प्रावधान जोड़ा गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक मामले में स्पष्ट किया कि यद्यपि बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून में मृत्युदंड की व्यवस्था की गई है, लेकिन न्यायपालिका को इस सजा को लागू करते समय भारतीय दंड संहिता के स्थापित सिद्धांत 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) का कड़ाई से पालन करना होगा। कोर्ट ने कहा कि मृत्युदंड देने से पहले आरोपी के सुधार की संभावनाओं और अपराध की क्रूरता के संतुलन का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
2. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018) - [सख्त दंड और त्वरित न्याय प्रणाली की पृष्ठभूमि]:
- विवरण: इस जनहित याचिका में सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर में बच्चों के खिलाफ बढ़ रही जघन्य यौन हिंसा की घटनाओं पर गहरा असंतोष व्यक्त किया था। न्यायालय ने केंद्र सरकार को कानून में संशोधन करने और 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ होने वाले जघन्य मामलों में कठोरतम सजा (जिसमें मृत्युदंड भी शामिल हो) का कानूनी प्रावधान बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसी ऐतिहासिक मामले की पृष्ठभूमि और अदालती टिप्पणियों के बाद संसद ने वर्ष 2019 में संशोधन अधिनियम पारित कर पोक्सो के दंड प्रावधानों में ये बड़े बदलाव किए थे।
3. Just Rights for Children Alliance Vs. S. Harish & Anr. (2024) - [धारा 15 (CSAM भंडारण) पर हालिया ऐतिहासिक निर्णय]:
- विवरण: यह सर्वोच्च न्यायालय का सबसे हालिया और मार्गदर्शक निर्णय है जो 2019 के संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित की गई धारा 15 के क्रियान्वयन से संबंधित है। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति केवल व्यक्तिगत रूप से बाल अश्लील सामग्री (CSAM) देखता या डाउनलोड करता है और उसे दूसरों के साथ साझा नहीं करता, तो वह धारा 15 के तहत अपराधी नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए व्यवस्था दी कि बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को केवल अपने फोन या कंप्यूटर में डाउनलोड करना या सहेजना भी पोक्सो की धारा 15 के तहत दंडनीय अपराध है, क्योंकि ऐसा कृत्य बच्चों के शोषण और उनके मानवाधिकारों के हनन को बढ़ावा देता है।
