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अध्याय 9: प्रकीर्ण (Miscellaneous - धारा 39 से 46)

 अध्याय 9: प्रकीर्ण (Miscellaneous - धारा 39 से 46)

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अंतिम अध्याय "प्रकीर्ण" (Miscellaneous) कानून के सुचारू कार्यान्वयन, बालकों को विधिक व विशेषज्ञ सहायता प्रदान करने, कानून के अध्यारोही प्रभाव (Overriding effect), लोक जागरूकता और नियम बनाने की सरकारी शक्तियों से संबंधित है. इस अध्याय के तहत धारा 39 से धारा 46 तक के प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:


1. धारा 39: विशेषज्ञ आदि की सहायता लेने के लिए बालक के लिए मार्गनिर्देश (Guidelines for child to take assistance of experts, etc.)

यह धारा पीड़ित बालक को मानसिक और शारीरिक आघात से उबारने के लिए विशेषज्ञों की सहायता सुनिश्चित करती है:

  • मार्गनिर्देशों का निर्माण: राज्य सरकार, इस अधिनियम के नियमों के अधीन रहते हुए, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), पेशेवरों (professionals) और विशेषज्ञों के सहयोग के लिए मार्गनिर्देश (Guidelines) तैयार करेगी.
  • विशेषज्ञों का दायरा: इन मार्गनिर्देशों में ऐसे व्यक्तियों/विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा जिनके पास मनोविज्ञान (psychology), सामाजिक कार्य (social work), चिकित्सीय स्वास्थ्य (physical health), मानसिक स्वास्थ्य (mental health) और बाल विकास (child development) का गहरा ज्ञान हो.
  • सहायता का चरण: ये विशेषज्ञ विचारण-पूर्व (Pre-trial) और विचारण (Trial) प्रक्रम के दौरान बालक की सहायता और सहयोग करेंगे.

2. धारा 40: विधिक काउन्सेल की सहायता लेने का बालक का अधिकार (Right of child to take assistance of legal counsel)

यह धारा बालक और उसके परिवार के कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार को मजबूत करती है:

  • पसंद के वकील का अधिकार: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 301 के परंतुक के अधीन रहते हुए, बालक का कुटुंब (परिवार) या उसका कानूनी संरक्षक इस अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध के लिए अपनी पसंद के विधिक काउंसेल (वकील) की सहायता लेने का हकदार होगा.
  • मुफ़्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid): यदि बालक का परिवार या संरक्षक विधिक काउंसेल का खर्च (फीस) वहन करने में असमर्थ है, तो विधिक सेवा प्राधिकरण (Legal Services Authority) उसे अपनी तरफ से मुफ़्त वकील उपलब्ध कराएगा.

3. धारा 41: कतिपय मामलों में धारा 3 से धारा 13 तक के उपबंधों का लागू न होना (Provisions of sections 3 to 13 not to apply in certain cases)

यह धारा चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों को सुरक्षा प्रदान करती है:

  • चिकित्सीय उपचार को छूट: यदि बालक की चिकित्सीय परीक्षा (Medical examination) या चिकित्सीय उपचार (Medical treatment) उसके माता-पिता या कानूनी संरक्षक की सहमति से किया जा रहा है, तो ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 3 से धारा 13 (जिसमें प्रवेशी लैंगिक हमला, लैंगिक हमला और लैंगिक उत्पीड़न आदि शामिल हैं) के उपबंध लागू नहीं होंगे. इसका उद्देश्य डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अनावश्यक कानूनी मुकदमों से बचाना है।

4. धारा 42: आनुषंगिक दंड (Alternative Punishment)

यह धारा उस स्थिति को स्पष्ट करती है जब कोई अपराध पोक्सो और अन्य कानूनों (जैसे IPC) दोनों के तहत दंडनीय हो:

  • गुरुतर दंड का सिद्धांत: जहाँ किसी कार्य या लोप (omission) के कारण इस अधिनियम के अधीन भी अपराध बनता है और साथ ही:
    • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 166क, 354क, 354ख, 354ग, 354घ, 370, 370क, 375, 376, 376क, 376कख, 376ख, 376ग, 376घ, 376घक, 376घख, 376ङ, या धारा 509 के अधीन; अथवा
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67ख के अधीन भी वह अपराध दंडनीय है; तो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, दोषी अपराधी केवल उसी दंड का भागी होगा जो मात्रा में अधिक (गुरुतर) होगा.

5. धारा 42क: अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना (Act not in derogation of any other law)

  • अतिरिक्त प्रभाव: इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य कानून के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण (derogation) में.
  • अध्यारोही प्रभाव (Overriding Effect): यदि पोक्सो अधिनियम और किसी अन्य कानून के बीच कोई असंगति (Inconsistency) या टकराव उत्पन्न होता है, तो इस अधिनियम के प्रावधानों का उस असंगति की सीमा तक अध्यारोही प्रभाव होगा. अर्थात पोक्सो कानून के प्रावधानों को ही सर्वोपरि माना जाएगा।

6. धारा 43: अधिनियम के बारे में लोक जागरूकता (Public awareness about Act)

यह धारा केंद्र और राज्य सरकारों पर कानून के प्रचार-प्रसार का दायित्व डालती है:

  • व्यापक प्रचार: केंद्रीय और राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएंगी कि साधारण जनता, बालकों, माता-पिता और संरक्षकों को इस अधिनियम के प्रावधानों के प्रति जागरूक करने के लिए टेलीविजन, रेडियो और प्रिंट मीडिया के माध्यम से नियमित अंतरालों पर व्यापक प्रचार किया जाए.
  • आवधिक प्रशिक्षण (Periodic Training): सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों को पोक्सो अधिनियम के प्रावधानों के सही कार्यान्वयन के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा.

7. धारा 44: अधिनियम के कार्यान्वयन की मानीटरी (Monitoring of implementation of Act)

यह धारा इस कानून के क्रियान्वयन पर नजर रखने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के आयोगों को प्राधिकृत करती है:

  • मानीटरी का दायित्व: बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत गठित राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य बालक अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) अपने सामान्य कार्यों के अतिरिक्त इस अधिनियम के कार्यान्वयन की मानीटरी (निगरानी) भी करेंगे.
  • जांच की शक्तियां: इस कानून के तहत किसी शिकायत या विषय की जांच करते समय इन आयोगों को वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो उन्हें बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अधीन दी गई हैं.
  • वार्षिक रिपोर्ट: ये आयोग इस अधिनियम के कार्यान्वयन की अपनी निगरानी रिपोर्ट को उक्त अधिनियम की धारा 16 के तहत अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी शामिल करेंगे.

8. धारा 45: नियम बनाने की शक्ति (Power to make rules)

  • केंद्रीय सरकार की शक्ति: केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को लागू करने के लिए राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकती है.
  • नियम बनाने के विषय: इसके तहत बालक संबंधी अश्लील सामग्री को मिटाने/नष्ट करने की रीति, दुभाषिए या विशेष शिक्षकों की योग्यता व फीस, बालक की आपात चिकित्सा देखरेख, मुआवजे (प्रतिकर) का संदाय और क्रियान्वयन की मानीटरी की प्रक्रिया तय की जाएगी.
  • संसद के समक्ष प्रस्तुति: इस धारा के तहत बनाया गया प्रत्येक नियम संसद के दोनों सदनों के समक्ष कुल तीस (30) दिनों की अवधि के लिए रखा जाएगा.

9. धारा 46: कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति (Power to remove difficulties)

  • कठिनाई निवारण आदेश: यदि अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी बनाने में कोई व्यावहारिक कठिनाई आती है, तो केंद्रीय सरकार राजपत्र में आदेश द्वारा उसे दूर करने के प्रावधान कर सकती है, बशर्ते वे इस अधिनियम के मूल उद्देश्यों के असंगत न हों.
  • समय-सीमा: ऐसा कोई भी कठिनाई निवारण आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात नहीं किया जाएगा.


अध्याय 9 के प्रावधानों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Independent Thought Vs. Union of India (2017) - [धारा 42 और 42क पर ऐतिहासिक निर्णय]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 42 और 42क के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि यदि किसी अपराध के संबंध में भारतीय दंड संहिता (IPC) और पोक्सो अधिनियम के प्रावधानों में असंगति या विरोधाभास होता है, तो पोक्सो अधिनियम की धारा 42क के तहत पोक्सो कानून को ही प्राथमिकता दी जाएगी। न्यायालय ने माना कि 18 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं के संरक्षण के मामले में पोक्सो का अध्यारोही प्रभाव रहेगा और अपराधियों को पोक्सो के तहत मिलने वाले गुरुतर (कठोर) दंड से ही दंडित किया जाएगा।

2. Exploitation of Children in Orphanages in the State of Tamil Nadu Vs. Union of India (2017) - [धारा 44 (मानीटरी) पर अग्रणी मामला]:

  • निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 44 के तहत राष्ट्रीय (NCPCR) और राज्य (SCPCR) बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की निगरानी भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। न्यायालय ने निर्देश दिए कि देश के सभी अनाथालयों, शेल्टर होम्स और बाल गृहों में पोक्सो अधिनियम के सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी कड़ाई से निगरानी करने का दायित्व इन आयोगों का है और उन्हें इसके लिए नियमित अंतराल पर निरीक्षण और ऑडिट करना चाहिए।

3. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018) - [धारा 40 और 43 पर मार्गदर्शक निर्णय]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से राज्यों को निर्देशित किया कि धारा 40 के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली कानूनी सहायता गुणवत्तापूर्ण होनी चाहिए। साथ ही, न्यायालय ने देश भर में बाल यौन अपराधों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए सरकार को धारा 43 के तहत व्यापक डिजिटल और प्रिंट मीडिया अभियान चलाने और पुलिस कर्मियों को विशेष संवेदीकरण प्रशिक्षण (Sensitization Training) देने के निर्देश जारी किए।


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