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अध्याय 8: विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेखन (धारा 33, 34, 35, 36, 37 और 38)

 अध्याय 8: विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां तथा साक्ष्य का अभिलेखन (धारा 33, 34, 35, 36, 37 और 38)

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 8 बच्चों के प्रति अत्यंत संवेदनशील और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाता है. यह अध्याय विशेष अदालतों के कामकाज की प्रक्रिया, उनकी शक्तियों और अदालती कार्यवाही के दौरान बालक के साक्ष्य (गवाही) दर्ज करने के विशेष सुरक्षात्मक नियमों का निर्धारण करता है ताकि बालक को कानूनी प्रक्रिया के दौरान किसी भी मानसिक आघात या प्रताड़ना का सामना न करना पड़े.

इस अध्याय के सभी प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:


1. धारा 33: विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां (Procedure and Powers of Special Courts)

यह धारा विशेष न्यायालयों को असाधारण शक्तियां प्रदान करती है और बालक-अनुकूल न्यायिक वातावरण सुनिश्चित करती है:

  • बिना सुपुर्दगी (Commitment) के संज्ञान लेना: दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सामान्यतः सत्र न्यायालय सीधे किसी मामले का संज्ञान नहीं ले सकता, लेकिन पोक्सो का विशेष न्यायालय किसी भी अपराध का संज्ञान सीधे ले सकता है. यह संज्ञान पुलिस रिपोर्ट या अपराध के तथ्यों का परिवाद (शिकायत) प्राप्त होने पर लिया जा सकता है.
  • बालक से अप्रत्यक्ष पूछताछ (Indirect Examination): गवाही के दौरान विशेष लोक अभियोजक (SPP) या अभियुक्त का वकील बालक से सीधे सवाल नहीं पूछेगा. वे अपने सवाल पहले विशेष न्यायालय को संसूचित (बताएंगे) करेंगे, और न्यायालय उन सवालों को बालक के समक्ष उसकी मानसिक स्थिति के अनुकूल भाषा में रखेगा.
  • बार-बार विश्राम (Breaks) की अनुमति: विचारण (Trial) के दौरान यदि आवश्यक हो, तो न्यायालय बालक को बार-बार विश्राम (Break) लेने की अनुमति दे सकता है.
  • मित्रतापूर्ण वातावरण का सृजन: न्यायालय में बालक के परिवार के किसी सदस्य, संरक्षक, मित्र या रिश्तेदार की उपस्थिति को अनिवार्य रूप से अनुमति दी जाएगी, जिस पर बालक को पूरा भरोसा हो.
  • बार-बार बुलाने पर रोक: विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि बालक को साक्ष्य दर्ज कराने के लिए बार-बार न्यायालय न बुलाया जाए.
  • आक्रामक और चरित्र हनन संबंधी सवालों पर प्रतिबंध: न्यायालय सुनवाई के दौरान किसी भी प्रकार के आक्रामक, अनुचित या बालक के चरित्र हनन (character assassination) करने वाले प्रश्नों को पूछने की अनुमति बिल्कुल नहीं देगा. हर स्थिति में बालक की गरिमा (Dignity) को बनाए रखना न्यायालय का कर्तव्य होगा.
  • बालक की पहचान की पूर्ण गोपनीयता: अन्वेषण (जांच) या विचारण के दौरान किसी भी समय बालक की पहचान (जिसके अंतर्गत उसका परिवार, विद्यालय, रिश्तेदार, पड़ोसी या कोई भी अन्य ऐसी जानकारी जिससे उसकी पहचान हो सके) प्रकट नहीं की जाएगी.
    • अपवाद: यदि विशेष न्यायालय को यह लगता है कि बालक का नाम या पहचान उजागर करना स्वयं बालक के सर्वोत्तम हित में है, तो वह लिखित कारणों के आधार पर ऐसा करने की अनुमति दे सकता है.
  • अंतरिम या तुरंत मुआवजे (Compensation) का आदेश: विशेष न्यायालय अभियुक्त को मिलने वाले दंड के अतिरिक्त, बालक को हुए शारीरिक या मानसिक आघात (trauma) के लिए या उसके तुरंत पुनर्वास (rehabilitation) के लिए मुआवजे के भुगतान का निर्देश दे सकता है.
  • सत्र न्यायालय की शक्तियां: इस अधिनियम के तहत विशेष न्यायालय को एक सत्र न्यायालय (Sessions Court) की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी और वह विचारण में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में निर्धारित सत्र विचारण की प्रक्रिया का पालन करेगा.

2. धारा 34: बालक द्वारा अपराध किए जाने और विशेष न्यायालय द्वारा आयु का निर्धारण (Procedure when offence is committed by child and determination of age by Special Court)

यह धारा उन परिस्थितियों से निपटती है जहाँ आरोपी स्वयं एक बालक (18 वर्ष से कम आयु का) हो या जहाँ पीड़ित/आरोपी की आयु को लेकर विवाद हो:

  • बालक अभियुक्त के साथ प्रक्रिया: यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो स्वयं "बालक" है, तो उस पर विशेष न्यायालय में मुकदमा नहीं चलेगा; बल्कि उस पर किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के तहत कार्यवाही की जाएगी.
  • न्यायालय द्वारा आयु का निर्धारण: यदि विचारण के दौरान यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति बालक है या नहीं, तो विशेष न्यायालय स्वयं उस व्यक्ति की आयु के संबंध में संतुष्ट होने के बाद आयु का निर्धारण करेगा और अपने इस निर्णय के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा.
  • आयु निर्धारण की वैधता: यदि बाद में कोई नया सबूत यह दर्शाता है कि न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई आयु सही नहीं थी, तो भी विशेष न्यायालय द्वारा पूर्व में दिया गया कोई भी आदेश केवल इस आधार पर अवैध या अमान्य (invalid) नहीं माना जाएगा.

3. धारा 35: बालक के साक्ष्य को अभिलिखित करने और मामले के निपटारे के लिए समय-सीमा (Time period for recording evidence and disposal of case)

यौन अपराधों के त्वरित न्याय के लिए इस धारा में सख्त समय-सीमा निर्धारित की गई है:

  • 30 दिनों के भीतर साक्ष्य दर्ज करना: विशेष न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान (cognizance) लिए जाने की तारीख से तीस (30) दिनों के भीतर बालक के साक्ष्य (गवाही) को अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाना चाहिए. यदि इसमें कोई देरी होती है, तो न्यायालय को उस देरी के कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करना होगा.
  • एक वर्ष के भीतर अंतिम निपटारा: विशेष न्यायालय, जहाँ तक संभव हो, अपराध का संज्ञान लिए जाने की तारीख से एक (1) वर्ष की अवधि के भीतर पूरे विचारण (Trial) को समाप्त कर मामले का अंतिम निपटारा करेगा.

4. धारा 36: साक्ष्य देते समय बालक का अभियुक्त को न दिखना (Child not to see accused while giving evidence)

यह धारा बालक को अभियुक्त के सामने आने पर होने वाले मानसिक भय और तनाव से बचाने के लिए तकनीकी सुरक्षा उपाय प्रदान करती है:

  • अभियुक्त का सामना होने से रोकना: विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि साक्ष्य अभिलिखित करते समय बालक को किसी भी रूप में अभियुक्त के सामने न लाया जाए और न ही बालक को अभियुक्त दिखाई दे.
  • अभियुक्त के अधिकारों का संरक्षण: इसके साथ ही, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि अभियुक्त बालक के बयानों को सुन सके और विचारण के दौरान अपने अधिवक्ता (वकील) के निरंतर संपर्क में रह सके.
  • तकनीकी माध्यमों का उपयोग: इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए विशेष न्यायालय निम्नलिखित साधनों का उपयोग कर सकता है:
    • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Conferencing) के माध्यम से।
    • एकल दृश्य दर्पण (One-way mirror)।
    • पर्दे (Screens) का उपयोग करके।
    • कोई अन्य समरूप युक्ति (similar devices)।

5. धारा 37: विचारण का बंद कमरे में संचालन (Trial to be conducted in-camera)

यह धारा पीड़ित बालक की निजता और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने के लिए बंद कमरे की सुनवाई की अनिवार्यता तय करती है:

  • बंद कमरे में सुनवाई (In-Camera Trial): विशेष न्यायालय मामले का विचारण अनिवार्य रूप से बंद कमरे में (जहां आम जनता या मीडिया को प्रवेश की अनुमति नहीं होती) आयोजित करेगा. यह सुनवाई बालक के माता-पिता या उसकी पसंद के विश्वसनीय व्यक्ति की उपस्थिति में ही की जाएगी.
  • न्यायालय से बाहर परीक्षा (कमीशन जारी करना): यदि न्यायालय की यह राय है कि बालक की परीक्षा न्यायालय परिसर से बाहर किसी अन्य स्थान पर की जानी आवश्यक है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 284 के तहत कमीशन निकालने की कार्यवाही कर सकता है.

6. धारा 38: बालक का साक्ष्य अभिलिखित करते समय दुभाषिए या विशेषज्ञ की सहायता लेना (Assistance of interpreter or expert)

यह धारा उन परिस्थितियों के लिए है जहाँ बालक संवाद करने में असमर्थ हो या उसे विशेष सहायता की आवश्यकता हो:

  • अनुवादक या दुभाषिए की सहायता: यदि आवश्यक हो, तो न्यायालय बालक का साक्ष्य दर्ज करते समय किसी ऐसे अनुवादक या दुभाषिए की मदद ले सकता है जो विहित योग्यता और अनुभव रखता हो (और उसे तय नियमों के अनुसार फीस का भुगतान किया जाएगा).
  • विशेष शिक्षक या विशेषज्ञ की मदद: यदि पीड़ित बालक मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग या अशक्त (physically or mentally disabled) है, तो विशेष न्यायालय साक्ष्य दर्ज करने के लिए किसी विशेष शिक्षक (Special Educator) या बालक के संवाद करने के तरीके से अच्छी तरह परिचित किसी व्यक्ति या क्षेत्र के विशेषज्ञ की सहायता ले सकेगा.


अध्याय 8 के प्रावधानों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Sakshi Vs. Union of India (2004) - [धारा 33 और 36 की पृष्ठभूमि]: यह पोक्सो अधिनियम के लागू होने से पहले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक (Leading) मामला है।

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यौन शोषण के शिकार बालकों के लिए अदालत का माहौल अत्यंत भयावह होता है। न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि बच्चों की गवाही के दौरान अभियुक्त और बच्चे के बीच पर्दा (Screen) लगाया जाना चाहिए ताकि बच्चा भयमुक्त होकर गवाही दे सके। न्यायालय ने साक्ष्य दर्ज करते समय आक्रामक और अश्लील सवालों पर भी रोक लगाने की बात कही थी। सर्वोच्च न्यायालय के इसी ऐतिहासिक फैसले के सिद्धांतों को बाद में पोक्सो अधिनियम की धारा 33(6) और धारा 36 के रूप में कानूनी रूप दिया गया।

2. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018) - [धारा 35 के क्रियान्वयन पर अग्रणी निर्णय]: यह पोक्सो मामलों की त्वरित सुनवाई के संबंध में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शक मामला है।

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर में बाल यौन शोषण के मामलों में हो रहे विलंभ पर चिंता जताई। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो की धारा 35 के तहत निर्धारित समय-सीमा (30 दिन में गवाही और 1 वर्ष में विचारण पूरा करना) केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसका कड़ाई से पालन होना चाहिए। न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों को इसके लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने और बुनियादी ढांचा मजबूत करने के कड़े निर्देश जारी किए।

3. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Gireesha (2014) - [साक्ष्य दर्ज करने की संवेदनशीलता]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अदालतों को बच्चों के साक्ष्य दर्ज करते समय अत्यधिक संवेदनशीलता बरतने के निर्देश दिए। न्यायालय ने कहा कि जजों को स्वयं आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायालय का माहौल बाल-अनुकूल हो और गवाही के दौरान बच्चे को बार-बार कटघरे में खड़े होकर मानसिक प्रताड़ना न झेलनी पड़े।


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