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अध्याय 7: विशेष न्यायालय (Special Court) और उसकी शक्तियां (धारा 28, 29, 30, 31 और 32)

 अध्याय 7: विशेष न्यायालय (Special Court) और उसकी शक्तियां

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 7 विशेष रूप से उन न्यायालयों के गठन, उनके अधिकार क्षेत्र, साक्ष्य संबंधी विशेष कानूनी उपधारणाओं (Presumptions) और मामलों के संचालन के लिए विशेष अभियोजकों की नियुक्ति से संबंधित है। इस अध्याय में धारा 28 से धारा 32 तक के प्रावधान शामिल हैं।

इस अध्याय के सभी प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:


1. धारा 28: विशेष न्यायालयों को अभिहित किया जाना (Designation of Special Courts)

यह धारा पोक्सो मामलों के त्वरित विचारण (Speedy Trial) के लिए विशेष अदालतों के गठन का मार्ग प्रशस्त करती है:

  • विशेष न्यायालयों का गठन: बालकों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराधों का त्वरित विचारण सुनिश्चित करने के लिए, राज्य सरकार, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति (Chief Justice of the High Court) के परामर्श से, राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले के लिए एक सेशन न्यायालय (Sessions Court) को विशेष न्यायालय (Special Court) के रूप में अभिहित करेगी.
  • बालक न्यायालय को मान्यता: यदि किसी सेशन न्यायालय को 'बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005' या तत्कालीन समय में लागू किसी अन्य कानून के तहत पहले से ही "बालक न्यायालय" (Child Court) के रूप में अधिसूचित किया गया है, तो उसे इस अधिनियम के तहत भी विशेष न्यायालय समझा जाएगा.
  • संयुक्त विचारण (Joint Trial) की शक्ति: इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय विशेष न्यायालय को उस अन्य अपराध का भी विचारण करने का अधिकार होगा, जिसके साथ अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 के तहत उसी विचारण में आरोपित किया जा सकता है.
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत अधिकार क्षेत्र: विशेष न्यायालय को 'सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000' की धारा 67ख (Section 67B) के तहत आने वाले उन अपराधों के विचारण की भी पूर्ण अधिकारिता होगी, जो बालकों को चित्रित करने वाली अश्लील या यौन प्रकीर्ण सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण या उनके ऑनलाइन दुरुपयोग को सुकर बनाने से संबंधित हैं.

2. धारा 29: कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा (Presumption as to certain offences)

यह धारा इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और कठोर धाराओं में से एक है, जो अभियुक्त पर निर्दोषिता साबित करने का भार (Reverse Burden of Proof) डालती है:

  • न्यायालय की उपधारणा (Shall Presume): जहाँ किसी व्यक्ति पर इस अधिनियम की धारा 3, 5, 7 और 9 के अधीन कोई अपराध करने, उसका दुष्प्रेरण (Abetment) करने, या उसे करने का प्रयत्न (Attempt) करने के लिए मुकदमा (अभियोजन) चलाया जाता है, वहाँ विशेष न्यायालय अनिवार्य रूप से यह उपधारणा करेगा कि उस व्यक्ति ने वह अपराध, दुष्प्रेरण या प्रयत्न किया है.
  • खंडन योग्य उपधारणा: यह एक खंडन योग्य उपधारणा (Rebuttable Presumption) है। इसका अर्थ यह है कि न्यायालय तब तक आरोपी को दोषी मानकर चलेगा, जब तक कि आरोपी अदालत में साक्ष्यों के माध्यम से इसके विपरीत (यानी खुद के निर्दोष होने का तथ्य) साबित नहीं कर देता.

3. धारा 30: आपराधिक मानसिक दशा की उपधारणा (Presumption of culpable mental state)

यह धारा अभियुक्त की मानसिक स्थिति (Mens Rea) के संबंध में न्यायालयीन उपधारणा का निर्धारण करती है:

  • आपराधिक मनःस्थिति की उपधारणा: इस अधिनियम के अधीन किसी भी ऐसे अभियोजन में, जहाँ अभियुक्त की ओर से किसी "आपराधिक मानसिक दशा" (Culpable mental state) की आवश्यकता होती है, विशेष न्यायालय यह मानकर चलेगा (उपधारणा करेगा) कि अभियुक्त की वह मानसिक दशा विद्यमान थी.
  • बचाव का अवसर: अभियुक्त के पास अदालत में यह साबित करने का पूरा अवसर और अधिकार (प्रतिरक्षा) होगा कि आरोपित कृत्य के संबंध में उसकी ऐसी कोई आपराधिक मानसिक स्थिति नहीं थी.
  • साबित करने का मानक (Standard of Proof): इस धारा के तहत कोई तथ्य केवल तभी साबित माना जाएगा, जब न्यायालय इस बात से "युक्तियुक्त संदेह से परे" (Beyond Reasonable Doubt) संतुष्ट हो जाए कि ऐसी मानसिक स्थिति मौजूद नहीं थी. अभियुक्त केवल "संभाव्यता की प्रबलता" (Preponderance of probability) के आधार पर अपना बचाव नहीं कर सकता.
  • आपराधिक मानसिक दशा का दायरा: इस धारा के स्पष्टीकरण के अनुसार, "आपराधिक मानसिक दशा" के अंतर्गत अभियुक्त का आशय (Intent), हेतुक (Motive), किसी तथ्य का ज्ञान (Knowledge), और किसी तथ्य में विश्वास या विश्वास करने का कारण (Reason to believe) शामिल है.

4. धारा 31: विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना (Application of CrPC)

यह धारा विशेष न्यायालयों की प्रक्रियाओं को सामान्य आपराधिक प्रक्रिया से जोड़ती है:

  • CrPC का लागू होना: इस अधिनियम में स्पष्ट रूप से किए गए प्रावधानों को छोड़कर, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) के सभी प्रावधान (जिसमें जमानत और बंधपत्र/Bail and Bond संबंधी प्रावधान भी शामिल हैं) विशेष न्यायालय के समक्ष होने वाली कार्यवाहियों पर पूरी तरह लागू होंगे.
  • सेशन न्यायालय का दर्जा: इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं के सुचारू संचालन के उद्देश्य से, विशेष न्यायालय को कानूनन एक सेशन न्यायालय (Sessions Court) समझा जाएगा.
  • लोक अभियोजक की मान्यता: विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन (Prosecution) का संचालन करने वाले व्यक्ति को कानून की दृष्टि में लोक अभियोजक (Public Prosecutor) माना जाएगा.

5. धारा 32: विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor)

यह धारा पोक्सो अदालतों में पीड़ितों का पक्ष मजबूती से रखने के लिए विशेष वकीलों की नियुक्ति सुनिश्चित करती है:

  • विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति: राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, केवल पोक्सो अधिनियम के तहत आने वाले मामलों के संचालन के लिए प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए एक विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) की नियुक्ति करेगी.
  • योग्यता और अनुभव: विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त होने के लिए उस व्यक्ति के पास अधिवक्ता (Advocate) के रूप में विधि व्यवसाय (कानूनी प्रैक्टिस) करने का कम से कम सात (7) वर्ष का निरंतर अनुभव होना अनिवार्य है.
  • संवैधानिक दर्जा: इस धारा के तहत नियुक्त प्रत्येक विशेष लोक अभियोजक को CrPC, 1973 की धारा 2 के खंड (प) के अर्थ के अंतर्गत एक लोक अभियोजक माना जाएगा और संहिता के सभी प्रावधान उन पर लागू होंगे.


अध्याय 7 पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख और ऐतिहासिक निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018) - [धारा 28 पर मार्गदर्शक मामला]:

  • निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर में पोक्सो मामलों के भारी बैकलॉग और सुनवाई में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने आदेश जारी किया कि जिन जिलों में पोक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या 100 से अधिक है, वहां केंद्र और राज्य सरकारों को विशेष रूप से फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालयों (Fast-Track Special Courts - FTSCs) की स्थापना करनी चाहिए, जो केवल और केवल पोक्सो मामलों की ही सुनवाई करेंगे। इस निर्णय से देश भर में पोक्सो अदालतों के बुनियादी ढांचे में क्रांतिकारी सुधार हुआ।

2. Maheshwar Tigga Vs. State of Jharkhand (2020) - [धारा 29 और 30 (उपधारणा) पर ऐतिहासिक व्याख्या]:

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो की धारा 29 और 30 के तहत मिलने वाली "कानूनी उपधारणा" (Presumption) के सिद्धांत को स्पष्ट किया। न्यायालय ने स्थापित किया कि हालांकि धारा 29 आरोपी पर निर्दोष साबित करने का भार डालती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) को कुछ साबित ही नहीं करना है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन को सबसे पहले मामले के "आधारभूत तथ्य" (Foundational Facts) युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने होंगे। एक बार जब अभियोजन यह साबित कर देता है कि बच्चे के साथ यौन कृत्य हुआ है और उसमें आरोपी संलिप्त था, केवल तभी धारा 29 के तहत दोष की उपधारणा सक्रिय होगी।

3. State of Bihar Vs. Rajballabh Prasad (2017) - [धारा 31 और जमानत के सिद्धांत]:

  • निर्णय: चूंकि धारा 31 के तहत CrPC के जमानत संबंधी प्रावधान पोक्सो मामलों में भी लागू होते हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि पोक्सो के तहत जमानत देते समय न्यायालयों को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए। न्यायालय ने माना कि पोक्सो के अपराध समाज के खिलाफ गंभीर अपराध हैं। जमानत देने का निर्णय करते समय पीड़ित बालक की सुरक्षा, गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका और अपराध की जघन्यता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती कि सुनवाई में समय लग रहा है।


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