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अध्याय 6: बालक के कथनों को अभिलिखित करने के लिए प्रक्रिया और उसकी चिकित्सीय परीक्षा (धारा 24, 25, 26 और 27)

 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) का अध्याय 6 बालकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह अध्याय मुख्य रूप से इस बात को विनियमित करता है कि किसी पीड़ित बालक का बयान किस प्रकार दर्ज किया जाएगा और उसकी चिकित्सीय (मेडिकल) परीक्षा की प्रक्रिया क्या होगी, ताकि बालक को दोबारा किसी मानसिक आघात (retraumatization) से न गुजरना पड़े।

इस अध्याय के अंतर्गत धारा 24, 25, 26 और 27 शामिल हैं, जिनका विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:


धारा 24: बालक के कथन को अभिलिखित किया जाना (Recording of statement of a child)

यह धारा पुलिस द्वारा बालक का बयान दर्ज करने की प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों को तय करती है:

  • बयान दर्ज करने का स्थान और अधिकारी: बालक का बयान उसके निवास स्थान पर, या ऐसे स्थान पर जहाँ वह आमतौर पर रहता है, या फिर उसकी पसंद के किसी भी स्थान पर दर्ज किया जाएगा। यह बयान यथासंभव उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) की रैंक से ऊपर की किसी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही अभिलिखित (record) किया जाएगा।
  • वर्दी पर प्रतिबंध: बालक का बयान दर्ज करते समय पुलिस अधिकारी वर्दी (Uniform) में नहीं होगा। इसका उद्देश्य बालक के मन से पुलिस का भय दूर करना है।
  • अभियुक्त से सामना न होना: अन्वेषण (Investigation) करने वाला पुलिस अधिकारी बालक की परीक्षा (पूछताछ) करते समय यह सुनिश्चित करेगा कि बालक किसी भी समय अभियुक्त (Accused) के सीधे संपर्क में न आए
  • रात में पुलिस स्टेशन में रखने पर रोक: किसी भी बालक को किसी भी परिस्थिति या कारण से रात्रि के समय पुलिस स्टेशन में निरुद्ध (detain/रोक कर) नहीं रखा जाएगा
  • मीडिया से पहचान की सुरक्षा: पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि बालक की पहचान पब्लिक मीडिया से पूरी तरह सुरक्षित और गुप्त रखी जाए, जब तक कि बालक के सर्वोत्तम हित में विशेष न्यायालय द्वारा कोई अलग निर्देश न दिया गया हो。

धारा 25: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन का अभिलेखन (Recording of statement of a child by Magistrate)

यह धारा न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है:

  • बयान दर्ज करने का तरीका: यदि बालक का कथन दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 164 के अधीन दर्ज किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट बालक द्वारा बोले गए शब्दों के अनुसार ही उस कथन को अभिलिखित करेगा।
  • अभियुक्त के वकील की अनुपस्थिति: CrPC की धारा 164(1) के प्रावधानों के विपरीत, मजिस्ट्रेट द्वारा बालक का कथन दर्ज करते समय अभियुक्त के अधिवक्ता (Advocate) को उपस्थित रहने की अनुमति नहीं होगी
  • दस्तावेजों की निःशुल्क प्रति: पुलिस द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट (Charge sheet) दाखिल किए जाने पर, मजिस्ट्रेट बालक और उसके माता-पिता या प्रतिनिधि को CrPC की धारा 207 के तहत विनिर्दिष्ट सभी आवश्यक दस्तावेजों की एक प्रति प्रदान करेगा।

धारा 26: अभिलिखित किए जाने वाले कथन के संबंध में अतिरिक्त उपबंध (Additional provisions regarding recording of statement)

यह धारा विशेष परिस्थितियों में बयानों के सुचारू अभिलेखन के लिए अतिरिक्त सहायता प्रदान करती है:

  • भरोसेमंद व्यक्ति की उपस्थिति: मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी, बालक के माता-पिता या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में बालक का कथन दर्ज करेंगे, जिसमें बालक का पूर्ण भरोसा या विश्वास हो।
  • अनुवादक या दुभाषिए की मदद: यदि आवश्यक हो, तो मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी कथन दर्ज करते समय किसी योग्य और अनुभवी अनुवादक (Translator) या दुभाषिए (Interpreter) की सहायता ले सकते हैं (जिसके लिए विहित नियमों के अनुसार शुल्क का भुगतान किया जाएगा)।
  • विशेष शिक्षक या विशेषज्ञ की सहायता: यदि बालक मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त (physically or mentally disabled) है, तो मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी बयान दर्ज करने के लिए किसी विशेष शिक्षक (Special Educator), या बालक से संवाद करने के तरीके से अच्छी तरह परिचित किसी व्यक्ति या क्षेत्र के विशेषज्ञ की सहायता ले सकेंगे।
  • श्रव्य-दृश्य (Audio-Video) रिकॉर्डिंग: जहाँ तक संभव हो, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि बालक का बयान श्रव्य-दृश्य (Audio-Video) इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी रिकॉर्ड किया जाए।

धारा 27: बालक की चिकित्सीय परीक्षा (Medical examination of a child)

यह धारा पीड़ित बालक की चिकित्सा जांच से संबंधित सुरक्षा उपाय तय करती है:

  • बिना FIR के भी चिकित्सा जांच: यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध हुआ है, तो भले ही मामले में कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या शिकायत दर्ज न की गई हो, बालक की चिकित्सीय परीक्षा CrPC, 1973 की धारा 164क के अनुसार तुरंत की जाएगी।
  • महिला डॉक्टर द्वारा जांच: यदि पीड़ित बालक कोई बालिका (Female Child) है, तो उसकी चिकित्सीय परीक्षा केवल एक महिला डॉक्टर द्वारा ही की जाएगी।
  • अभिभावकों की उपस्थिति: चिकित्सीय परीक्षा बालक के माता-पिता या उसके द्वारा विश्वसनीय किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में ही की जाएगी।
  • नामित महिला की उपस्थिति: यदि बालक के माता-पिता या विश्वसनीय व्यक्ति किसी कारण से परीक्षा के दौरान उपस्थित नहीं हो पाते हैं, तो चिकित्सा संस्थान के प्रमुख (Head of the Medical Institution) द्वारा नामित की गई किसी अन्य महिला की उपस्थिति में ही चिकित्सीय परीक्षा संपन्न की जाएगी।


अध्याय 6 (बयान और चिकित्सा परीक्षा) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. State of Karnataka Vs. Shivanna @ Gireesha (2014) - [CrPC 164 के बयानों पर ऐतिहासिक दिशा-निर्देश]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यौन अपराध के पीड़ितों के बयानों को दर्ज करने के संबंध में बेहद महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम की धारा 25 और CrPC की धारा 164 के तहत पीड़ित बालक का बयान बिना किसी देरी के, पुलिस रिपोर्ट मिलने के तुरंत बाद दर्ज किया जाना चाहिए। जांच अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराते समय बच्चे पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव न हो, ताकि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ न की जा सके और मामले की सत्यता बनी रहे।

2. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018) - [धारा 24(5) गोपनीयता का सिद्धांत]:

  • निर्णय: पोक्सो की धारा 24(5) पुलिस को बच्चे की पहचान को मीडिया और जनता से सुरक्षित रखने का दायित्व सौंपती है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में इस गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार की तरह लागू करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने कहा कि जांच के दौरान लिए गए बयानों, मेडिकल रिपोर्ट या एफआईआर की कोई भी प्रति किसी भी अनधिकृत व्यक्ति या मीडिया हाउस को नहीं दी जा सकती। पुलिस अधिकारियों को बच्चे की निजता का सर्वोच्च सम्मान करना होगा।

3. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022) - [बालक के बयानों की साक्ष्य उपयोगिता]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि धारा 24 और 25 के तहत दर्ज किए गए बालक के बयान सुसंगत, विश्वसनीय और विरोधाभासों से मुक्त हैं, तो केवल उसी के आधार पर आरोपी को सजा (Doshsiddhi) सुनाई जा सकती है। पोक्सो मामलों में अभियोजन के लिए हर बार विस्तृत वैज्ञानिक या अन्य मेडिकल कोरोबोरेशन (पुष्टि) का होना ही अनिवार्य नहीं है, बशर्ते बच्चे की गवाही सच्ची और प्राकृतिक हो।


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