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अध्याय 4: किसी अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment) और उसको करने का प्रयत्न (Attempt) तथा उनके दंड

 अध्याय 4: किसी अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment) और उसको करने का प्रयत्न (Attempt) तथा उनके दंड

पोक्सो अधिनियम, 2012 का अध्याय 4 उन लोगों को कानून के दायरे में लाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो सीधे तौर पर यौन अपराध नहीं करते, लेकिन अपराध की योजना बनाने, अपराधी की मदद करने, बच्चे को बहलाने-फुसलाने या अपराध करने का प्रयास (Attempt) करने में संलिप्त होते हैं। इस अध्याय में कुल तीन धाराएं हैं: धारा 16, धारा 17 और धारा 18


1. धारा 16: किसी अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment of an Offence)

इस धारा के तहत किसी अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment) करने वाले व्यक्ति को परिभाषित किया गया है। कोई व्यक्ति किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यह तब माना जाता है जब वह:

  • पहला (उकसाना): वह किसी अन्य व्यक्ति को वह अपराध करने के लिए उकसाता (Instigates) है।
  • दूसरा (षड्यंत्र में शामिल होना): वह उस अपराध को अंजाम देने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र (Conspiracy) में सम्मिलित होता है। यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में और उस अपराध को करने के उद्देश्य से कोई कार्य या अवैध लोप (illegal omission) घटित होता है, तो वह दुष्प्रेरण का दोषी होगा।
  • तीसरा (साशय सहायता करना): वह किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा जानबूझकर (साशय) उस अपराध को करने में सहायता (Aids) करता है।

धारा 16 के स्पष्टीकरण (Explanations): अधिनियम में दुष्प्रेरण के दायरे को और स्पष्ट करने के लिए तीन महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिए गए हैं:

  1. स्पष्टीकरण 1 (सक्रिय रूप से उकसाना): यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत बयानी (दुर्व्यपदेशन) द्वारा या किसी ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर (जिसे प्रकट करने के लिए वह कानूनी रूप से बाध्य है) स्वेच्छा से कोई अपराध करवाता है या करवाने का प्रयास करता है, तो यह माना जाएगा कि उसने अपराध के लिए उकसाया है।
  2. स्पष्टीकरण 2 (अपराध को सुकर बनाना): कोई भी व्यक्ति जो किसी अपराध के होने से पहले या उसके होने के समय, उस कार्य को आसान बनाने (सुकर बनाने) के लिए कोई कदम उठाता है, वह अपराध में सहायता करने का दोषी माना जाएगा।
  3. स्पष्टीकरण 3 (बालकों के संबंध में विशेष सुरक्षा): यह स्पष्टीकरण अत्यंत संवेदनशील है। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी बालक को इस अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध के प्रयोजन के लिए:
    • धमकी देता है, बल प्रयोग करता है या प्रपीड़ित (coerce) करता है,
    • उसका अपहरण करता है, कपट या प्रपंच रचता है,
    • अपनी शक्ति, पद या स्थिति का दुरुपयोग करता है,
    • बालक की भेद्यता (vulnerability) का लाभ उठाता है, अथवा
    • बालक पर नियंत्रण रखने वाले किसी व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के फायदों (benefits) या संदायों (payments) का लेन-देन करता है, उसे नियोजित करता है या आश्रय देता है, तो यह माना जाएगा कि उसने उस अपराध को करने में सहायता की है।

2. धारा 17: दुष्प्रेरण के लिए दंड (Punishment for Abetment)

यह धारा दुष्प्रेरण के दोषी व्यक्ति के लिए सजा का निर्धारण करती है।

  • सजा का प्रावधान: इस धारा के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप ही किया गया है, तो उसे वही सजा दी जाएगी जो उस मूल अपराध के लिए कानून में निर्धारित की गई है
  • स्पष्टीकरण: कोई कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब माना जाता है, जब वह कार्य उस उकसाहट के कारण, उस षड्यंत्र के अनुसरण में, या उस साशय सहायता से किया गया हो जिससे दुष्प्रेरण उत्पन्न हुआ था।

इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने 'प्रवेशी लैंगिक हमले' (धारा 3) के लिए किसी को उकसाया या सहायता की, और वह अपराध हो गया, तो दुष्प्रेरक को भी धारा 4 के तहत वही सजा (न्यूनतम 10 वर्ष या आजीवन कारावास) मिलेगी जो मुख्य अपराधी को मिलनी तय है।


3. धारा 18: किसी अपराध को करने के प्रयत्न के लिए दंड (Punishment for Attempt)

यह धारा उन मामलों से निपटती है जहाँ अपराध करने का प्रयास (Attempt) किया गया था, भले ही वह पूरी तरह से संपन्न न हो पाया हो।

  • सजा का प्रावधान: जो कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के तहत दंडनीय किसी भी अपराध को करने का प्रयत्न (Attempt) करेगा या अपराध करवाएगा, और उस प्रयत्न में अपराध को अंजाम देने के लिए कोई कदम या कार्य उठाएगा, उसे निम्नलिखित सजा मिलेगी:
    • यदि उस अपराध के लिए मुख्य सजा आजीवन कारावास है, तो प्रयत्न करने वाले को आजीवन कारावास की आधी अवधि तक की सजा दी जा सकेगी।
    • यदि उस अपराध के लिए कोई अन्य कारावास निर्धारित है, तो उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम (अधिकतम) अवधि के आधे तक की सजा दी जा सकेगी।
    • अपराधी को कारावास के साथ जुर्माने, या फिर दोनों (आधी सजा और जुर्माना) से दंडित किया जा सकता है।


अध्याय 4 (दुष्प्रेरण और प्रयत्न) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. State of Maharashtra Vs. Bandu @ Shripad Budhe (2018) - [प्रयत्न (Section 18) पर अग्रणी मामला]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम की धारा 18 के तहत 'प्रवेशी लैंगिक हमले के प्रयास' (Attempt to commit Penetrative Sexual Assault) के तत्वों की विस्तृत व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'तैयारी' (Preparation) और 'प्रयत्न' (Attempt) के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि कोई आरोपी बालक को निर्वस्त्र करने या अपनी वासना शांत करने की दिशा में तैयारी के चरण को पार कर कोई भी सक्रिय कदम उठा लेता है, तो वह कृत्य धारा 18 के तहत सीधे तौर पर 'अपराध का प्रयत्न' माना जाएगा, भले ही शारीरिक संभोग (penetration) न हुआ हो।

2. Koppula Venkat Rao Vs. State of Andhra Pradesh (2004) - [अपराध के विभिन्न चरण]:

  • निर्णय: यद्यपि यह मामला पोक्सो अधिनियम से पहले का है, लेकिन यौन अपराधों में "प्रयत्न" को परिभाषित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की यह नजीर आज भी पोक्सो की धारा 18 के तहत मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में लागू होती है। न्यायालय ने स्थापित किया कि किसी अपराध के चार चरण होते हैं: (1) आशय (Intention), (2) तैयारी (Preparation), (3) प्रयत्न (Attempt) और (4) निष्पादन (Commission)। जब कोई व्यक्ति तैयारी पूरी कर अंतिम कृत्य की ओर बढ़ता है, जहाँ से उसका पीछे हटना असंभव हो जाता है, तो वह 'प्रयत्न' की श्रेणी में आता है और धारा 18 के तहत पूरी तरह दंडनीय है।

3. State of Madhya Pradesh Vs. Anoop Singh (2015) - [धारा 18 के तहत सजा का निर्धारण]:

  • निर्णय: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत आने वाले प्रयास के मामलों में अदालतों को सजा तय करते समय पीड़ित बच्चे की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर पड़ने वाले आघात को ध्यान में रखना चाहिए। भले ही अपराध अधूरा रह गया हो, लेकिन प्रयास करने मात्र से ही बच्चे के मन पर जो गहरा आघात लगता है, उसके लिए आरोपी को धारा 18 के तहत अधिकतम संभव सजा (मूल सजा की आधी अवधि) दी जानी चाहिए।


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