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अध्याय 2: बालकों के विरुद्ध लैंगिक अपराध (धारा 3 से 12)

 अध्याय 2: बालकों के विरुद्ध लैंगिक अपराध (धारा 3 से 12)

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) का अध्याय 2 पूरी तरह से बालकों के विरुद्ध होने वाले लैंगिक अपराधों और उनके लिए कठोर दंड से संबंधित है. इस अध्याय में धारा 3 से लेकर धारा 12 तक के प्रावधान शामिल हैं. नीचे प्रत्येक धारा का संपूर्ण विधिक विवरण और उससे संबंधित भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी (Leading) निर्णयों का विश्लेषण दिया गया है:


1. धारा 3 और 4: प्रवेशी लैंगिक हमला और उसके लिए दंड

धारा 3: प्रवेशी लैंगिक हमला (Penetrative Sexual Assault)

कोई व्यक्ति तब "प्रवेशी लैंगिक हमला" करता है जब वह लैंगिक आशय से निम्नलिखित कृत्यों में से कोई एक करता है:

  • अपना लिंग, किसी भी सीमा तक, किसी बालक की योनि, मुंह, मूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश कराता है या बालक से अपने साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा कराता है.
  • किसी वस्तु या शरीर के किसी ऐसे भाग को, जो लिंग नहीं है, किसी भी सीमा तक बालक की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में घुसेड़ता है या बालक से ऐसा कराता है.
  • बालक के शरीर के किसी भाग के साथ ऐसा अभिचालन (manipulation) करता है जिससे वह बालक की योनि, मूत्रमार्ग, गुदा या शरीर के किसी भाग में प्रवेश कर सके या बालक से ऐसा कृत्य कराता है.
  • बालक के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगाता है या बालक से अपने या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा कराता है.

धारा 4: प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Penetrative Sexual Assault)

  • सामान्य दंड (धारा 4(1)): जो कोई भी प्रवेशी लैंगिक हमला करेगा, उसे दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी न्यूनतम अवधि दस (10) वर्ष होगी और जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकेगा, तथा वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा.
  • 16 वर्ष से कम उम्र के बालक के लिए दंड (धारा 4(2)): यदि यह अपराध सोलह वर्ष से कम आयु के किसी बालक पर किया जाता है, तो न्यूनतम बीस (20) वर्ष का कारावास निर्धारित है, जिसे आजीवन कारावास (जिसका अर्थ अपराधी के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास है) तक बढ़ाया जा सकता है, और अपराधी जुर्माने का भी दायी होगा.
  • जुर्माने का उपयोग (धारा 4(3)): इस धारा के तहत लगाया गया जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होना चाहिए, और उसका संदाय सीधे पीड़ित को उसके चिकित्सीय व्ययों की पूर्ति और पुनर्वास के लिए किया जाएगा.

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख और अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. Independent Thought Vs. Union of India (2017): इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को "बालक" माना गया है. कोर्ट ने व्यवस्था दी कि 18 वर्ष से कम आयु की विवाहित बालिका के साथ उसके पति द्वारा बनाया गया शारीरिक संबंध भी बलात्कार की श्रेणी में आएगा और पोक्सो अधिनियम के प्रावधान ऐसे मामलों में प्राथमिकता पाएंगे.
  2. State of Madhya Pradesh Vs. Vikram Das (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सिद्धांत स्थापित किया कि जब पोक्सो कानून में किसी अपराध के लिए "न्यूनतम अनिवार्य सजा" (Minimum Mandatory Sentence) निर्धारित की गई है, तो अदालतें सहानुभूति या अपराधी की युवावस्था का हवाला देकर उस न्यूनतम वैधानिक सजा से कम दंड नहीं दे सकतीं.

2. धारा 5 और 6: गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला और उसके लिए दंड

धारा 5: गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला (Aggravated Penetrative Sexual Assault)

यह धारा उन विशेष परिस्थितियों और विश्वास के पदों को बताती है जिनमें किया गया प्रवेशी लैंगिक हमला एक "गुरुतर" (Aggravated) रूप ले लेता है. इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित परिस्थितियों में अपराध करता है, तो वह गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले का दोषी माना जाता है:

  • प्राधिकारियों द्वारा: कोई पुलिस अधिकारी अपने थाने की सीमा के भीतर, अपने कर्तव्यों के अनुक्रम में, या पुलिस अधिकारी के रूप में अपनी पहचान का उपयोग करते हुए किसी बालक पर हमला करता है. यही नियम सशस्त्र बल या सुरक्षा बल के सदस्यों पर भी लागू होता है जब वे अपनी तैनाती के क्षेत्र में, अपने कर्तव्यों के अनुक्रम में या अपनी पहचान का उपयोग करके ऐसा अपराध करते हैं. इसके अतिरिक्त, किसी लोक सेवक द्वारा ऐसा अपराध किया जाना भी इसमें शामिल है.
  • संस्थाओं के कर्मियों द्वारा: किसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह, संरक्षण गृह, संप्रेक्षण गृह या अभिरक्षा/देखरेख के किसी संस्थान के प्रबंधक या कर्मचारी द्वारा वहां रह रहे बालक पर किया गया हमला. किसी सरकारी या निजी अस्पताल के प्रबंधक या कर्मचारी द्वारा अस्पताल में किया गया हमला. किसी शैक्षणिक या धार्मिक संस्था के प्रबंधक या कर्मचारी द्वारा उस संस्था में किया गया हमला.
  • सामूहिक हमला (Gang Assault): जब एक से अधिक व्यक्तियों के समूह द्वारा सामान्य आशय से बालक पर सामूहिक प्रवेशी लैंगिक हमला किया जाता है, तो समूह का प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार दायी होगा मानो उसने वह कृत्य अकेले किया हो.
  • क्रूरता और हथियार: घातक आयुध, अग्न्यायुध, गर्म पदार्थ या संक्षारक पदार्थ का प्रयोग करके किया गया हमला. बालक को घोर उपहति काररत करते हुए, शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाते हुए या जननेन्द्रियों को क्षति पहुँचाते हुए किया गया हमला.
  • गंभीर परिणाम: ऐसा हमला जिससे बालक शारीरिक रूप से अशक्त या मानसिक रूप से रोगी हो जाता है या नियमित कार्य करने में अस्थायी या स्थायी रूप से अक्षम हो जाता है. हमले के परिणामस्वरूप बालिका का गर्भवती हो जाना. बालक का एचआईवी (HIV) या किसी अन्य प्राणघातक संक्रमण से ग्रस्त हो जाना. बालक की मृत्यु हो जाना.
  • पीड़ित की भेद्यता: बालक की मानसिक या शारीरिक अशक्तता का लाभ उठाकर किया गया हमला. एक ही बालक पर बार-बार किया गया हमला. बारह वर्ष से कम आयु के बालक पर किया गया हमला.
  • पारिवारिक और विश्वास के संबंध: किसी रक्त संबंधी, दत्तक, विवाह, संरक्षक या घरेलू संबंध वाले व्यक्ति द्वारा या साझी गृहस्थी में रहने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया हमला. बालक को सेवा प्रदान करने वाली किसी संस्था के मालिक या कर्मचारी द्वारा, या बालक के न्यासी या प्राधिकारी के पद पर रहते हुए किया गया हमला.
  • अन्य परिस्थितियां: यह जानते हुए कि बालक गर्भवती है किया गया हमला. हत्या के प्रयत्न के साथ किया गया हमला. साम्प्रदायिक/पंथिक हिंसा या प्राकृतिक आपदा के दौरान किया गया हमला. पूर्व में दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा किया गया हमला. बालक को सार्वजनिक रूप से नग्न करके प्रदर्शित करने वाला हमला.

धारा 6: गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Aggravated Penetrative Sexual Assault)

  • दंड का प्रावधान (धारा 6(1)): जो कोई भी व्यक्ति गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला करेगा, उसे कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी न्यूनतम अवधि बीस (20) वर्ष होगी, जिसे आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवनकाल के लिए) तक बढ़ाया जा सकता है, और वह जुर्माने का भी दायी होगा, या उसे मृत्युदंड (Death Penalty) से दंडित किया जाएगा.
  • जुर्माने का उपयोग (धारा 6(2)): लगाया गया जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होना चाहिए और उसका संदाय पीड़ित को चिकित्सीय व्ययों की पूर्ति और पुनर्वास के लिए किया जाएगा.

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख और अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. Shatrughna Baban Meshram Vs. State of Maharashtra (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत मृत्युदंड की सजा की पुष्टि करने के लिए विस्तृत कानूनी दिशा-निर्देश और सिद्धांतों को प्रतिपादित किया. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि कानून में मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन अदालतों को इसे केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) मामलों में ही लागू करना चाहिए.
  2. Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल यौन शोषण के मामलों में त्वरित न्याय प्रणाली और कड़े दंड के महत्व को रेखांकित किया, जिसके परिणामस्वरूप बाद में संसद द्वारा 2019 में अधिनियम में संशोधन करके 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ होने वाले जघन्य मामलों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान जोड़ा गया.

3. धारा 7 और 8: लैंगिक हमला और उसके लिए दंड

धारा 7: लैंगिक हमला (Sexual Assault)

कोई व्यक्ति "लैंगिक हमला" तब करता है जब वह:

  • लैंगिक आशय से बालक की योनि, लिंग, गुदा या स्तनों को स्पर्श करता है या बालक से अपने या किसी अन्य व्यक्ति के इन अंगों का स्पर्श कराता है.
  • लैंगिक आशय से कोई भी अन्य ऐसा कार्य करता है जिसमें बिना प्रवेशन (penetration) के शारीरिक संपर्क अंतर्ग्रस्त होता है.

धारा 8: लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Sexual Assault)

जो कोई भी व्यक्ति लैंगिक हमला करने का दोषी पाया जाएगा, उसे दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी न्यूनतम अवधि तीन (3) वर्ष होगी और जिसे पांच (5) वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा, तथा वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा.

सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख और अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgment):

  1. Attorney General for India Vs. Satिश & Anr. (2021) [Skin-to-Skin Contact Case]: यह पोक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 की व्याख्या के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण और अग्रणी निर्णय है. बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द करते हुए जिसमें प्रत्यक्ष 'त्वचा से त्वचा का संपर्क' न होने के कारण आरोपी को बरी कर दिया गया था, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि धारा 7 के तहत कृत्य को स्थापित करने के लिए शारीरिक त्वचा का सीधा संपर्क अनिवार्य नहीं है. न्यायालय ने माना कि कृत्य के पीछे का "लैंगिक आशय" (Sexual Intent) ही सबसे मुख्य तत्व है. यदि अनुचित इरादे से कपड़ों के ऊपर से भी बच्चे को स्पर्श किया जाता है, तो वह लैंगिक हमला माना जाएगा और आरोपी धारा 8 के तहत पूरी सजा का हकदार होगा.

4. धारा 9 और 10: गुरुतर लैंगिक हमला और उसके लिए दंड

धारा 9: गुरुतर लैंगिक हमला (Aggravated Sexual Assault)

जब धारा 7 में वर्णित लैंगिक हमला (बिना प्रवेशन के शारीरिक स्पर्श) धारा 5 के समान विशिष्ट गंभीर परिस्थितियों में किया जाता है (जैसे पुलिस, सुरक्षा बलों, लोक सेवकों, जेल/अस्पताल/स्कूल/धार्मिक संस्थाओं के कर्मियों, सामूहिक हमलों, घातक हथियारों, शारीरिक आघातों, गंभीर रोगों, अशक्तता का लाभ उठाने, रिश्तेदारों, सेवा प्रदाताओं और ट्रस्टियों द्वारा विश्वासघात से संबंधित हो), तो उसे "गुरुतर लैंगिक हमला" कहा जाता है. इसके अतिरिक्त, इस धारा में विशेष रूप से खंड (फ) शामिल है जिसके अनुसार:

  • जो कोई इस आशय से कि कोई बालक शीघ्र लैंगिक परिपक्वता प्राप्त करे, उसे कोई ओषधि, हार्मोन या रासायनिक पदार्थ लिए जाने के लिए प्रेरित करता है, फुसलाता है, प्रपीड़ित करता है या देता है, वह भी गुरुतर लैंगिक हमले का दोषी होगा.

धारा 10: गुरुतर लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Aggravated Sexual Assault)

जो कोई भी व्यक्ति गुरुतर लैंगिक हमला करेगा, उसे दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी न्यूनतम अवधि पांच (5) वर्ष होगी और जिसे सात (7) वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा, तथा वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा.

सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख और अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgment):

  1. State of Uttar Pradesh Vs. Pawan Kumar (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 29 और 30 (कतिपय अपराधों के बारे में न्यायालय की उपधारणा) के लागू होने के सिद्धांतों को स्पष्ट किया. न्यायालय ने माना कि एक बार जब अभियोजन पक्ष यह प्रमाणित कर देता है कि आरोपी ने बच्चे के साथ कोई अनुचित शारीरिक स्पर्श या कृत्य किया था, तो विशेष न्यायालय कानूनन यह उपधारणा (Presume) करेगा कि आरोपी ने यह कृत्य 'आपराधिक मानसिक दशा' और लैंगिक आशय से ही किया था. इसके बाद खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से आरोपी पर आ जाती है.

5. धारा 11 और 12: लैंगिक उत्पीड़न और उसके लिए दंड

धारा 11: लैंगिक उत्पीड़न (Sexual Harassment)

कोई व्यक्ति किसी बालक पर "लैंगिक उत्पीड़न" करता है, यह तब कहा जाता है जब वह व्यक्ति लैंगिक आशय से:

  • (i) कोई शब्द कहता है, कोई ध्वनि या अंगविक्षेप करता है, या कोई वस्तु या शरीर का भाग इस आशय से प्रदर्शित करता है कि बालक उसे सुने या देखे.
  • (ii) बालक को उसके शरीर या उसके किसी भाग को प्रदर्शित करने के लिए मजबूर या प्रेरित करता है ताकि उसे देखा जा सके.
  • (iii) अश्लील प्रयोजनों के लिए किसी भी रूप या मीडिया में बालक को कोई अश्लील वस्तु दिखाता है.
  • (iv) बालक का सीधे या इलेक्ट्रॉनिक, अंकीय (digital) या अन्य माध्यमों से बार-बार या निरंतर पीछा करता है, उसे देखता है या संपर्क करता है.
  • (v) बालक के शरीर या यौन कृत्य में शामिल होने के वास्तविक या रचे गए (morphed) चित्रों/वीडियो को मीडिया के किसी भी रूप में उपयोग करने की धमकी देता है.
  • (vi) अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक को प्रलोभन या परितोषण (payment/gratification) देता है.
  • स्पष्टीकरण: कृत्य में 'लैंगिक आशय' अंतर्वलित था या नहीं, यह पूरी तरह से तथ्य का प्रश्न (Question of Fact) होगा.

धारा 12: लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड (Punishment for Sexual Harassment)

जो कोई भी व्यक्ति किसी बालक पर लैंगिक उत्पीड़न करने का दोषी पाया जाएगा, उसे दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि तीन (3) वर्ष तक की हो सकेगी, और वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा.

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख और अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

  1. Nipun Saxena Vs. Union of India (2018): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के निजता के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साधनों के माध्यम से होने वाले लैंगिक उत्पीड़न और स्टॉकिंग (Stalking) के खिलाफ कड़े निर्देश जारी किए. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल माध्यमों पर बच्चों के अपमानजनक या मॉर्फ्ड चित्रों का उपयोग करना बच्चों की मानसिक शांति पर गंभीर आघात है, जिस पर तुरंत कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए.
  2. State of West Bengal Vs. Anindita Bose (2020): न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराध गैर-शमनीय (Non-Compoundable) हैं. किसी भी मामले में, भले ही वह धारा 12 के तहत लैंगिक उत्पीड़न का ही क्यों न हो, आरोपी और पीड़ित परिवार के बीच किसी भी प्रकार के "समझौते" (Compromise) के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता.


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